Wednesday, June 3, 2026
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Untraceable Money: रॉन्ग नंबर से लापता खाते में गए 3.25 लाख रुपये… RBI व बैंक से मायूसी, कोर्ट ने क्यूं कहा कि कड़े नियम आफत, पढ़िए घटना को

Untraceable Money: कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की सिंगल बेंच में ऑनलाइन बैंकिंग या RTGS करते समय सिर्फ चार अंकों की एक छोटी सी गलती से परेशान महिला का केस आया।

बैंक व आरबीआई के लोकपाल ने नहीं दिया इंसाफ

यह बैंकिंग मामला किसी के लिए कितनी बड़ी मुसीबत बन सकती है, इसका ताजा और हैरान करने वाला मामला महिला के केस को देखकर लग रहा है। दरअसल, कोर्ट ने एक हाउसवाइफ (गृहणी) की याचिका पर सुनवाई की, जिसने गलती से किसी ‘लापता’ (Untraceable) और बंद पड़े खाते (Dormant Account) में 3.25 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए थे। बैंक और आरबीआई (RBI) के लोकपाल (Ombudsman) ने तकनीकी नियमों का हवाला देकर पैसे वापस करने से साफ मना कर दिया था, जिसके बाद थक-हारकर महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

सिर्फ 4 अंकों की गलती और फंस गए पैसे: क्या है पूरा मामला?

  • यह मामला नुजैबा जलील नाम की एक गृहणी से जुड़ा है, जिन्होंने 17 दिसंबर 2025 को अपने पिता को RTGS के जरिए 3.25 लाख रुपये भेजने की कोशिश की थी।
  • टाइपिंग मिस्टेक: अकाउंट नंबर डालते समय उन्होंने आखिरी के चार अंक ‘1619’ की जगह गलती से ‘1916’ टाइप कर दिए।
  • लापता खाते में पहुंचे पैसे: यह पैसा सीधे मैसेजर्स स्टैंडर्ड इंजीनियरिंग वर्क्स (M/s Standard Engineering Works) नामक फर्म के एक ऐसे खाते में चला गया जो सालों से बंद (Dormant) पड़ा था।
  • बैंक का अड़ंगा: नुजैबा ने अगले ही दिन बैंक को गलती की जानकारी दी। फेडरल बैंक (Federal Bank) ने उस रकम पर रोक (Lien) तो लगा दी, लेकिन पैसे वापस करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि “जब तक खाताधारक खुद सहमति (Consent) नहीं देता, हम पैसे रिवर्स नहीं कर सकते।” सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वह खाताधारक अब उस पते पर है ही नहीं और पूरी तरह ‘लापता’ है।

RBI लोकपाल ने भी खड़े किए हाथ, महिला ने दिया संविधान का हवाला

बैंक से मायूस होने के बाद नुजैबा ने 31 जनवरी 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के बैंकिंग लोकपाल से शिकायत की। लेकिन 19 फरवरी 2026 को लोकपाल ने भी शिकायत खारिज कर दी। लोकपाल का तर्क था कि बैंकिंग नियमों के तहत बिना लाभार्थी की मर्जी के बैंक अपनी तरफ से पैसा वापस नहीं ले सकता, इसलिए यह बैंक की सेवा में कोई कमी नहीं है। इसके बाद नुजैबा ने कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की। उनके वकील मोहम्मद इरशाद एम.एच. ने दलील दी कि जो व्यक्ति लापता है, उससे सहमति (Consent) लाना नामुमकिन है। नियमों को इतना व्यावहारिक होना चाहिए कि वे आम जनता को परेशान न करें। अपनी ही मेहनत की कमाई से इस तरह महकूम हो जाना संविधान के अनुच्छेद 300A (Article 300A – Right to Property) का सीधा उल्लंघन है, जो कहता है कि कानून की अनुमति के बिना किसी भी नागरिक को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट का रुख: प्रक्रिया लंबी होगी, पर न्याय मिलेगा

जस्टिस सूरज गोविंदराज की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने नोट किया कि जिस लापता खाताधारक के अकाउंट में पैसे गए हैं, उसे अभी तक इस मामले में पक्षकार (Party) नहीं बनाया गया है। न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, प्रक्रियात्मक रूप से (Procedurally) जो बात बैंक कह रहा है, वह अपनी जगह सही है। आपकी राहत में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन आपको न्याय जरूर मिलेगा।

कोर्ट का बड़ा निर्देश: हाई कोर्ट ने फेडरल बैंक को आदेश दिया है कि वह उस बंद खाते (Dormant Account) के मालिक ‘स्टैंडर्ड इंजीनियरिंग वर्क्स’ का पूरा पता और विवरण याचिकाकर्ता को सौंपे। इसके साथ ही कोर्ट ने नुजैबा के वकील को अनुमति दी कि वे उस फर्म को सीधे अदालती समन (Hand Summons) जारी करें। अगर वे वहां नहीं मिलते हैं, तो कोर्ट आगे का कदम तय करेगी। मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी।

विश्लेषण: डिजिटल ट्रांजैक्शन करने वालों के लिए सबक

इम्पैक्ट एरियावर्तमान नियम और कोर्ट के फैसले के मायने
उपभोक्ताओं की मजबूरीमौजूदा बैंकिंग नियमों के तहत अगर गलती से पैसा किसी और के खाते में चला जाए, तो उसे वापस पाना पूरी तरह सामने वाले की ‘नेकी’ या सहमति पर निर्भर करता है, जो कि एक बड़ा लूपहोल (खामी) है।
प्रक्रिया में लचीलेपन की मांगयह केस नजीर बन सकता है। अगर हाई कोर्ट इस पैसे को बिना सहमति के रिवर्स करने का आदेश देता है, तो भविष्य में बंद पड़े या फ्रॉड खातों में गलती से गए पैसों को वापस पाना आसान हो जाएगा।
डिजिटल बैंकिंग अलर्टयह मामला हर उस इंसान के लिए बड़ी चेतावनी है जो यूपीआई (UPI), नेट बैंकिंग या RTGS करता है। पैसे भेजते समय नाम और अकाउंट नंबर को दो बार री-चेक करना कितना जरूरी है, यह इस केस से साफ है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह रुख राहत देने वाला है। कोर्ट ने साफ किया है कि नियमों की तकनीकी पेचीदगियां अपनी जगह हैं, लेकिन किसी नागरिक का पैसा इस तरह सिस्टम में हमेशा के लिए दफन नहीं होने दिया जा सकता। ‘सिस्टम की लकीर’ कभी भी किसी आम नागरिक की गाढ़ी कमाई को हड़पने का जरिया नहीं बन सकती।

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