मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना |
| संबंधित कानून | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 161 एवं UP Prisoners’ Release on Probation Rules, 1938 |
| याचिकाकर्ता | राम प्रताप सिंह (फतेहपुर, उत्तर प्रदेश) |
| मुख्य सिद्धांत | राज्यपाल की क्षमादान/रिहाई की शक्ति नियमों से परे या मनमानी नहीं हो सकती; गलत आंकड़ों के आधार पर लिया गया फैसला अवैध है। |
Premature Release: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 (Article 161) के तहत राज्यपाल की समय-पूर्व रिहाई की शक्ति यद्यपि एक संप्रभु कार्यकारी शक्ति (Sovereign Executive Power) है, लेकिन इसका उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। यह शक्ति लागू नियमों और छूट नीति (Remission Policy) से विनियमित होती है।
न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर (Justice JJ Munir) और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना (Justice Tarun Saxena) की पीठ ने 7 साल की सजा पाने वाले एक कैदी की समय-पूर्व रिहाई से इनकार करने वाले आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने पाया कि रिहाई से इनकार का फैसला “अभिलेख पर प्रत्यक्ष त्रुटि” (Error Apparent on the Face of Record) से ग्रस्त था, क्योंकि उसमें कैदी द्वारा काटी गई वास्तविक सजा की अवधि को गलत दर्ज किया गया था।
अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- अनुच्छेद 161 की सीमाएं
- पीठ ने कहा कि भले ही अनुच्छेद 161 के तहत शक्ति एक संवैधानिक शक्ति (Constitutional Power) है (जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत राज्य सरकार की वैधानिक शक्ति से अलग है), लेकिन इसका फैसला मनमाना या सजा की अवधि जैसी बुनियादी तथ्यात्मक त्रुटि पर आधारित नहीं हो सकता।
- नियमों का पालन अनिवार्य
- ‘उत्तर प्रदेश कैदी रिहाई परक्राम्यता नियम, 1938′ (UP Prisoners’ Release on Probation Rules, 1938) के नियम 4 के उप-नियम (iii) के तहत, लागू श्रेणी का कैदी बिना छूट (Remission) के सजा का एक-तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद समय-पूर्व रिहाई का पात्र हो जाता है।
- बिना कारण की सिफारिशें अमान्य
- अदालत ने माना कि यदि पुलिस अधीक्षक (SP) या जिलाधिकारी (DM) की प्रतिकूल रिपोर्ट बिना किसी ठोस कारण के केवल उनकी व्यक्तिगत राय (Ipse Dixit) पर आधारित है, तो उसे आधार बनाकर रिहाई से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- दोषसिद्धि: फतेहपुर के याचिकाकर्ता (राम प्रताप सिंह) को 2002 में धारा 307/34 IPC (हत्या के प्रयास) के तहत 7 साल के कठोर कारावास और ₹2,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से उसकी अपीलें खारिज हो चुकी थीं।
- वास्तविक बनाम दर्ज सजा:
- जेल रिकॉर्ड के अनुसार: याचिकाकर्ता ने बिना छूट के 4 साल 6 महीने 6 दिन और छूट के साथ 5 साल 4 महीने की सजा काट ली थी (जो कुल 7 साल की सजा के आधे से अधिक है) और उसका आचरण संतोषजनक था।
- खारिज आदेश में दर्ज आंकड़े: जून 2025 में सरकार द्वारा जारी अस्वीकृति आदेश में गलत तरीके से दर्ज किया गया कि उसने बिना छूट के केवल 2 साल 6 दिन ही सजा काटी है।
- हाई कोर्ट का फैसला: अदालत ने माना कि यह अधिकारियों का पूरी तरह से “मस्तिष्क का प्रयोग न करना” (Non-application of Mind) और “स्पष्ट अवैधता” (Manifest Illegality) है।
अदालत का अंतिम आदेश
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 26 जून 2025 के रिहाई से इनकार करने वाले आदेश को रद्द (Quash) कर दिया।
- मामले को उत्तर प्रदेश सरकार को वापस भेजते हुए (Remitted) निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता की समय-पूर्व रिहाई की अर्जी पर हाई कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के 1 महीने के भीतर नया और नियमसंगत निर्णय लिया जाए।

