Friday, October 30, 2026
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Social Media: केरल हाई कोर्ट परिसर में वकील नहीं बनाएंगे रील्स और वीडियो…नहीं तो होगी अनुशासनात्मक कार्रवाई, यह खबर वकीलगण पढ़ें

Social Media: क्या अदालत परिसर के भीतर रील्स (Reels), शॉर्ट्स या वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना वकालत के पेशे की मर्यादा के खिलाफ है?

बार एसोसिएशन की ओर से आधिकारिक नोटिस जारी

केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) ने इस सवाल पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। एसोसिएशन ने हाई कोर्ट परिसर और उसके आसपास वकीलों द्वारा वीडियो बनाने और उन्हें शेयर करने पर पूरी तरह रोक लगाते हुए एक आधिकारिक नोटिस जारी किया है। KHCAA ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जो भी वकील अदालत परिसर का इस्तेमाल सोशल मीडिया कंटेंट या रील्स बनाने के लिए करेगा, उसके खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) के तहत सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया रील्स से धूमिल हो रही है पेशे की छवि: KHCAA

केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन की सचिव, एडवोकेट नीमा जैकब द्वारा 3 जून को जारी किए गए नोटिस में कहा गया कि यह देखा गया है कि हाई कोर्ट कैंपस के भीतर और उसके आसपास फिल्माए गए वीडियो और रील्स सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर वायरल हो रहे हैं। ऐसा आचरण किसी भी वकील के लिए स्वीकार्य नहीं है। यह एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के तहत वकीलों से अपेक्षित उच्च नैतिक मानकों के बिल्कुल विपरीत है।

किन कानूनों का हवाला देकर वकीलों पर कसा शिकंजा?

जिक्र: एसोसिएशन ने अपने नोटिस में उन कानूनी धाराओं का विशेष रूप से जिक्र किया है, जो वकीलों को इस तरह की आत्म-प्रशंसा या प्रचार से रोकती हैं।

एडवोकेट्स एक्ट की धारा 49(1)(c): यह धारा वकीलों के पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और मर्यादा (Professional Conduct and Etiquette) को तय करती है। कोर्ट परिसर में मनोरंजन या व्यक्तिगत प्रचार के लिए वीडियो बनाना इसके खिलाफ माना गया है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का नियम 36: यह नियम भारत में वकीलों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने काम का विज्ञापन (Advertising) करने या मुवक्किलों को रिझाने (Soliciting) के लिए किसी भी तरह के हथकंडे अपनाने से सख्ती से रोकता है। सोशल मीडिया पर रील्स डालना एक तरह का परोक्ष विज्ञापन माना जा रहा है।

एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35: नोटिस में साफ किया गया है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ इस धारा के तहत ‘पेशेवर कदाचार के लिए सजा’ (Punishment for Misconduct) की कार्रवाई शुरू की जाएगी, जिसके तहत बार काउंसिल वकील का लाइसेंस तक सस्पेंड कर सकती है।

जज की सरकारी गाड़ी के साथ रील बनाने पर पहले भी मच चुका है बवाल

  • अदालत परिसरों और न्यायिक संस्थाओं के भीतर सोशल मीडिया के बढ़ते क्रेज पर बार काउंसिल पहले से ही नजर रख रही है।
  • पिछले साल की घटना: बार काउंसिल ऑफ केरल ने एक नव-नामांकित (Newly Enrolled) युवा वकील को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी कर दिया था। उस वकील ने अपने नामांकन समारोह के दौरान केरल हाई कोर्ट के एक मौजूदा जज की आधिकारिक सरकारी गाड़ी और उसकी नंबर प्लेट को दिखाते हुए एक वीडियो बनाया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

विश्लेषण: वकालत के पेशे और ‘रील्स कल्चर’ का टकराव

इम्पैक्ट एरियाबार एसोसिएशन का स्टैंड और इसके मायने
अदालत की गरिमा की रक्षान्याय का मंदिर एक गंभीर जगह है। यहां रील्स या फनी वीडियो बनाने से न्यायपालिका की गरिमा (Sanctity) को ठेस पहुंचती है, जिसे रोकना जरूरी है।
डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनाम वकीलकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि आप ‘काला कोट’ पहनकर एक इन्फ्लुएंसर की तरह बर्ताव नहीं कर सकते। वकालत एक सेवा है, कोई एंटरटेनमेंट बिजनेस नहीं।
युवा वकीलों के लिए कड़ा संदेशसोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स बटोरने की होड़ में लगे जूनियर और नए वकीलों के लिए यह नोटिस एक बड़े ‘करियर थ्रेट’ की तरह है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन का यह फैसला सोशल मीडिया के दौर में कानून के पेशे की मर्यादा को बचाने की एक जरूरी कोशिश है। यह नोटिस साफ करता है कि अदालत की इमारतें रील बनाने का ‘शूटिंग स्पॉट’ नहीं हैं। अगर वकील ही कानून के तय नियमों और मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाएंगे, तो आम जनता को कानून का पाठ कौन पढ़ाएगा? अब केरल हाई कोर्ट में मोबाइल कैमरे से रील बनाने वाले वकीलों पर बार काउंसिल की गाज गिरना तय है।

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