NDPS Act: भांग की कानूनी स्थिति को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने यह बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है।
कानून की धारा 2(iii) में ‘कैनबिस/हैम्प’ (Cannabis/Hemp) की वैधानिक परिभाषा दी गई
हाईकोर्ट के जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने एक आरोपी की दोषसिद्धि (Conviction) और सजा के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) करते हुए उसकी आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया। पुलिस ने आरोपी को गांजे के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया था, लेकिन लैब टेस्टिंग में वह भांग निकला। अदालत ने कहा, नशीले पदार्थ और मनोप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के तहत ‘भांग’ (Bhang) को प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस कानून की धारा 2(iii) में ‘कैनबिस/हैम्प’ (Cannabis/Hemp) की जो वैधानिक परिभाषा दी गई है, उसमें गांजा और चरस को तो शामिल किया गया है, लेकिन भांग को इससे स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। यदि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में यह साबित हो जाता है कि जब्त किया गया पदार्थ गांजा नहीं बल्कि भांग है, तो आरोपी को एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला क्या है?: 11 किलो ‘गांजा’ बरामदगी का दावा, FSL रिपोर्ट में निकला ‘भांग’
यह कानूनी विवाद करीब 26 साल पुराने एक मामले से जुड़ा है, जिसमें पुलिस की थ्योरी लैब टेस्ट में फेल हो गई।
पुलिसिया कार्रवाई (अक्टूबर 2000): 17 अक्टूबर 2000 को चाईबासा बस स्टैंड के पास पुलिस की एक गश्ती टीम ने एक संदिग्ध व्यक्ति (अपीलकर्ता) को रोका, जो पुलिस को देखकर भागने की कोशिश कर रहा था। गवाहों और एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) की मौजूदगी में जब उसके वीआईपी ब्रीफकेस की तलाशी ली गई, तो उसमें से 12 पॉलिथीन पैकेट बरामद हुए।
गांजे का आरोप: पुलिस ने दावा किया कि इन पैकेटों में लगभग 11 किलोग्राम गांजा है। इसके बाद आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया और निचली अदालत ने उसे दोषी भी करार दिया।
लैब टेस्ट का यू-टर्न: आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट के समक्ष आरोपी के वकील ने 29 नवंबर 2002 की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट पेश की। इस वैज्ञानिक रिपोर्ट में स्पष्ट निष्कर्ष निकाला गया था कि जब्त किया गया पदार्थ ‘गांजा’ नहीं बल्कि ‘भांग’ था।
हाई कोर्ट का रुख: “गांजा और चरस प्रतिबंधित हैं, भांग नहीं”
अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या भांग को पास में रखना एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध है? राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि चूंकि एफएसएल रिपोर्ट में ही लिखा है कि गांजा और भांग दोनों ‘कैनबिस’ (एक ही पौधे के रूप) हैं, इसलिए इसे एनडीपीएस के तहत अपराध माना जाना चाहिए।
झारखंड हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए एनडीपीएस अधिनियम की वैधानिक व्यवस्था को स्पष्ट किया
धारा 2(iii) की वैधानिक परिभाषा
अदालत ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 2(iii) के तहत ‘कैनबिस (हैम्प)’ की परिभाषा में केवल निम्नलिखित चीजें शामिल हैं
चरस: कैनबिस के पौधे से निकाला गया राल (Resin)।
गांजा: कैनबिस के पौधे का फलदार या फूलदार शीर्ष (Leaves and seeds excluded when not accompanied by the tops)।
मिश्रण: चरस या गांजे से तैयार किया गया कोई भी पेय या ड्रिंक।
चूंकि इस पूरी वैधानिक परिभाषा में ‘भांग’ शब्द का कहीं कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए विधायिका की मंशा इसे इस कड़े कानून से बाहर रखने की थी।
अन्य राज्यों के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने अपने आदेश में देश की अन्य अदालतों जैसे कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा, बॉम्बे और राजस्थान उच्च न्यायालयों—के पुराने फैसलों का संदर्भ दिया, जिसमें पहले ही यह तय किया जा चुका है कि भांग रखने पर एनडीपीएस एक्ट लागू नहीं होता।
कोई वैज्ञानिक या विधिक प्रतिबंध नहीं
अदालत ने रेखांकित किया कि ऐसा कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि भांग को चरस या गांजे से तैयार किया जाता है। भांग आमतौर पर पौधे की सूखी पत्तियों से बनती है। कोर्ट ने कहा, उपरोक्त चर्चा और विशिष्ट कारणों को देखते हुए यह पूरी तरह से शीशे की तरह साफ (Crystal Clear) है कि ‘गांजा’ और ‘चरस’ को कैनबिस की परिभाषा में शामिल किया गया है, जबकि एनडीपीएस अधिनियम के तहत ‘भांग’ को इससे बाहर रखा गया है। राज्य सरकार द्वारा ऐसा कोई नियम या अधिसूचना भी जारी नहीं की गई है जो भांग को प्रतिबंधित ड्रग मानती हो। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह मामला भांग या कैनबिस के पौधों की अवैध खेती (Cultivation) का नहीं था, बल्कि केवल एक पदार्थ को पास में रखने का था, जिसे शुरू में गांजा समझा गया था लेकिन अंततः वह भांग निकला।
अदालत का अंतिम आदेश
झारखंड हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई सजा को “पूरी तरह से अवैध और कानूनन अनुचित” ठहराया। अदालत ने अपील को मंजूर करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और उसे सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
केस मैट्रिक्स: झारखंड हाई कोर्ट का निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय द्वारा तय की गई विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court), रांची |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव (एकल पीठ) |
| बरामदगी का दावा | पुलिस के अनुसार 11 किलो गांजा (अक्टूबर 2000) |
| FSL का वैज्ञानिक निष्कर्ष | जब्त पदार्थ गांजा नहीं, बल्कि ‘भांग’ है। |
| लागू मूल कानून | एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 2(iii) |
| अदालत का विधिक निष्कर्ष | भांग रखना एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध नहीं है; यह कानूनन प्रतिबंधित नहीं है। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अपील स्वीकार; आरोपी की सजा रद्द, बाइज्जत बरी। |

