Tuesday, October 27, 2026
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Uttarakhand Parivartan Party: दिल्ली में धारा 163 थी, ऋषिकेश में आप(पुलिस) मुझे रोकने वाले कौन होते हैं? …यह सरासर गुंडागर्दी है!

Uttarakhand Parivartan Party: एक नागरिक के रूप में मुझे देश में कहीं भी आने-जाने का संवैधानिक अधिकार है; आप मुझे रोकने वाले कौन होते हैं? …यह सरासर गुंडागर्दी (Gundagardi) है!”

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (UPP) के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को हिरासत में लेने पर राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने पुलिस की कार्रवाई को असंवैधानिक करार देते हुए पूछा कि क्या पुलिस नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए है या सरकार की छवि (Sarkar ki Chawi) बचाने के लिए।

मामला क्या है?: सोशल मीडिया पोस्ट और ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर हिरासत

घटना: उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी ने 19 जुलाई को एक फेसबुक पोस्ट लिखकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक व युवाओं/छात्रों के समर्थन में आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने का ऐलान किया था।

पुलिस कार्रवाई: उसी शाम दिल्ली जा रही ट्रेन में सवार होने के दौरान उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर रोक कर हिरासत में ले लिया।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus): उनके सहयोगी लाल मणि ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। बाद में पता चला कि उन्हें रामनगर पुलिस स्टेशन (नैनीताल) में रखा गया था, जहां से 24 घंटे के भीतर उन्हें रिहा कर दिया गया।

पत्नी को सौंपने का विवाद: राज्य सरकार ने पहले कोर्ट में कहा था कि 60 वर्षीय ध्यानी को उनकी “मां की कस्टडी” में सौंपा गया है, जिस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई थी कि एक बालिग नागरिक को आजाद छोड़ने के बजाय कस्टडी में क्यों दिया गया। बाद में वकील ने स्पष्ट किया कि उन्हें उनकी पत्नी की देखरेख में छोड़ा गया था।

हाई कोर्ट में तीखी बहस: “बड़े-बड़े शब्द मत बोलिए

21 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 (पुलिस के वैध निर्देशों का पालन) और धारा 163 (निषेधाज्ञा/धारा 144) का हवाला देकर हिरासत का बचाव करने की कोशिश की।

खंडपीठ और सरकारी वकील के बीच तीखी बहस

जस्टिस रवींद्र मैठाणी: “यह गुंडागर्दी है… आपने अपने पुलिस अधिकारी को क्या वैध निर्देश दिए थे? कि ‘आप दिल्ली मत जाओ, आप मार्च में शामिल होने मत जाओ’?”

सरकारी वकील: “माई लॉर्ड, वह दिल्ली में संज्ञेय अपराध (Cognisable Offence) करने जा रहे थे। वहां निषेधाज्ञा लागू थी।

जस्टिस मैठाणी: “अगर दिल्ली में निषेधाज्ञा लागू थी, तो वहां की पुलिस देखेगी। उत्तराखंड में आपके पास क्या क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) था? आप रोकने वाले कौन होते हैं?”

राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की छवि की दलील खारिज

जब सरकारी वकील ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की छवि (Sarkar ki Chawi) का हवाला दिया, तो जज साहब ने सख्त लहजे में कहा, बड़े-बड़े शब्द मत बोलिए, इनका इस केस में कोई मायने नहीं है। क्या आप सरकार की छवि बचाने के लिए हैं या किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए? संविधान के अनुच्छेद 19 (आवाजाही की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को इस तरह कुचला नहीं जा सकता।

अदालत का अगला रुख

अदालत ने प्रभात ध्यानी की रिहाई के बाद भी याचिका को बंद करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से ध्यानी को जबरन उतारने और हिरासत में लेने वाले संबंधित पुलिस अधिकारी को पक्षकार (Party) बनाने का निर्देश दिया है। डीजीपी (DGP), देहरादून व नैनीताल के एसएसपी और जीआरपी (GRP) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

केस मैट्रिक्स: उत्तराखंड हाई कोर्ट

विधिक एवं प्रक्रियात्मक बिंदुविवरण / अदालत का रुख
मामले का नामलाल मणि बनाम उत्तराखंड राज्य (Lal Mani v. State of Uttarakhand)
संबंधित अदालतउत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल
माननीय पीठजस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह
मुख्य मुद्दाशांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे नागरिक की अवैध गिरफ्तारी/हिरासत।
उल्लेखित संवैधानिक अधिकारअनुच्छेद 19 (देश में कहीं भी घूमने की आजादी) और अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता)।
अदालत का फैसलापुलिस कार्रवाई को अवैध ठहराया; संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब।
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