UP Bulldozer Action: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों के आरोपियों के घरों को ढहाए जाने की प्रथा पर बेहद तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणियां की हैं।
राज्य सरकार को विश्वास है कि कानून की अवहेलना करेंगे तो कुछ नहीं बिगड़ेगा
हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि राज्य द्वारा की जाने वाली ऐसी कार्रवाइयां मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ‘बुलडोजर न्याय’ की खुराक से पोषित समाज की “परिसंचारित ख़ून की प्यास (Blood Lust)” को शांत करने के लिए की जाती हैं। अदालत ने कहा, सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद राज्य सरकारें बेखौफ होकर (With Impunity) आरोपियों के मकानों पर बुलडोजर चला रही हैं। ऐसा लगता है जैसे देश की शीर्ष अदालत के फैसलों का कोई अस्तित्व ही न हो, या फिर राज्य सरकारों को पूरा भरोसा है कि कानून की अवहेलना करने पर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
बशीर बद्र के शेर से फैसले की शुरुआत
जस्टिस श्रीधरन ने अपने फैसले की शुरुआत प्रसिद्ध उर्दू कवि बशीर बद्र के इस मशहूर शेर से की, लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
फैसले की 4 मुख्य और तीखी बातें
‘बुलडोजर न्याय’ और समाज की मानसिकता
न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि मीडिया और सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित बुलडोजर संस्कृति ने समाज के एक बड़े वर्ग की मानसिकता को हिंसक बना दिया है, और राज्य सरकारें कानून के शासन को दरकिनार कर केवल इस जन-आक्रोश को शांत करने के लिए प्रतिशोधात्मक कार्रवाई (Retributive Action) कर रही हैं।
गरीबी, भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण का गठजोड़
जस्टिस श्रीधरन ने भारत में शहरीकरण, गरीबी और भ्रष्टाचार के तंत्र पर प्रकाश डालते हुए कहा, गरीबों की बस्तियां बनाम अमीरों की सोसाइटी: गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के कारण बनने वाली अनधिकृत कॉलोनियों को दशकों बाद अचानक अवैध घोषित कर ढा दिया जाता है। दूसरी ओर, अमीरों के बड़े-बड़े घर और गेटेड सोसाइटीज भी अक्सर पूरी तरह से वैध नहीं होतीं, लेकिन अपने धन, नौकरशाही और राजनीतिक संरक्षण के कारण वे “अछूती” (Untouchable) रहती हैं।
अधिकारियों की मिलीभगत: कोई भी घर रातों-रात खड़ा नहीं होता। जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी इसे रोकने की थी, वे राजनीतिक दबाव या रिश्वतखोरी के कारण वर्षों तक आंखें मूंदे रहते हैं।
राम मंदिर दान चोरी विवाद पर सख्त टिप्पणी
देश में भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण और संस्थागत गिरावट पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस श्रीधरन ने राम मंदिर में दान की चोरी के हालिया विवाद का जिक्र किया।
न्यायाधीश की टिप्पणी: “राम मंदिर में दान की चोरी से जुड़ा हालिया विवाद ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका (Proverbial Last Straw) साबित हुआ है। जो लोग राम मंदिर में हुई चोरी से भी बेअसर और बेपरवाह रहते हैं, उन्हें अब किसी बात पर शर्म नहीं आ सकती। यह भारतीय की अखंडता और नैतिकता के सबसे निचले स्तर (Nadir of Indian’s Integrity) को दर्शाता है।”
पीठ में असहमति (Split Verdict)
यह मामला POCSO एक्ट के आरोपी के रिश्तेदारों के मकान को निशाना बनाए जाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान आया था। खंडपीठ के दूसरे जज जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने 2 साल के स्वतः प्रतिबंध (Automatic Freeze) लगाने के आदेश से असहमति जताई, जिसके कारण यह मामला अब अंतिम फैसले के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित तीसरे जज के पास भेजा गया है।
केस मैट्रिक्स: फैसले के प्रमुख अंश
| कानूनी एवं सामाजिक पहलू | जस्टिस अतुल श्रीधरन के विचार |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| मूल मामला | POCSO आरोपी के परिवार के मकान पर बुलडोजर कार्रवाई की चुनौती |
| सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन | राज्य सरकारें बिना किसी डर के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन कर रही हैं। |
| बुलडोजर कार्रवाई का मुख्य कारण | मीडिया और सोशल मीडिया द्वारा निर्मित समाज की “प्रतिशोध और खून की प्यास” बुझाना। |
| भ्रष्टाचार पर टिप्पणी | राम मंदिर दान चोरी का संदर्भ देते हुए देश में नैतिक अखंडता के पतन पर चिंता व्यक्त की। |

