Cyber Crime: आपराधिक न्यायशास्त्र और नए कानूनों की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यह बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
सीबीआई की ओर से हाईटेक साइबर क्राइम मामले में चल रही सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज एक हाई-टेक साइबर क्राइम मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी की डिफॉल्ट बेल याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, एक बार जब जांच एजेंसी कानून द्वारा तय 60 या 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर अदालत में चार्जशीट (पुलिस रिपोर्ट) दाखिल कर देती है, तो आरोपी का डिफॉल्ट बेल (Default Bail) पाने का ‘अपरिहार्य अधिकार’ (Indefeasible Right) पूरी तरह से खत्म हो जाता है। नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(8) के तहत चार्जशीट की अतिरिक्त कॉपियां न जमा करना एक तकनीकी कमी मात्र है। इससे मूल चार्जशीट अवैध या अधूरी नहीं हो जाती और न ही इसके आधार पर आरोपी को जेल से छूटने का हक मिलता है।
मामला क्या है?: ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर ठगी का हाई-टेक नेटवर्क
यह मामला एक बेहद गंभीर और गहरे तक फैले साइबर आपराधिक नेटवर्क से जुड़ा है।
सीबीआई की कार्रवाई: याचिकाकर्ता (आरोपी) पर सीबीआई ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) और आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया था। आरोप था कि यह गिरोह देश के मासूम नागरिकों को निशाना बनाकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) और फ़िशिंग अटैक (Phishing Attacks) के जरिए करोड़ों रुपये की रंगदारी वसूल रहा था।
म्यूल अकाउंट्स और लॉजिस्टिक्स: इस अपराध की काली कमाई को जाली दस्तावेजों के आधार पर बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से खोले गए ‘म्यूल बैंक खातों’ (Mule Accounts) में रूट किया जा रहा था। याचिकाकर्ता पर मुख्य आरोपियों को चेकबुक, एटीएम कार्ड और फर्जी सिम कार्ड जैसे आपत्तिजनक सामान ट्रांसपोर्ट करने और परिचालन सहायता देने का आरोप था।
निचली अदालतों से झटका: सीबीआई ने तय समय के भीतर कोर्ट में मुख्य चार्जशीट दाखिल कर दी थी। हालांकि, आरोपी ने इस आधार पर विशेष जज और बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट में डिफॉल्ट बेल (वैधानिक जमानत) की अर्जी लगाई कि जांच एजेंसी ने बीएनएसएस के नियमों के मुताबिक चार्जशीट की अतिरिक्त फोटोकॉपी कोर्ट में समय पर जमा नहीं की थी। हाई कोर्ट द्वारा अर्जी खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: तकनीकी कमियां कानून के मकसद को नहीं हरा सकतीं
सर्वोच्च अदालत ने नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और पुराने कानून (CrPC) के प्रावधानों की तुलना करते हुए स्पष्ट किया कि बुनियादी कानूनी सिद्धांतों में कोई बदलाव नहीं आया है। कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष इस प्रकार हैं।
धारा 193(8) BNSS ‘निर्देशात्मक’ है, ‘अनिवार्य’ नहीं (Directory vs Mandatory)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 193(8) के तहत जांच अधिकारी द्वारा आरोपी को सौंपने के लिए चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां (Additional Copies) जमा करने का नियम केवल ‘निर्देशात्मक’ (Directory) है। इसकी अनदेखी को धारा 187(3) BNSS (जो तय समय में चार्जशीट न दाखिल होने पर डिफॉल्ट बेल की गारंटी देती है) के बराबर नहीं रखा जा सकता।
‘कपिल वधावन’ (2024) फैसले की नजीर
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ही अपने ऐतिहासिक फैसले [सीबीआई बनाम कपिल वधावन (2024)] का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि यदि अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किए गए कुछ दस्तावेज मूल चार्जशीट के साथ संलग्न नहीं भी हैं, तो भी उस चूक के कारण चार्जशीट को अधूरा नहीं माना जा सकता। मुख्य फॉर्म (धारा 193(3) BNSS) में तय समय पर रिपोर्ट पेश होना ही डिफॉल्ट बेल के अधिकार को खत्म करने के लिए काफी है।
अनुच्छेद 21 और कानून का वस्तुनिष्ठ संतुलन
अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत डिफॉल्ट बेल एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार तभी तक सक्रिय रहता है जब तक पुलिस अपनी जांच पूरी कर फाइनल रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को नहीं सौंप देती। एक बार जब कोर्ट ने समय पर दाखिल चार्जशीट पर संज्ञान (Cognizance) ले लिया, तो साधारण तकनीकी चूक के आधार पर आरोपियों को ‘अवांछित विधिक लाभ’ (Unmerited Right) नहीं दिया जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की आपराधिक अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया और निचली अदालतों के फैसलों को बहाल रखा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह साफ किया कि यदि आरोपी चाहे, तो वह मामले के तथ्यों और गुण-दोष के आधार पर नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए अलग से कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है, जिस पर अदालतें स्वतंत्र रूप से विचार करेंगी।
केस मैट्रिक्स: उच्चतम न्यायालय का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रक्रियात्मक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India), नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह (खंडपीठ) |
| मुख्य जांच एजेंसी | केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) |
| प्रासंगिक नए कानून / धारा | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(3), 193(8) और 187(3) |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड विधि पंकज ठाकर |
| जांच एजेंसी (CBI) के वकील | एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड मुकेश कुमार मारोरिया |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अपील खारिज; अतिरिक्त कॉपियां न देना डिफॉल्ट बेल का आधार नहीं। |

