Academic Session: सुप्रीम कोर्ट ने फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को आड़े हाथों लेते हुए कहा, फार्मेसी संस्थानों को मंजूरी (Approval) और एडमिशन शेड्यूल में बार-बार ढील मांगने पर तल्ख टिप्पणी की है।
शीर्ष अदालत ने रेगुलेटर की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की वेकेशन/आंशिक कार्यदिवस खंडपीठ ने पीसीआई द्वारा समयसीमा बढ़ाने की मांग करने वाली याचिका (Miscellaneous Application) पर सुनवाई करते हुए रेगुलेटर की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। शीर्ष अदालत ने कहा, देश में उच्च शिक्षा और विशेषकर फार्मेसी शिक्षा के गिरते स्तर के लिए खुद रेगुलेटरी अथॉरिटीज जिम्मेदार हैं। जब सरकारी और नियामक संस्थाएं ही तय समयसीमा (Timelines) का पालन नहीं करेंगी, तो निजी कॉलेज नियमों को क्यों मानेंगे? समस्या यह है कि आप प्रशासन कैसे चला रहे हैं, हमें नहीं पता, लेकिन यह तरीका सही नहीं है। ऐसा लगता है कि आप इन निजी कॉलेजों के साथ मिले हुए (Hand in Glove) हैं।
मामला क्या है?: 14 साल पुराने ऐतिहासिक आदेश की लगातार अनदेखी
यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए एक यूनिफॉर्म एकेडमिक कैलेंडर के उल्लंघन से जुड़ा है।
पार्श्वनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट (2012) की नजीर: सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में पार्श्वनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम एआईसीटीई (AICTE) मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसमें देश के सभी तकनीकी और प्रोफेशनल संस्थानों के लिए मंजूरी, संबद्धता (Affiliation), काउंसलिंग और एडमिशन की एक सख्त समयसीमा तय की गई थी ताकि शैक्षणिक सत्र समय पर शुरू हो सकें और शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित न हो।
PCI की पुरानी आदत: इस आदेश को आए लगभग 14 साल बीत चुके हैं, लेकिन फार्मेसी काउंसिल (PCI) लगभग हर साल किसी न किसी बहाने सुप्रीम कोर्ट के पास आकर डेडलाइन बढ़ाने की गुहार लगाती है। पिछले साल भी विस्तार मिलने के बाद, पीसीआई ने शैक्षणिक सत्र 2026 के लिए फिर से मंजूरी के शेड्यूल को आगे बढ़ाने के लिए एक नई अर्जी दाखिल कर दी।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: अब कोरोना (COVID) का बहाना बनाना बंद करें
सुनवाई के दौरान जब पीसीआई के वकील ने देरी के पीछे प्रशासनिक कारणों और ‘स्टैंडर्ड इंस्पेक्शन फॉर्मेट’ (SIF) आवेदनों को दाखिल करने की तारीख 28 फरवरी 2026 तक बढ़ाए जाने का तर्क दिया, तो कोर्ट बिल्कुल संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत के मुख्य विधिक बिंदु इस प्रकार हैं:
नियमों में ढील क्यों दी जाए?
अदालत ने पीसीआई के वकील से सीधे सवाल किया, “हम आप पर बार-बार मेहरबानी क्यों करें? आपको 2012 से इस टाइम शेड्यूल की जानकारी है। 14 साल लंबा वक्त होता है, अब तक आपको समयसीमा का पालन करना सीख जाना चाहिए था।”
कोविड-19 के असर का तर्क खारिज
नियामक संस्था के वकील ने जब कोरोना महामारी के कारण व्यवस्था पटरी से उतरने की बात कही, तो जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, कोविड के नाम पर अगले चार साल तक इसका बहाना नहीं बनाया जा सकता। कोरोना का दौर बहुत पहले खत्म हो चुका है, इसलिए अब उस आपदा का हवाला देकर अपनी प्रशासनिक सुस्ती को नहीं छिपाया जा सकता।
छात्रों के भविष्य के लिए ‘आखिरी मौका’
अदालत ने माना कि यदि इस साल विस्तार नहीं दिया गया, तो कई संस्थानों और छात्रों का पूरा साल बर्बाद हो जाएगा। इसलिए, छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने ‘अंतिम बार’ (Last Time) एक असाधारण छूट के रूप में समयसीमा बढ़ाने की मंजूरी दे दी।
अदालत का अंतिम आदेश: 3 दिन में हलफनामा देने का निर्देश
सर्वोच्च अदालत ने पीसीआई को सख्त निर्देश दिया है कि वह अगले तीन दिनों के भीतर एक लिखित शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करे। इस हलफनामे में काउंसिल को अदालत को यह अंडरटेकिंग (वचनबद्धता) देनी होगी कि वह अगले शैक्षणिक सत्र (Next Academic Year) से पार्श्वनाथ जजमेंट द्वारा निर्धारित समयसीमा का कड़ाई से पालन करेगी और भविष्य में कभी भी एक्सटेंशन के लिए कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाएगी। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अगले हफ्ते के लिए तय की है।
केस मैट्रिक्स: शीर्ष अदालत का आदेश (3 जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India), नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ) |
| प्रतिवादी नियामक संस्था | फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) |
| मूल विधिक नजीर (Precedent) | पार्श्वनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम AICTE (2012) |
| विवाद का मुख्य कारण | मान्यता (Approvals) और काउंसलिंग शेड्यूल में बार-बार विस्तार मांगना। |
| अदालत की तल्ख टिप्पणी | “रेगुलेटर्स की लापरवाही ही शिक्षा के स्तर में गिरावट की एकमात्र वजह है।” |
| अंतिम अंतरिम निर्देश | चालू सत्र के लिए आखिरी बार राहत; 3 दिन में अनुपालन का हलफनामा (Affidavit) सौंपने का आदेश। |

