Bar-Bench: केरल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने हर महीने दो शनिवार को कोर्ट लगाने और हफ्ते में दो दिन सिर्फ ऑनलाइन सुनवाई करने के प्रपोजल को एकमत से रिजेक्ट कर दिया है।
1 जून 2026 को केरल हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन का पारित प्रस्ताव
केरल हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन (KHCAA) ने हर महीने दो शनिवार को रेगुलर कोर्ट चलाने के प्रपोजल का एक बार फिर विरोध किया है। केरल हाई कोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने के लिए कहे जाने के बाद, एसोसिएशन ने इस साल की शुरुआत में लिए गए अपने स्टैंड को फिर से दोहराया है। इसके साथ ही, बार बॉडी ने हर सोमवार और शुक्रवार को पूरी तरह से वर्चुअल सुनवाई (virtual hearings) करने पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मौजूदा hybrid system काफी अच्छे से काम कर रहा है और इसमें बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। यह फैसला 1 जून 2026 को हुई जनरल बॉडी मीटिंग में लिया गया, जो केरल हाई कोर्ट की तरफ से दोनों प्रपोजल्स को लेकर मिले लेटर्स के बाद बुलाई गई थी।
शनिवार को कोर्ट क्यों नहीं? जानिए वजह
सीजेआई का प्रपोजल: 21 मई को हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने एसोसिएशन को बताया कि फुल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई सूर्य कांत के उस प्रपोजल पर विचार किया है, जिसमें हर महीने दो शनिवार को रेगुलर कोर्ट चलाने की बात कही गई थी। KHCAA से अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार करने और यह पता लगाने को कहा गया था कि क्या वकील 20 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग मामलों को निपटाने के लिए शनिवार को काम करने के लिए तैयार हैं।
एसोसिएशन का स्टैंड: लंबी चर्चा के बाद, मेंबर्स ने सर्वसम्मति से शनिवार की सिटिंग्स के खिलाफ अपने पुराने फैसले पर कायम रहने का फैसला किया।
वकीलों की परेशानी: एसोसिएशन ने पहले भी इसका विरोध करते हुए कहा था कि इससे वकीलों पर, खासकर उन लोगों पर बहुत असर पड़ेगा जो हाई कोर्ट में पेश होने के लिए एर्नाकुलम के बाहर के जिलों से ट्रैवल करके आते हैं। KHCAA ने इसके बदले रेगुलर वर्किंग डेज में ही कोर्ट के समय को 30 मिनट बढ़ाने का सुझाव दिया था।
सोमवार-शुक्रवार वर्चुअल सुनवाई का भी विरोध
KHCAA ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा देश के हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए शुरू किए गए ‘किफायती उपायों’ (austerity measures) पर राय मांगने वाले लेटर पर भी विचार किया। मेंबर्स ने हर सोमवार और शुक्रवार को सिर्फ वर्चुअल सुनवाई करने के प्रपोजल पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि मौजूदा सिस्टम में वकीलों को पहले से ही जरूरत पड़ने पर ऑनलाइन पेश होने की अनुमति मिली हुई है। यह भी पॉइंट आउट किया गया कि कोविड-19 महामारी के बाद से फिजिकल और वर्चुअल सुनवाई के बीच एक बढ़िया बैलेंस बन चुका है। कई वकील क्लाइंट्स से मिलने और अपने प्रोफेशनल काम के लिए रेगुलरली हाई कोर्ट के पास अपने ऑफिस आते हैं।
पेंडिंग केसेज को निपटाने की कोशिश
केस पेंडेंसी (मामलों के बैकलॉग) से निपटने के लिए CJI द्वारा यह सुझाव दिए जाने के बाद, देश के अलग-अलग हाई कोर्ट्स में हर महीने कम से कम दो शनिवार को कोर्ट लगाने का प्रपोजल विचाराधीन है। हालांकि, इस प्रपोजल को दिल्ली और इलाहाबाद सहित कई अन्य बार एसोसिएशंस के विरोध का भी सामना करना पड़ा है।
शनिवार वर्किंग’ पर वकीलों का नो: जायज या मजबूरी?
CJI सूर्य कांत का प्रपोजल बहुत नेक इरादे से आया था, 20 साल से ज्यादा पुराने केसेज को निपटाना। लेकिन वकीलों की अपनी प्रैक्टिकल दिक्कतें हैं।
लॉजिस्टिक्स और ट्रैवल की आफत: हाई कोर्ट के वकील सिर्फ उसी शहर में नहीं रहते। केरल में कई वकील एर्नाकुलम के बाहर के जिलों से अपीयर होने आते हैं। सैटरडे को कोर्ट खुलने का मतलब है उनका पूरा वीकेंड और पर्सनल लाइफ खत्म।
वर्क-लाइफ बैलेंस: वकीलों का तर्क है कि कोर्ट रूम के बाहर भी केस की तैयारी, ब्रीफिंग और क्लाइंट मीटिंग्स में बहुत वक्त जाता है।
वैकल्पिक सुझाव (Alternative Solution): वकीलों ने काम से पूरी तरह मना नहीं किया है, बल्कि एक स्मार्ट बीच का रास्ता निकाला है—”हर वर्किंग डे पर 30 मिनट एक्स्ट्रा काम कर लो, लेकिन सैटरडे को छोड़ दो।”
मंडे और फ्राइडे ‘ओन्ली वर्चुअल’ का विरोध क्यों?
सुप्रीम कोर्ट इसे ‘Austerity Measures’ (खर्चों में कटौती और रिसोर्स मैनेजमेंट) के रूप में देख रहा था, लेकिन वकीलों को यह आइडिया पसंद नहीं आया। इसके पीछे की वजहें हैं:
‘Hybrid System’ हिट है: कोविड के बाद से कोर्ट्स में हाइब्रिड मॉडल (फिजिकल + ऑनलाइन का मिक्स) चल रहा है। वकीलों का कहना है कि जब अभी भी जरूरत पड़ने पर ऑनलाइन आने की आजादी है, तो इसे ‘मैंडेटरी’ (अनिवार्य) क्यों बनाया जाए?
वकील-क्लाइंट रिलेशनशिप और बिजनेस: मंडे और फ्राइडे को पूरी तरह ऑनलाइन करने से वकीलों के चैम्बर्स और ऑफिस खाली हो जाएंगे। वकीलों का कोर्ट के पास ऑफिस रखने का मकसद ही यह होता है कि वे क्लाइंट्स से फेस-टू-फेस मिल सकें। सिर्फ वर्चुअल होने से उनका रूटीन और बिजनेस प्रभावित होगा। यह सिर्फ केरल की बात नहीं है, यह एक नेशनल ट्रेंड है: इस प्रपोजल का विरोध सिर्फ केरल (KHCAA) में नहीं हो रहा है। दिल्ली और इलाहाबाद बार एसोसिएशंस ने भी इसका कड़ा विरोध किया है।
एनालिसिस: इससे यह साफ होता है कि ग्राउंड लेवल पर वकील अभी भी पूरी तरह ‘डिजिटल’ या ‘एक्स्ट्रा वर्किंग डेज’ के लिए कम्फर्टेबल नहीं हैं। बार एसोसिएशंस का मानना है कि ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स वकीलों की वर्क कंडीशन को ध्यान में रखकर ही होने चाहिए।
बिगेस्ट टेकअवे (The Core Issue)
इस विवाद से यह साफ है कि भारतीय कोर्ट्स में Case Pendency (मुकदमों का अंबार) एक इमरजेंसी जैसी स्थिति में पहुंच चुका है, जिसे सुलझाने के लिए टॉप लेवल (CJI) से कड़े कदम उठाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत और वकीलों का वर्किंग इंफ्रास्ट्रक्चर है। जब तक बार (Advocates) और बेंच (Judges) एक पेज पर नहीं आते, तब तक ऐसे रिफॉर्म्स को लागू करना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

