CISF Rule: सशस्त्र बलों में अनुशासन और आचरण के कड़े मानकों को रेखांकित करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने सीआईएसएफ के एक पूर्व कांस्टेबल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने आपराधिक अदालत से बरी होने के आधार पर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) जैसे एक अनुशासित सशस्त्र बल के सदस्य से समाज में उच्च स्तर के आचरण, आत्मसंयम और सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
सीआईएसएफ जवान की बर्खास्तगी को उचित करार दिया
अदालत ने अपनी कड़ी टिप्पणी में कहा, यदि किसी अनुशासित बल का जवान सार्वजनिक स्थान पर शराब पीता है, हिंसक हाथापाई में शामिल होता है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना के एक जवान की मौत हो जाती है, तो भले ही वह आपराधिक मामले में तकनीकी रूप से बरी (Acquit) हो गया हो, लेकिन उसका यह कृत्य बल की छवि को धूमिल करने वाला गंभीर कदाचार (Gross Misconduct) है। ऐसे मामलों में नौकरी से बर्खास्तगी (Dismissal) की सजा बिल्कुल उचित है।
मामला क्या है?: छुट्टी के दौरान शराबखोरी, हाथापाई और सेना के जवान की मौत
यह पूरा मामला साल 2018 का है और विभागीय जांच व आपराधिक मुकदमे के दोहरे कानूनी पहलुओं से जुड़ा है।
घटना: याचिकाकर्ता कांस्टेबल जनवरी 2018 में स्वीकृत छुट्टी (Sanctioned Leave) पर गया था। अपनी छुट्टी के दौरान, वह महाराष्ट्र के धोम बांध (Dhom Dam) पर अपने दोस्तों के साथ सार्वजनिक स्थान पर शराब पी रहा था। इसी दौरान वहां विवाद हो गया और हिंसक हाथापाई (Scuffle) शुरू हो गई। इस झगड़े में भारतीय सेना के एक जवान (गणेश) की मौत हो गई।
दोहरी कार्रवाई: इस घटना के बाद कांस्टेबल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 34 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई। इसके साथ ही, CISF ने समानांतर रूप से विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही (Departmental Proceedings) शुरू की। कांस्टेबल पर सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने, हिंसा में शामिल होने और बल की छवि खराब करने के आरोप तय किए गए।
बर्खास्तगी और कोर्ट से बरी होना: विभागीय जांच (Inquiry) में आरोप सिद्ध पाए गए और कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद उसकी अपील और समीक्षा याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं। दूसरी तरफ, आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाहों के मुकर जाने (Turn Hostile) के कारण सेशंस कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।
हाई कोर्ट का रुख: “क्रिमिनल कोर्ट से बरी होने का मतलब विभागीय माफी नहीं”
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष दलील दी कि चूंकि सेशंस कोर्ट ने उसे हत्या के मामले में बरी कर दिया है, इसलिए उसकी विभागीय सजा (बर्खास्तगी) को भी रद्द किया जाना चाहिए। उसने यह भी तर्क दिया कि शराब पीने की कोई मेडिकल रिपोर्ट नहीं थी और न ही मौत के मामले में कोई चश्मदीद गवाह था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए।
दोनों कार्यवाहियों के मानकों में अंतर (Standard of Proof)
अदालत ने दोहराया कि आपराधिक मुकदमे में किसी को दोषी ठहराने के लिए ‘संदेह से परे सबूत’ (Beyond Reasonable Doubt) की आवश्यकता होती है, जबकि विभागीय जांच ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (Preponderance of Probabilities) के सिद्धांत पर काम करती है। गवाहों के मुकर जाने से मिली तकनीकी रिहाई विभागीय कदाचार को खत्म नहीं करती।
खुद का कबूलनामा ही सबसे बड़ा सबूत
विभागीय प्राधिकारियों ने कांस्टेबल के उस खुद के बयान पर भरोसा किया था, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह उस शराब की महफिल और बाद में हुई हाथापाई में मौजूद था। खंडपीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, याचिकाकर्ता CISF का सदस्य था, जो उच्च आचरण, संयम और सार्वजनिक विश्वास की जिम्मेदारी संभालने वाला एक अनुशासित सशस्त्र बल है। साबित हुआ कदाचार केवल शराब के निजी सेवन तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक स्थान पर शराब पीना, हिंसक हाथापाई में भाग लेना, भारतीय सेना के जवान की मौत का कारण बनने वाली घटना में शामिल होना और बल को बदनाम करना बेहद गंभीर है। ऐसी परिस्थितियों में, यह नहीं कहा जा सकता कि बर्खास्तगी का जुर्माना इस अदालत की अंतरात्मा को झकझोरता है।
अदालत ने साफ किया कि जब ऐसे आरोप, जो किसी बल की निष्ठा और मर्यादा पर चोट करते हैं, याचिकाकर्ता द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार कर लिए गए हों, तो सजा की मात्रा (Quantum of Punishment) तय करना पूरी तरह से सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) का अधिकार क्षेत्र है।
अदालत का अंतिम निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि विभागीय अधिकारियों द्वारा कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त करने का निर्णय पूरी तरह से वैध और कानून सम्मत है। क्रिमिनल कोर्ट का फैसला विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई को प्रभावित नहीं करेगा। नतीजतन, कोर्ट ने कांस्टेबल की रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज (Dismissed) कर दिया।
केस शीट: दिल्ली उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन (डिवीजन बेंच) |
| याचिकाकर्ता | पूर्व कांस्टेबल, सीआईएसएफ (CISF) |
| मूल घटना | जनवरी 2018 (धोम बांध, महाराष्ट्र – सेना के जवान की मौत) |
| विभागीय जांच का आधार | संभावनाओं की प्रबलता (Preponderance of Probabilities) |
| आपराधिक कोर्ट का नतीजा | मुख्य गवाहों के मुकर जाने के कारण तकनीकी रूप से बरी। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका खारिज; सेवा से बर्खास्तगी का आदेश बरकरार। |

