E-Courts: तकनीक के इस डिजिटल युग में मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए त्रिपुरा हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
डिजिटल लापरवाही के आधार पर बुजुर्गों की संपत्ति से जुड़ी अपील
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव की एकल पीठ ने सुकेश चंद्र साहा बनाम परिमल साहा के मामले में जिला न्यायाधीश (District Judge) के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसने एक डिजिटल लापरवाही के आधार पर बुजुर्गों की संपत्ति से जुड़ी अपील को सुनने से ही इनकार कर दिया था। कहा, भले ही यह सच है कि अदालतों की वेबसाइटें मौजूद हैं जहां पक्षकारों से अपने मामलों की स्थिति (Case Status) सत्यापित करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन जो लोग तकनीक के जानकार (Technologically Savvy) नहीं हैं, जैसे कि वर्तमान मामले में वरिष्ठ नागरिक, उन्हें ऐसा न करने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।
मामला क्या है?: उदयपुर संपत्ति विवाद और 23 महीने की देरी
यह कानूनी लड़ाई त्रिपुरा के उदयपुर में स्थित एक अचल संपत्ति के मालिकाना हक और कब्जे की बहाली से जुड़ी है।
एकतरफा फैसला (Ex-Parte Decree): वादी परिमल साहा ने दावा किया कि विवादित जमीन उनकी मां की थी और प्रतिवादी (जो अब अपीलकर्ता हैं) वहां केवल अनुमति से रह रहे थे। प्रतिवादियों के वकील ने बाद में खुद को केस से अलग कर लिया, जिसके कारण कोर्ट ने प्रतिवादियों के खिलाफ एकतरफा (Ex-parte) कार्यवाही की और 22 अगस्त 2023 को ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुना दिया।
अपील में 23 महीने की देरी: प्रतिवादियों (जो कि बुजुर्ग हैं) को इस एकतरफा फैसले की जानकारी देरी से मिली। जब वे जिला अदालत पहुंचे, तब तक २३ महीने और 8 दिन का विलंब हो चुका था। उन्होंने मर्यादा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 5 के तहत इस देरी को माफ करने (Condonation of Delay) के आवेदन के साथ अपील दायर की।
जिला जज का तकनीकी रुख: जिला न्यायाधीश ने बुजुर्गों की इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके कारण ‘अस्पष्ट’ हैं। जिला जज का तर्क था कि इस आधुनिक डिजिटल युग में पक्षकारों से यह उम्मीद की जाती है कि वे स्वयं इंटरनेट और वेबसाइट के माध्यम से अपने केस की स्थिति को लेकर सतर्क और जागरूक रहें। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट का रुख: बुजुर्ग परिस्थितियों के शिकार, न्याय से वंचित करना ठीक नहीं
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव ने जिला अदालत के इस फैसले को “गंभीर विधिक त्रुटि” (Grave Error) माना। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए बातें रेखांकित कीं।
तकनीक की अज्ञानता कोई अपराध नहीं
अदालत ने माना कि भारत के सामाजिक परिवेश में आज भी बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक स्मार्टफोन, इंटरनेट या अदालतों की जटिल ऑनलाइन केस-ट्रैकिंग प्रणालियों (e-Courts) का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं। डिजिटल युग की दुहाई देकर उनके वास्तविक कानूनी अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
बुजुर्गों की नीयत में खोट या लापरवाही नहीं थी
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड देखा और पाया कि वकील के हटने के बाद बुजुर्गों ने एकतरफा डिक्री को रद्द कराने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 9 नियम 13 के तहत भी पूरी निष्ठा से कानूनी प्रयास किए थे। कोर्ट ने कहा, प्रतिवादी केवल परिस्थितियों के शिकार (Victims of Circumstances) थे। यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने मामले को लटकाने की रणनीति अपनाई, या उनकी नीयत में खोट थी, या वे जानबूझकर निष्क्रिय या लापरवाह थे। इन परिस्थितियों में उन्हें मामले के गुण-दोष (Merits) पर लड़ने का एक अवसर न देना न्याय का मखौल (Travesty of Justice) उड़ाना होगा।
दांव पर है रहने का आशियाना
न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि चूंकि यह विवाद किसी मामूली बात पर नहीं, बल्कि अचल संपत्ति के मालिकाना हक और कब्जे की बहाली (Declaration of title and recovery of possession) से जुड़ा है, इसलिए तकनीकी आधारों पर किसी को सुने बिना बेदखल कर देना पूरी तरह अनुचित है।
अदालत का अंतिम आदेश
त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने जिला न्यायाधीश के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने देरी को माफ करते हुए कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी और जिला अदालत को इस स्वामित्व अपील (Title Appeal) को पुनः बहाल (Restore) करने का निर्देश दिया, ताकि मामले का निपटारा दोनों पक्षों को सुनकर गुण-दोष के आधार पर किया जा सके।
केस मैट्रिक्स: त्रिपुरा हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | त्रिपुरा उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (२०२६) |
| संबंधित अदालत | त्रिपुरा उच्च न्यायालय, अगरतला |
| माननीय न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव (एकल पीठ) |
| केस संदर्भ | सुकेश चंद्र साहा बनाम परिमल साहा (Sukesh Chandra Saha Vs Parimal Saha) |
| संबद्ध कानून | मर्यादा अधिनियम की धारा 5 (Limitation Act) और सीपीसी का आदेश 9 नियम 13 |
| विवाद की प्रकृति | उदयपुर (त्रिपुरा) में अचल संपत्ति का मालिकाना हक और कब्जा विवाद |
| अपीलकर्ताओं के वकील | एडवोकेट अभिजीत सेनगुप्ता |
| उत्तरदाता के वकील | एडवोकेट दिलीप कुमार दास चौधरी |
| अदालत का अंतिम निर्णय | जिला कोर्ट का आदेश रद्द; बुजुर्गों की अपील बहाल, केस का नए सिरे से मेरिट पर फैसला करने का निर्देश। |

