Wednesday, July 22, 2026
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Child Assault: अगर पीड़ित लड़की और उसके माता-पिता हो जाए होस्टाइल (बयान से पलटने)…DNA रिपोर्ट हो सकती है पॉक्सो में अहम, केस पढ़ें

Child Assault: मद्रास हाई कोर्ट ने बाल यौन अपराधों (Child Sexual Assault) के मामलों में एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया।

पीड़ित बच्ची से पैदा हुए बच्चे का जैविक पिता

हाईकोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने कहा कि जब डीएनए रिपोर्ट अकाट्य रूप से यह साबित कर दे कि आरोपी ही पीड़ित बच्ची से पैदा हुए बच्चे का जैविक पिता (Biological Father) है, तो यह अपराध साबित करने के लिए एक ‘बुनियादी तथ्य’ बन जाता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर किसी मामले में पीड़ित बच्ची या उसके माता-पिता अदालत में अपने बयान से पलट जाते हैं (Hostile हो जाते हैं), तब भी वैज्ञानिक साक्ष्य यानी डीएनए (DNA) रिपोर्ट के अकेले आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है और सख्त सजा दी जा सकती है।

क्या था पूरा मामला? (40 साल का आरोपी, 13 साल की मासूम)

संगीन अपराध: यह मामला तमिलनाडु के थेनी (Theni) जिले का है, जिसने सामाजिक और कानूनी हलकों में बड़ी बहस छेड़ दी थी। अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, 18 जनवरी 2020 को करीब 40 साल के आरोपी मुरुगन ने एक 13 साल की नाबालिग बच्ची को एक घर में बुलाकर उसके साथ दुष्कर्म (Penetrative Sexual Assault) किया। उसने बच्ची को मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी भी दी थी।

मेडिकल जांच में खुलासा: जब बच्ची की मेडिकल जांच हुई, तो वह 5 हफ्ते की गर्भवती पाई गई। चार्जशीट दाखिल होने के बाद, 24 अक्टूबर 2020 को पीड़ित बच्ची ने एक बच्चे को जन्म दिया।

ट्रायल कोर्ट से उम्रकैद: थेनी की फास्ट ट्रैक महिला अदालत ने 31 जुलाई 2023 को मुरुगन को पॉक्सो एक्ट (POCSO) और आपराधिक धमकी (IPC 506) के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

आरोपी की दलील: ‘जब लड़की और मां ने ही मना कर दिया, तो सजा कैसी?’

हाई कोर्ट में आरोपी मुरुगन के वकील ने सजा को रद्द करने के लिए मुख्य रूप से तीन दलीलें दीं।

होस्टाइल गवाह: ट्रायल (अदालत की जिरह) के दौरान पीड़ित लड़की और उसकी मां दोनों अपने बयानों से पूरी तरह पलट गईं। उन्होंने आरोपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा। वकील ने तर्क दिया कि जब मुख्य गवाहों ने ही मामले का समर्थन नहीं किया, तो केवल एक कागजी रिपोर्ट पर किसी को उम्रकैद कैसे दी जा सकती है?

सैंपल्स से छेड़छाड़ का आरोप: आरोपी ने दावा किया कि खून के नमूनों (Blood Samples) को सही तरीके से सुरक्षित रखने की चेन (Chain of Custody) का पालन नहीं हुआ और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना है।

दस्तावेज न मिलना: आरोपी ने यह भी दलील दी कि उसे सीआरपीसी की धारा 207 के तहत डीएनए से जुड़े जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं दिए गए।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘विज्ञान झूठ नहीं बोलता’

मद्रास हाई कोर्ट ने आरोपी की सभी तकनीकी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने ‘चेन ऑफ कस्टडी’ की जांच की और पाया कि बच्ची के जन्म के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) की पहल पर आरोपी, पीड़िता और बच्चे के ब्लड सैंपल्स थेनी सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के जरिए कलेक्ट किए गए थे। ये सैंपल्स कोर्ट के माध्यम से सिर्फ 6 दिनों के भीतर फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) मदुरै पहुंच गए थे। इसलिए छेड़छाड़ (Tampering) का कोई सवाल ही नहीं उठता। रही बात दस्तावेजों की, तो चूंकि बच्चे का जन्म चार्जशीट दाखिल होने के बाद हुआ था, इसलिए वे कागजात बाद में आए। लेकिन आरोपी के वकील ने उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फॉरेंसिक के डिप्टी डायरेक्टर से जिरह (Cross-Examination) की थी, जिससे साफ है कि उनके पास सारे कागज मौजूद थे।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा, ट्रायल कोर्ट डीएनए रिपोर्ट पर भरोसा करने में पूरी तरह सही था। यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि वह बच्चा अपीलकर्ता (आरोपी) और पीड़ित लड़की से ही पैदा हुआ था। गवाहों के मुकर जाने के बावजूद यह वैज्ञानिक सच बदला नहीं जा सकता।

हाई कोर्ट ने सजा और धाराओं में किया थोड़ा बदलाव

धारा में बदलाव: हालांकि, हाई कोर्ट ने कानूनी बारीकियों को देखते हुए आरोपी की सजा और धाराओं में एक तकनीकी संशोधन किया। निचली अदालत ने आरोपी को पॉक्सो की धारा 5(l) (बार-बार यौन उत्पीड़न करना) के तहत सजा दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि लड़की होस्टाइल हो चुकी है, इसलिए ‘बार-बार अपराध’ का कोई चश्मदीद सबूत नहीं है। लेकिन, चूंकि लड़की गर्भवती हुई थी, इसलिए कोर्ट ने उसे पॉक्सो की धारा 5(j)(ii) (ऐसा यौन हमला जिससे बच्ची गर्भवती हो जाए) के तहत दोषी माना।

सजा में राहत: कोर्ट ने मुरुगन की सजा को ‘प्राकृतिक जीवन के अंत तक उम्रकैद’ से घटाकर 20 साल का कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment for 20 Years) कर दिया।

विश्लेषण: ‘होस्टाइल गवाहों’ के युग में DNA की कानूनी ताकत

यह फैसला देश में बाल यौन शोषण और बलात्कार के मामलों में मील का पत्थर साबित होगा, जहां अक्सर लोक-लाज, सामाजिक दबाव या पैसों के लेन-देन के कारण पीड़ित परिवार कोर्ट में मुकर जाते हैं।

पुराना ढर्रा (पारंपरिक कानून)नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण (2026)
गवाहों पर निर्भरता: अगर पीड़ित और उसके माता-पिता अदालत में मुकर गए, तो गवाहों के अभाव में 90% मामलों में आरोपी बाइज्जत बरी (Acquittal) हो जाता था।फॉरेंसिक की सर्वोच्चता: इंसान डर, दबाव या लालच में आकर झूठ बोल सकता है या म्यूट (Silent) हो सकता है, लेकिन DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) कभी झूठ नहीं बोलता
अपराधी का बचना: सामाजिक बदनामी के डर से समझौते कर लेने के कारण आदतन अपराधी समाज में खुलेआम घूमते रहते थे।अकाट्य साक्ष्य: यदि वैज्ञानिक साक्ष्य (Scientific Evidence) की कस्टडी सही है, तो होस्टाइल गवाह भी अपराधी को जेल जाने से नहीं बचा सकते।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिए बने पॉक्सो कानून को असली दांत देता है। ग्रामीण इलाकों या कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले मामलों में अक्सर रसूखदार आरोपी पीड़ित परिवारों को डरा-धमकाकर या समझौता करके कोर्ट में ‘होस्टाइल’ करवा लेते हैं। अदालत ने यह नजीर पेश की है कि न्याय केवल इंसानी बयानों का मोहताज नहीं है; आधुनिक विज्ञान के इस दौर में फॉरेंसिक सबूत ही इंसाफ की सबसे बड़ी लाठी हैं। मुरुगन को अब अपने किए की सजा के तौर पर कम से कम 20 साल सलाखों के पीछे काटने होंगे।

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