Pregnancy Case: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक गर्भवती महिला को 26 सप्ताह और 11 दिन (लगभग 27 सप्ताह) के गर्भ को समाप्त करने की विशेष अनुमति देते हुए यह मानवीय और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
रायगढ़-अलीबाग के जिला अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट
हाईकोर्ट के जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा, यदि भ्रूण में जन्मजात विकृतियां (Congenital Anomalies) पाई जाती हैं और मेडिकल बोर्ड सर्वसम्मति से गर्भपात की सलाह देता है, तो महिला की खराब आर्थिक स्थिति और बच्चे के जन्म के बाद महंगे इलाज का खर्च उठाने में उसकी असमर्थता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में महिला को गर्भधारण जारी रखने के लिए मजबूर करना मानसिक और वित्तीय रूप से दमनकारी होगा। अदालत ने रायगढ़-अलीबाग के जिला अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता महिला की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।
मामला क्या है?: भ्रूण के दिल में ‘चार गंभीर बीमारियां’ (Tetralogy of Fallot)
यह मामला एक विवाहित महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसके गर्भ में पल रहे भ्रूण के स्वास्थ्य को लेकर मेडिकल जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए थे।
मेडिकल बोर्ड का गठन: हाई कोर्ट के निर्देश पर रायगढ़-अलीबाग जिला अस्पताल के एक बहु-विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड (Multi-Specialist Medical Board) का गठन किया गया था। इस बोर्ड में स्त्री रोग विशेषज्ञ, प्रसूति रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेटिस्ट, मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक शामिल थे।
गंभीर बीमारी का पता चला: अल्ट्रासोनोग्राफी (USG) और नैदानिक जांच में सामने आया कि भ्रूण का दिल ‘टेट्रालॉजी ऑफ फैलोट’ (Tetralogy of Fallot) नामक गंभीर जन्मजात बीमारी से ग्रसित है। साथ ही उसकी लंबी हड्डियां भी सामान्य से छोटी थीं।
कई सर्जरी की थी जरूरत: डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि इस बीमारी के साथ यदि बच्चे का जन्म होता है, तो उसे जीवित रखने के लिए जन्म के तुरंत बाद टर्शियरी कार्डियक केयर और एक के बाद एक कई जटिल हार्ट सर्जरियों (Multiple Cardiac Surgeries) की आवश्यकता होगी।
हाई कोर्ट का रुख: महिला की आर्थिक स्थिति और मानसिक गरिमा का सम्मान
याचिकाकर्ता महिला की ओर से अधिवक्ता ध्रुति कपाड़िया ने अदालत को बताया कि महिला समाज के आर्थिक रूप से बेहद कमजोर वर्ग (Weaker Stratum of Society) से आती है। उसका परिवार बच्चे के जन्म के बाद होने वाले अत्यंत महंगे कार्डियक इलाज और लगातार होने वाले ऑपरेशनों का वित्तीय बोझ उठाने में पूरी तरह असमर्थ है।
खंडपीठ ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और महिला की परिस्थितियों को देखने के बाद गर्भपात की अनुमति दे दी।
कोर्ट के मुख्य विधिक बिंदु
मेडिकल बोर्ड की एकमत राय: अदालत ने नोट किया कि बोर्ड के सभी विशेषज्ञों ने बिना किसी शर्त या मतभेद के, स्पष्ट शब्दों में गर्भ को समाप्त करने (Termination of pregnancy) की सलाह दी थी। हालांकि मां मानसिक और व्यावहारिक रूप से पूरी तरह स्थिर पाई गई थी।
आर्थिक असमर्थता एक वैध आधार: कोर्ट ने माना कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत 24 सप्ताह के बाद भी असाधारण मामलों में गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है, यदि भ्रूण में गंभीर विसंगतियां हों। कोर्ट ने कहा कि जब इलाज का खर्च ही परिवार की पहुंच से बाहर हो, तो ऐसे में बच्चे और परिवार का भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
अस्पताल को तत्काल निर्देश: चूंकि याचिकाकर्ता महिला पहले से ही सिविल अस्पताल, रायगढ़ में भर्ती थी और डॉक्टरों की देखरेख में थी, इसलिए हाई कोर्ट ने चिकित्सा टीम को बिना किसी प्रशासनिक देरी के “जल्द से जल्द” (At the earliest) गर्भपात की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया।
हाई कोर्ट ने महिला की रिट याचिका को मंजूर करते हुए राज्य सरकार (जिसका प्रतिनिधित्व एजीपी श्रीमती एम.पी. ठाकुर ने किया) को आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा।
केस मैट्रिक्स: बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | बॉम्बे उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (मुंबई पीठ) |
| माननीय खंडपीठ | जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे |
| फैसले की तिथि | 22 जून, 2026 |
| याचिकाकर्ता के वकील | सुश्री ध्रुति कपाड़िया |
| भ्रूण की स्थिति | 26 सप्ताह और 11 दिन (लगभग 27 सप्ताह) |
| चिकित्सीय स्थिति | टेट्रालॉजी ऑफ फैलोट (Tetralogy of Fallot – जन्मजात हृदय रोग) |
| अदालत का अंतिम आदेश | गर्भपात की तत्काल अनुमति; रायगढ़ सिविल अस्पताल को जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश। |

