Friday, September 18, 2026
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Terror Funding: माओवादी टेरर फंडिंग से जमा हुई थी MBBS की फीस…क्यों कहा कि अपराध की कमाई से विधिक लाभ नहीं पा सकते, जानिए

Terror Funding: मद्रास हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) और आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत टेरर फंडिंग से जुड़े एक अत्यंत जटिल और असाधारण मामले में एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।

चेट्टिनाड एकेडमी ऑफ रिसर्च एंड एजुकेशन (मेडिकल कॉलेज) की कार्रवाई

हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ (Division Bench) ने चेट्टिनाड एकेडमी ऑफ रिसर्च एंड एजुकेशन (मेडिकल कॉलेज) की कार्रवाई को सही ठहराते हुए महिला डॉक्टर (एमबीबीएस ग्रेजुएट) की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने अप्रैल 2024 के एकल पीठ (Single Judge) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने कॉलेज को बिना फीस चुकाए सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था।

किसी छात्र की कॉलेज फीस को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने किया जब्त

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी छात्र की कॉलेज फीस को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा माओवादी आतंकवादी गतिविधियों की अवैध कमाई (Proceeds of Crime) मानकर जब्त कर लिया जाता है, तो वह छात्र ‘निर्दोष’ होने का हवाला देकर कॉलेज से मुफ्त में डिग्री या सर्टिफिकेट पाने का कोई विधिक या न्यायसंगत अधिकार (Equitable Right) नहीं रखता।

कानूनन कॉलेज के रिकॉर्ड में छात्रा की फीस ‘डिफॉल्ट’ (अवैतनिक) श्रेणी में आई

न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा और विधिक जवाबदेही के संतुलन पर टिप्पणी करते हुए कहा, भले ही यह सच हो कि अपीलकर्ता (एमबीबीएस छात्रा) को व्यक्तिगत रूप से इस मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है, लेकिन वह किसी अपराध के फल (Fruits of a Crime) से लाभ उठाने के समतामूलक अधिकार का दावा नहीं कर सकती। जैसे ही एनआईए ने कॉलेज के बैंक खाते से उस दागी राशि को जब्त किया, कानूनन कॉलेज के रिकॉर्ड में छात्रा की फीस ‘डिफॉल्ट’ (अवैतनिक) श्रेणी में आ गई।

मामला क्या था? (₹1.13 करोड़ की भारी-भरकम फीस और NIA की जब्ती)

यह पूरा विधिक और आपराधिक गतिरोध प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के वित्तपोषण की जांच के दौरान शुरू हुआ।

कोर्स पूरा होना और जब्ती: याचिकाकर्ता ने कॉलेज से अपनी 5 साल की एमबीबीएस की पढ़ाई और अनिवार्य रोटेटरी रेजिडेंट इंटर्नशिप (CRRI) पूरी कर ली थी। पढ़ाई के दौरान उसके परिवार की ओर से कॉलेज को कुल ₹1,13,70,500 (एक करोड़ तेरह लाख रुपये से अधिक) फीस के रूप में दिए गए थे।

एनआईए की चार्जशीट और एक्शन: एनआईए की जांच में खुलासा हुआ कि यह पूरी रकम जबरन वसूली (Extortion) और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के अवैध फंड से जुटाई गई थी। एनआईए की चार्जशीट में छात्रा के सगे भाई तरुण कुमार और उसके सगे चाचा प्रद्युम्न शर्मा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। एनआईए ने कॉलेज को जब्ती का नोटिस जारी कर पूरी फीस (₹1.13 करोड़) सरकारी खजाने में जब्त कर ली।

कॉलेज का कदम: फीस की रकम छिन जाने के बाद, कॉलेज ने छात्रा का कोर्स कंप्लीशन सर्टिफिकेट और एमबीबीएस डिग्री सर्टिफिकेट रोक दिया। कॉलेज का तर्क था कि उसने अपने संसाधन और फैकल्टी लगाकर छात्रा को डॉक्टर बनाया, लेकिन अंत में कॉलेज को ‘जीरो क्लीन करेंसी’ (साफ-सुथरा पैसा) मिला। वह बिना पैसे के सर्टिफिकेट नहीं दे सकता।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: सर्टिफिकेट बंधक नहीं, पर यह विशेष मामला है

एमबीबीएस स्नातक की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि शैक्षणिक प्रमाणपत्र कोई वित्तीय जमा या व्यापारिक वस्तु नहीं हैं जिन्हें ‘जनरल लियन’ (General Lien) या सुरक्षा गारंटी के रूप में बंधक बनाकर रखा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रा का किसी आतंकी संगठन से कोई लेना-देना नहीं है।

मद्रास हाई कोर्ट ने सामान्य दीवानी मामलों की इस दलील को स्वीकार करते हुए भी, वर्तमान मामले की गंभीरता के आधार पर निम्नलिखित विधिक सिद्धांत सामने रखे।

राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम सामान्य दीवानी कानून

अदालत ने माना कि सामान्य परिस्थितियों में फीस वसूली के लिए कॉलेज किसी छात्र की डिग्री नहीं रोक सकते। लेकिन वर्तमान मामला पूरी तरह अलग है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकी फंडिंग और यूएपीए (UAPA), 1967 के तहत आपराधिक संपत्तियों की जब्ती का एक असाधारण और अत्यंत पेचीदा विधिक ताना-बाना है।

कॉलेज की वित्तीय स्वायत्तता और न्याय का सिद्धांत

खंडपीठ ने कहा कि कॉलेज ने अपनी पूरी ईमानदारी से छात्रा को पढ़ाया। बिना किसी गलती के कॉलेज को इतनी बड़ी वित्तीय हानि (Financial Loss) उठाने के लिए मजबूर करना कानून और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

छात्रा के लिए विधिक विकल्प खुला है

अदालत ने छात्रा को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि उसके पास दो कानूनी रास्ते अभी भी खुले हैं। वह एनआईए की विशेष अदालत (NIA Court) के समक्ष जाकर यह साबित करे कि उसकी फीस का पैसा वैध था और वहां से जब्त फंड को रिलीज (मुक्त) कराए। या फिर, वह कॉलेज में नए सिरे से वैध तरीके से पूरी फीस जमा कर दे और तुरंत अपने सारे ओरिजिनल सर्टिफिकेट प्राप्त कर ले।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुमद्रास उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक आदेश (17 जून 2026)
अपीलकर्ताएमबीबीएस स्नातक (मेडिकल ग्रेजुएट छात्रा)।
प्रतिवादी पक्षकेंद्र सरकार, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC), तमिलनाडु मेडिकल काउंसिल और मेडिकल कॉलेज।
जब्त की गई फीस राशि₹1,13,70,500 (एनआईए द्वारा यूएपीए के तहत जब्त)।
मुख्य आरोपी (चार्जशीट में)तरुण कुमार (भाई) और प्रद्युम्न शर्मा (चाचा) – सीपीआई (माओवादी)।
अदालत का अंतिम आदेशअपील खारिज। बिना नए सिरे से फीस जमा किए या एनआईए कोर्ट से आदेश लाए बिना कॉलेज डिग्री देने के लिए बाध्य नहीं है।
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