MTP Case: नाबालिगों के अधिकारों और उनके मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की याचिका पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने एक 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट की वैधानिक समय-सीमा से आगे बढ़ चुके 28 हफ्ते 5 दिन के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने (Abortion) की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा, एक 14 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को सिर्फ इसलिए अवांछित गर्भ को ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि गर्भावस्था 28 हफ्ते को पार कर चुकी है। किसी ऐसी बच्ची को उसकी मर्जी के खिलाफ मां बनने या जन्म देने के लिए विवश करना उसे दोबारा मानसिक आघात (Trauma) देने जैसा होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत उसे मिले जीवन के अधिकार, शारीरिक अखंडता (Bodily Integrity), गरिमा, गोपनीयता और प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) का सीधा उल्लंघन है।”
मामला क्या है?: डराकर रखा, पेट दर्द होने पर खुला 28 हफ्ते के गर्भ का राज
यह दिल दहला देने वाला मामला एक ऐसी बच्ची से जुड़ा है जो सामाजिक और मानसिक रूप से बेहद गंभीर दौर से गुजर रही थी।
कथित अपराध (दिसंबर 2025): नाबालिग बच्ची के साथ दिसंबर 2025 में कथित तौर पर अपहरण और यौन शोषण (Rape) की वारदात हुई थी। आरोपी द्वारा डराए-धमकाए जाने के कारण बच्ची ने डर के मारे यह बात अपने परिवार को नहीं बताई।
जून 2026 में खुलासा: जून 2026 में जब बच्ची के पेट में तेज दर्द हुआ, तब परिवार वाले उसे अस्पताल ले गए। वहां अल्ट्रासाउंड स्कैन (Ultrasound) में पता चला कि वह गर्भवती है। इसके बाद पुलिस में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई।
अदालत का दरवाजा खटखटाया: जब तक गर्भ का पता चला, तब तक गर्भावस्था की अवधि कानूनी सीमा (MTP कानून के तहत सामान्यतः 24 हफ्ते) को पार कर चुकी थी। इसके बाद बच्ची के प्राकृतिक अभिभावक (पिता/संरक्षक) ने गर्भपात की अनुमति के लिए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और कानूनी पहलू
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता और तात्कालिकता को देखते हुए 29 जून को एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया था।
बोर्ड की रिपोर्ट (1 जुलाई): डॉक्टरों के बोर्ड ने बताया कि बच्ची की गर्भावस्था 28 हफ्ते और 5 दिन की हो चुकी है। हालांकि बच्ची शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ है, लेकिन इतनी एडवांस स्टेज में गर्भपात करने से अत्यधिक रक्तस्राव (Bleeding) और संक्रमण (Infection) जैसी चिकित्सकीय जटिलताओं का खतरा है। वहीं दूसरी ओर, गर्भ को जारी रखने से बच्ची को और ज्यादा मानसिक व शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी।
सरकार का रुख: राज्य सरकार ने भी पीड़िता की याचिका का पूरा समर्थन किया और अदालत से कहा कि यदि गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई, तो इससे बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति (Grave Injury) पहुंचेगी।
हाई कोर्ट का विधिक निष्कर्ष: ‘रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी’ महिला का अटूट अधिकार
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने एमटीपी अधिनियम, 1971 (2021 संशोधन) और सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न नजीरों का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत तय किए।
कानूनन मानसिक आघात की धारणा (Statutory Presumption)
अदालत ने एमटीपी एक्ट की धारा 3 के स्पष्टीकरण 2 (Explanation 2) का हवाला देते हुए कहा कि कानून खुद यह मानता है कि बलात्कार के कारण ठहरा हुआ गर्भ किसी भी महिला या बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट पहुंचाता है। जब पीड़िता ने खुद सचेत रूप से इस गर्भ को जारी न रखने की इच्छा जताई है, तो इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं रह जाती।
सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरें
हाई कोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत के उन हालिया फैसलों का संदर्भ दिया, जिनमें स्पष्ट किया गया है कि संवैधानिक अदालतें असाधारण और मजबूर करने वाली परिस्थितियों में वैधानिक सीमा (Gestational Limit) के पार जाने के बाद भी गर्भपात की अनुमति दे सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि किसी भी महिला, और विशेष रूप से एक बच्ची को, केवल इसलिए अवांछित गर्भ को पूरा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि समय बीत चुका है।”
अदालत के सख्त निर्देश: विशेषज्ञ डॉक्टर और एम्बुलेंस मुहैया कराएं
याचिका को स्वीकार करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निम्नलिखित कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
एक हफ्ते के भीतर दाखिला: पीड़िता को एक सप्ताह के भीतर जिला अस्पताल या आवश्यक सुविधाओं से लैस किसी भी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए।
विशेषज्ञों की टीम: गर्भपात की प्रक्रिया एमटीपी एक्ट के नियमों के तहत कम से कम दो स्त्री रोग विशेषज्ञों (Gynaecologists) और एक सर्जन की निगरानी में की जाएगी। इसके लिए पीड़िता और उसके अभिभावक की सहमति ली जाए।
गोपनीयता और डीएनए संरक्षण: मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को निर्देश दिया गया है कि वे एम्बुलेंस, प्री-ऑपरेटिव और पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल सुनिश्चित करें। बच्ची की गोपनीयता (Privacy) पूरी तरह बरकरार रखी जाए और भविष्य की आपराधिक जांच के लिए भ्रूण के टिशू और डीएनए सैंपल (DNA Samples) को सुरक्षित रखा जाए।
केस शीट: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद |
| पीड़िता की उम्र | 14 वर्ष 6 महीने |
| गर्भ की अवधि | 28 सप्ताह और 5 दिन |
| संवैधानिक ढाल | अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार और प्रजनन स्वायत्तता) |
| आपराधिक धाराएं | भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट |
| अदालत का अंतिम आदेश | गर्भपात की तुरंत अनुमति; डॉक्टरों की विशेष टीम को प्रक्रिया पूरी करने और कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का निर्देश। |

