Wednesday, July 22, 2026
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Pak Connection: देश तोड़ने के लिए सुरक्षाकर्मियों को मोहरा बना रहा दुश्मन…बर्खास्त पुलिसकर्मी गुलाम मोहम्मद तांत्रे की कहानी आंख खोल देगी

Pak Connection: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने आतंकी संबंधों के आरोपी एक पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी को सही ठहराया है।

कांस्टेबल को सेवा से हटा देने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश को तोड़ने की साजिशों के तहत आतंकवादी, सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के कर्मियों को अपना ‘मोहरा’ (pawn) बनाते हैं। अदालत ने उस आदेश को बहाल कर दिया है, जिसके तहत बिना किसी विस्तृत विभागीय जांच (departmental inquiry) के उक्त कांस्टेबल को सेवा से हटा दिया गया था।

पड़ोसी देश के जाल में फंसे सुरक्षाकर्मी: हाई कोर्ट

30 मई को दिए गए अपने फैसले में डिवीजन बेंच ने साफ किया कि वह उस दौर की जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकती, जब इस कांस्टेबल को बर्खास्त किया गया था। कोर्ट ने कहा, पड़ोसी देश के प्रॉक्सी (नापाक एजेंटों) द्वारा देश की संप्रभुता और अखंडता को हमेशा खतरे में डाला गया है। घाटी के लोगों में भारत सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करने और आतंक फैलाने के लिए दुश्मन कई तरह की रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है। अदालत ने आगे जोड़ा कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों सहित विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले कई सरकारी कर्मचारियों को दुश्मन देश ने अपने जाल में फंसाया। इस मामले में आरोपी कांस्टेबल भी दुश्मन के हाथों का एक ऐसा ही मोहरा था, जिसने न सिर्फ अपने विभाग बल्कि अपने देश के खिलाफ काम किया।

क्या है पूरा मामला?

आरोप: बर्खास्त पुलिसकर्मी गुलाम मोहम्मद तांत्रे पर एक पाकिस्तानी आतंकवादी के संपर्क में रहने और उसके लिए छिपने का ठिकाना (hideout) मुहैया कराने का आरोप था। छापेमारी के दौरान उस ठिकाने से दो हैंड ग्रेनेड भी बरामद किए गए थे।

2004: जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शुरुआत में तांत्रे के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की।

2007: मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने जांच पूरी किए बिना, तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 126 (2)(c) (जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 311(2) के समान है) का इस्तेमाल कर राज्यपाल की मंजूरी से उसे बर्खास्त कर दिया।

बिना जांच के बर्खास्तगी क्यों?

सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि तांत्रे के संबंध आतंकवादियों से थे, इसलिए नियमित जांच कराना मुमकिन नहीं था। ऐसे मामलों में गवाह गवाही देने से डरते हैं और जांच करने वाले अधिकारियों व उनके परिवारों की जान को भी खतरा हो सकता है।

सिंगल बेंच का फैसला पलटा

तांत्रे ने अपनी बर्खास्तगी को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। साल 2011 में एक सिंगल-जज बेंच ने उसे राहत देते हुए बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था, क्योंकि कोर्ट का मानना था कि सरकार विभागीय जांच न कराने के फैसले को पूरी तरह सही साबित नहीं कर पाई। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इस फैसले को डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी। अब डिवीजन बेंच ने सिंगल-जज के 2011 के फैसले को “लापरवाह और जल्दबाजी में लिया गया” (slipshod manner) बताते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने माना कि पूर्व पुलिसकर्मी की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा थीं और सरकार के पास नियमित जांच न कराने के पर्याप्त और पुख्ता आधार थे।

मुख्य कानूनी विवाद: ‘Natural Justice’ बनाम ‘National Security’

इस पूरे मामले की जड़ में भारतीय प्रशासनिक कानून (Administrative Law) का एक बड़ा टकराव है— प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (Principles of Natural Justice) बनाम राज्य की सुरक्षा (Security of the State)।

सामान्य नियम: किसी भी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकालने से पहले उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए, जिसे विभागीय जांच (Departmental Inquiry) कहते हैं।

अपवाद (इस केस का आधार): तत्कालीन जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 126 (2)(c) [जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के समकक्ष है] सरकार को यह पावर देती है कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति को संतुष्टि हो कि देश/राज्य की सुरक्षा के हित में जांच कराना ‘Expedient’ (उचित या व्यावहारिक) नहीं है, तो बिना जांच के भी कर्मचारी को बर्खास्त किया जा सकता है।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां और राष्ट्रीय सुरक्षा पर चिंता

जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने केवल कानूनी पहलुओं पर बात नहीं की, बल्कि घाटी की जमीनी हकीकत (Ground Reality) को भी रिकॉर्ड पर लिया।

‘मोहरे’ (Pawns) की थ्योरी: कोर्ट ने माना कि सीमा पार बैठा दुश्मन (पाकिस्तान) सीधे लड़ने के बजाय भारत के भीतर ही मौजूद सिस्टम के लोगों— विशेषकर सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के कर्मियों— को लालच या दबाव में फंसाकर ‘प्रॉक्सी’ (Proxy) की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

संवैधानिक प्रावधान का सही इस्तेमाल: कोर्ट ने साफ किया कि गुलाम मोहम्मद तांत्रे जैसे लोग, जो कथित तौर पर पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह दे रहे थे और जिनके पास से ग्रेनेड मिले, उन्हें सेवा में बनाए रखना या उनके लिए लंबी जांच प्रक्रिया चलाना देश की संप्रभुता को खतरे में डालना है।

सिंगल जज के 2011 के फैसले को क्यों पलटा गया?

साल 2011 में सिंगल जज ने तकनीकी आधार पर पुलिसकर्मी को राहत दे दी थी कि सरकार ने जांच न कराने का “ठोस कारण” नहीं बताया। लेकिन डिवीजन बेंच ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया। सरकार का वह तर्क, जिसे डिवीजन बेंच ने सही माना, वह था कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में अगर ओपन डिपार्टमेंटल जांच कराई जाती, तो खूंखार आतंकियों के डर से कोई भी गवाह पुलिसकर्मी के खिलाफ गवाही देने सामने नहीं आता। जो अधिकारी जांच की अध्यक्षता करते, वे और उनका परिवार सीधे आतंकियों के निशाने पर आ जाते।

प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में इस फैसले के मायने

सुरक्षा बलों के लिए कड़ा संदेश: यह फैसला जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के भीतर काम कर रहे काली भेड़ों (Insider Threats) के लिए एक सख्त चेतावनी है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘Uniform’ में रहकर देश के खिलाफ काम करने वालों को किसी भी तरह की कानूनी ढाल या तकनीकी खामियों का फायदा नहीं मिलेगा।

कार्यपालिका (Executive) के विशेषाधिकार की बहाली: अनुच्छेद 311(2)(c) के तहत सरकार जो फैसले लेती है, अदालतें आमतौर पर उसमें दखल नहीं देतीं, बशर्ते फैसला पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण (Malafide) न हो। इस जजमेंट से आतंकवाद के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस की नीति अपना रही राज्य सरकार/प्रशासन के हाथ मजबूत हुए हैं।

‘लॉन्ग पेंडिंग’ मामलों का निपटारा: यह मामला 2004 से चल रहा था (2007 में बर्खास्तगी, 2011 में बहाली और अब अंतिम फैसला)। यह दिखाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों में भी अदालती लड़ाइयां दशकों तक खिंच सकती हैं, लेकिन अंततः न्यायिक व्यवस्था देश की संप्रभुता के पक्ष में खड़ी नजर आती है।

कोर्ट में किसने की पैरवी?

जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से: सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल मोहसिन कादरी पेश हुए।

गुलाम मोहम्मद तांत्रे की ओर से: सीनियर एडवोकेट सैयद फैसल कादिरी (सहायताकर्ता: एडवोकेट मीर अधान जहूर और सालेह पीरजादा) ने पैरवी की।

निष्कर्ष

हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्थापित करता है कि जहां नागरिक अधिकारों और प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice) का अपना महत्व है, वहीं जब बात “देश की अखंडता और संप्रभुता” की आती है, तो तकनीकी दांव-पेंचों के ऊपर राष्ट्रीय हित को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

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