Friday, October 2, 2026
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Professional Fees: वकील की ₹4.8 करोड़ ‘बकाया फीस’ की याचिकाएं खारिज; कहा-वकील व क्लाइंट के बीच फीस का विवाद एक निजी मामला है…

Professional Fees: मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति शेखर बी. सर्राफ एवं न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी
मुख्य मुद्दाराज्य सरकार से ₹4.8 करोड़ की बकाया वकील फीस की वसूली।
कोर्ट का आदेशयाचिकाएं खारिज; फीस विवाद के लिए रिट याचिका के बजाय सिविल कोर्ट जाने का निर्देश।

Professional Fees: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग के विशेष वकील (Special Counsel) के रूप में काम करने का दावा करने वाले एक अधिवक्ता की उन चार याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें उन्होंने राज्य सरकार से करीब ₹4.8 करोड़ के पेशेवर शुल्क (Professional Fees) के भुगतान की मांग की थी।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सर्राफ (Justice Shekhar B. Saraf) और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (Justice Abdhesh Kumar Chaudhary) की पीठ ने 14 अगस्त के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वकील और क्लाइंट के बीच फीस का विवाद एक निजी मामला है और संविदात्मक (Contractual) विवादों के लिए रिट याचिका (Article 226) पोषणीय (Maintainable) नहीं है।

Professional Fees: अदालत के मुख्य कानूनी सिद्धांत और टिप्पणियां

  • फीस का भुगतान निजी मामला:“अदालत इस बात से बेखबर नहीं हो सकती कि साधारणतया वकील की फीस के भुगतान से जुड़ा विवाद अदालत में नहीं लाया जाना चाहिए। इसे पक्षों के बीच मध्यस्थता या सुलह (Mediation/Concilliation) से सुलझाया जाना चाहिए, भले ही उसमें एक पक्ष राज्य सरकार ही क्यों न हो।”
  • अनुच्छेद 226 के तहत वसूली नहीं:
    • पीठ ने कहा कि चूंकि राज्य सरकार द्वारा बकाये की बात को स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए भुगतान का परमादेश (Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता। तथ्यों के जटिल विवादों (Disputed Questions of Fact) का निस्तारण रिट याचिका में नहीं हो सकता।

Professional Fees: मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • याचिकाकर्ता का दावा: अधिवक्ता का दावा था कि वे लगभग 16 वर्षों तक उत्तर प्रदेश सरकार के वकील रहे हैं और सीतापुर, लखनऊ, हरदोई व रायबरेली जिलों से जुड़े विशेष अपीलों के लिए विशेष वकील नियुक्त किए गए थे। उन्होंने 2009 और 2011 के सरकारी आदेशों (Government Orders) के तहत ₹4.8 करोड़ की फीस बकाया होने का दावा किया।
  • राज्य सरकार का विरोध:
    1. राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वकील की फीस वसूली के लिए रिट याचिका पोषणीय नहीं है और यह मामला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
    2. सरकार के अनुसार, याचिकाकर्ता को अक्टूबर 2011 में ही पैनल से हटा दिया गया था और कई दावे उनके कार्यकाल के बाहर के हैं।
    3. बेसिक शिक्षा विभाग ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई पावती पत्र (Acknowledgment Letter) या स्वीकृत फीस बिल पेश नहीं किया है।
    4. राज्य ने 16 साल पुराने दावों पर समय सीमा (Limitation Period) से बाहर होने की भी आपत्ति जताई।

Professional Fees: उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने चारों याचिकाओं को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वे अपने वित्तीय दावों की वसूली के लिए सक्षम सिविल कोर्ट (Civil Court) में जा सकते हैं।

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