Correction Application: सुप्रीम कोर्ट ने सिविल संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ता और उसके वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रक्रिया को रद्द (Quash) कर दिया है।
यह रही सुप्रीम टिप्पणी
हाईकोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भूयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि आईपीसी (IPC) की धारा 193, 199 और 200 के तहत अपराध साबित करने के लिए केवल “गलत बयान” होना काफी नहीं है, बल्कि यह साबित होना आवश्यक है कि बयान बदनियती से “झूठा” (False) दिया गया था। अदालती याचिकाओं या हलफनामों में अनजाने में हुई टाइपिंग की गलती या त्रुटि को ‘झूठा बयान’ नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था?: शब्द के हेरफेर और टाइपिंग की गलती पर केस
मूल विवाद: मामला प्रभाकर यशवंत मसराम (Prabhakar Yeshwant Masram v. Sou Tula Namdeorao Jaipurkar) और उनके वकील से जुड़ा है। उन्होंने एक सिविल संपत्ति विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील और स्टे (Stay) याचिका दायर की थी।
विपक्ष का आरोप: विपक्षी पक्ष ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता और उसके वकील ने अदालत को गुमराह कर स्टे हासिल किया। उन्होंने याचिका में एक पुरानी रिट याचिका के आदेश को “Disposed Of” (निस्तारित) के स्थान पर “Dismissed” (खारिज) लिखा था। स्टे अर्जी के एक पैरा में गलती से “Not” शब्द छूट गया था, जिससे वाक्य का अर्थ बदल गया।
निचली अदालत व हाई कोर्ट का रुख: बॉम्बे हाई कोर्ट की अनुमति के बाद सीआरपीसी की धारा 340 (Section 340 CrPC) के तहत शिकायत दर्ज हुई। अपीलीय अदालत और बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता और वकील ने “गलत बयान” दर्ज किए हैं, इसलिए उनके खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) और धारा 193, 199, 200 IPC के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।
सुप्रीम COURT के मुख्य विधिक निष्कर्ष (Legal Principles)
‘Wrong Statement’ बनाम ‘False Statement’
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनजाने में हुई या टाइपिंग की गलती के कारण दिया गया बयान ‘गलत बयान’ (Wrong Statement) हो सकता है, जबकि ‘झूठा बयान’ (False Statement) वह होता है जो जानबूझकर अदालत को धोखा देने या अनुचित लाभ उठाने के इरादे से दिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी
“आईपीसी की धारा 199 और 200 के संदर्भ में ‘गलत बयान’ और ‘झूठे बयान’ में एक बड़ा मौलिक अंतर है। तथ्यात्मक रूप से एक ‘गलत बयान’ हमेशा ‘झूठे बयान’ की श्रेणी में नहीं आता। गलत बयान आईपीसी की धारा 199/200 के दायरे में नहीं आएगा, जबकि ‘झूठा बयान’ ही इस अपराध का आधार बन सकता है।”
गलती सुधारने के पहले के प्रयास को माना आधार
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विपक्षी पक्ष द्वारा धारा 340 CrPC की याचिका दायर करने से महीनों पहले ही याचिकाकर्ता और वकील ने अपील मेमोरेंडम और स्टे अर्जी में हुई इन टाइपोग्राफिकल गलतियों को सुधारने के लिए खुद सुधार अर्जी (Correction Application) दायर कर दी थी। इससे साबित होता है कि उनका इरादा धोखा देने का नहीं था।
हाई कोर्ट के रवैये पर सवाल
पीठ ने यह भी कहा कि जब निचली अपीलीय अदालत ने केवल ‘गलत बयान’ (Wrong Statement) की बात कही थी, तब हाई कोर्ट ने अपने स्तर पर इसे ‘झूठा हलफनामा’ बताकर और ‘न्याय के हित’ (Interests of Justice) के नए निष्कर्ष जोड़कर आदेश को सुधारा जो कि कानूनन सही नहीं है।
केस मैट्रिक्स: Prabhakar Yeshwant Masram v. Sou Tula Namdeorao Jaipurkar
| विधिक एवं प्रक्रियात्मक बिंदु | विवरण / सुप्रीम कोर्ट का फैसला |
| मामले का शीर्षक | प्रभाकर यशवंत मसराम बनाम सौ तुला नामदेवराव जयपुरकर |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस उज्ज्वल भूयान एवं जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर |
| संबंधित धाराएं | IPC धारा 193, 199, 200 और CrPC धारा 340 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | टाइपिंग या अनजाने में हुआ ‘Wrong Statement’ झूठी गवाही या आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिकाकर्ता और वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस रद्द (Quashed)। |

