Right To Practise: देश में वकालत के पेशे की नियामक संस्था (Regulator) और स्थानीय बार एसोसिएशनों के वर्चस्व को लेकर तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
वेरिफिकेशन रूल्स, 2015′ के नियम 6 की विधिक व्याख्या की
हाईकोर्ट के जस्टिस एन. तुकारामजी की एकल पीठ ने युवा अधिवक्ता विजय गोपाल द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) वेरिफिकेशन रूल्स, 2015’ के नियम 6 की विधिक व्याख्या की। अदालत ने इस नियम को पूरी तरह रद्द (Strike Down) करने के बजाय ‘रीड डाउन’ (Read Down – सीमित या नरम) कर दिया, ताकि इसके नियामक उद्देश्य भी बचे रहें और वकीलों पर कोई जबरदस्ती भी न हो।
आदेश में यह किया स्पष्ट
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य में नामांकित (Enrolled) किसी भी वकील के लिए किसी स्थानीय बार एसोसिएशन (Bar Association) का सदस्य बनना पूरी तरह स्वैच्छिक (Voluntary) है, अनिवार्य (Compulsory) नहीं। कोर्ट ने साफ किया कि बार एसोसिएशन की सदस्यता न होने मात्र से किसी भी वकील के प्रैक्टिस करने (Right to Practise Law) के विधिक अधिकार को छीना या सीमित नहीं किया जा सकता।
विधिक चुनौती और याचिकाकर्ता के तर्क (The Challenge)
याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि: 35 वर्षीय अधिवक्ता विजय गोपाल ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act) के तहत नामांकन कराया था और वे तेलंगाना हाई कोर्ट में वकालत करते हैं। उन्होंने स्वयं (Party-in-Person) कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा।
अनिवार्य सदस्यता की मार: याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि स्थानीय बार एसोसिएशनों की सदस्यता लेने के लिए भारी-भरकम वार्षिक फीस (Annual Fees) चुकानी पड़ती है। ‘अधिवक्ता अधिनियम, 1961’ में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि कोर्ट में वकालत करने के लिए किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता लेना अनिवार्य है।
संवैधानिक अधिकार: उन्होंने दलील दी कि बीसीआई का यह नियम संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) (संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(g) (पेशा चुनने या वकालत करने की स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन है। दमयंती नारंगा बनाम भारत संघ (1971) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि संगठन बनाने की स्वतंत्रता में ‘संगठन में शामिल न होने का अधिकार’ (Right not to associate) भी शामिल है।
क्या कहता है बीसीआई (BCI) का विवादित नियम 6?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015′ के नियम 6.1 के अनुसार, एक वकील को नामांकन के बाद उस बार एसोसिएशन में पंजीकरण कराना आवश्यक है जहां वह आमतौर पर अभ्यास करता है। हालांकि, यदि कोई वकील किसी मान्यता प्राप्त बार एसोसिएशन का सदस्य नहीं बनना चाहता, तो उसे राज्य बार काउंसिल को सूचित करना होगा और यह बताना होगा कि वह कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) का लाभ कैसे उठाना चाहता है। इस संबंध में राज्य बार काउंसिल का निर्णय अंतिम होगा।
याचिकाकर्ता इसे ‘अनिवार्य सदस्यता’ के रूप में देख रहे थे, जबकि बीसीआई की ओर से पेश वकीलों का कहना था कि यह केवल असली वकीलों की पहचान करने और उनके कल्याण (Welfare) के लिए बनाया गया एक प्रशासनिक नियम है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और फैसला
जस्टिस एन. तुकारामजी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसले गौरव कुमार बनाम भारत संघ (2024) का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी अधीनस्थ कानून (Delegated Legislation) अपने मूल अधिनियम (Parent Statute) से आगे जाकर वकीलों पर नई शर्तें या अयोग्यताएं नहीं थोप सकता। ‘अधिवक्ता अधिनियम’ के तहत केवल बार काउंसिल में नामांकन ही वकालत के लिए काफी है।
अदालत ने नियम 6 को ‘रीड डाउन’ करते हुए निम्नलिखित 3 मुख्य विधिक सिद्धांत तय किए
(A) सदस्यता पूरी तरह स्वैच्छिक: किसी भी बार एसोसिएशन का सदस्य बनना या न बनना पूरी तरह वकील की इच्छा पर निर्भर है।
(B) वकालत के अधिकार पर कोई रोक नहीं: बार एसोसिएशन की सदस्यता न होने या फीस न देने के आधार पर किसी भी वकील को अदालत में पैरवी करने से रोका नहीं जा सकता।
(C) गैर-वैधानिक निकायों का कोई नियंत्रण नहीं: बार एसोसिएशन कोई वैधानिक संस्था (Statutory Body) नहीं हैं, इसलिए उन्हें किसी वकील के वकालत करने के विधिक अधिकार को नियंत्रित या प्रभावित करने का कोई अधिकार नहीं है।
अदालत का निर्देश: हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को सख्त निर्देश दिया है कि वह देश की सभी राज्य बार काउंसिलों (State Bar Councils) को इस संबंध में स्पष्टीकरण और सर्कुलर जारी करे, ताकि किसी भी युवा या स्वतंत्र वकील को स्थानीय बार एसोसिएशनों द्वारा परेशान न किया जा सके।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | तेलंगाना उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक रुख (अप्रैल 2026) |
| याचिकाकर्ता | विजय गोपाल, अधिवक्ता (स्वयं उपस्थित – Party-in-Person)। |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एन. तुकारामजी (एकल पीठ)। |
| विवादित प्रावधान | बीसीआई सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015 का नियम 6। |
| संवैधानिक जुड़ाव | अनिवार्य सदस्यता थोपना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) और 19(1)(g) का उल्लंघन है। |
| अदालत का आदेश | नियम 6 को ‘रीड डाउन’ किया; बार एसोसिएशन की सदस्यता को पूरी तरह स्वैच्छिक घोषित किया। |
| बीसीआई को निर्देश | सभी राज्य बार काउंसिलों को सर्कुलर जारी कर स्पष्ट करने को कहा कि गैर-सदस्यता वकालत में बाधा नहीं है। |

