Monday, August 17, 2026
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Retired Judge: जमीन विवाद में मारपीट के मामले में सेवानिवृत्त जज और वकील की सजा क्यों रही बरकरार…जानिए केस के फैसले से

Retired Judge: जमीन विवाद के एक पुराने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पटना हाईकोर्ट ने एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी (Retired Judge) और एक अभ्यास कर रहे वकील (Advocate) की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह की एकल पीठ ने बिनोद कुमार व अन्य बनाम बिहार राज्य मामले में सुनवाई करते हुए आरोपियों की अपील को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने मामले की लंबी अवधि और परिस्थितियों को देखते हुए उनकी जेल की सजा को पहले से काटी जा चुकी अवधि (Period Already Undergone) तक सीमित कर दिया है। अदालत ने कहा, पक्षकारों के बीच केवल पुराना विवाद या दुश्मनी होना, घायल गवाह (Injured Witness) की गवाही को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता; बल्कि ऐसी दुश्मनी अपराध को अंजाम देने का एक मकसद (Motive) भी हो सकती है।

मामला क्या है?: साल 2005 का लाठी और ‘खंती’ से हमले का विवाद

यह पूरा मामला 21 साल पुराना है, जो एक लंबे समय से चले आ रहे भूमि विवाद और मुकदमेबाजी का नतीजा था।

सुबह का हमला (27 फरवरी 2005): अभियोजन (Prosecution) के अनुसार, शिकायतकर्ता राहुल कुमार सुबह शौच के बाद लौट रहा था। इसी दौरान आरोपी वकील बिनोद कुमार ने लोहे की ‘खंती’ (Crowbar) से उस पर हमला कर दिया।

जज ने मारी लाठी: इसके बाद, तत्कालीन न्यायिक अधिकारी (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) योगेंद्र राम ने राहुल के सिर पर लाठी से वार किया। आरोप यह भी था कि उन्होंने राहुल की सोने की चेन छीन ली। जब राहुल की मां उसे बचाने दौड़ीं, तो बिनोद कुमार और परिवार के अन्य सदस्यों (राजन कुमार और सुचिता कुमारी) ने उनके साथ भी मारपीट की, बाल खींचे और थप्पड़ मारे।

निचली अदालत का 2014 का फैसला: पुलिस ने जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ हत्या के प्रयास (धारा 307) और चोरी (धारा 379) सहित कई गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, 2014 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें केवल स्वेच्छा से चोट पहुँचाने (IPC की धारा 323/34) का दोषी पाया और प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत पर्सनल बॉन्ड पर रिहा कर दिया था। इसके खिलाफ दोषियों ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

हाई कोर्ट का रुख: घायल गवाह की गवाही सबसे पुख्ता

दोषियों ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि यह मामला गांव की राजनीति और पुरानी दुश्मनी के कारण झूठा फंसाने का है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एक गवाह मुकर (Hostile) चुका है। जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह ने इन दलीलों को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए।

मुकरने वाले गवाह से केस कमजोर नहीं होता: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि रिकॉर्ड पर अन्य विश्वसनीय और ठोस सबूत मौजूद हैं, तो किसी एक गवाह के मुकर जाने से अभियोजन का पूरा मामला अविश्वसनीय नहीं हो जाता।

घायल गवाह की अहमियत: अदालत ने पाया कि जिरह (Cross-examination) के दौरान घायल राहुल कुमार के बयानों में ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे उसकी गवाही पर संदेह किया जा सके। कानून में माना जाता है कि एक घायल गवाह आम तौर पर असली अपराधी को छोड़कर किसी बेकसूर को नहीं फंसाएगा।

गंभीर धाराएं हटीं, पर मारपीट साबित: कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ‘हत्या के प्रयास’ (धारा 307) या ‘लूट’ के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया, लेकिन यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि सभी आरोपियों ने सामान्य इरादे (Common Intention) से राहुल और उसकी मां के साथ मारपीट की थी।

अदालत का अंतिम आदेश

पटना हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 323 और 34 के तहत दी गई दोषसिद्धि को पूरी तरह सही ठहराया। हालांकि, यह देखते हुए कि घटना 2005 की है और आरोपी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजर चुके हैं, कोर्ट ने उनकी सजा को उनके द्वारा पहले से काटी गई अवधि में बदल दिया और निर्देश दिया कि यदि वे संशोधित सजा पूरी कर चुके हैं, तो उन्हें तुरंत मुक्त किया जाए।

केस मैट्रिक्स: पटना हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांपटना उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतपटना उच्च न्यायालय, बिहार
माननीय न्यायाधीशजस्टिस पूर्णेन्दु सिंह (एकल पीठ)
केस संदर्भबिनोद कुमार व अन्य बनाम बिहार राज्य (Binod Kumar & Ors. v. The State of Bihar)
मुख्य दोषीसेवानिवृत्त जज योगेंद्र राम और वकील बिनोद कुमार
अपराध की प्रकृति2005 में जमीन विवाद के चलते लोहे की खंती और लाठी से हमला करना।
विधिक सिद्धांतपुरानी दुश्मनी घायल गवाह के बयान को खारिज करने का आधार नहीं, बल्कि अपराध का मकसद हो सकती है।
अदालत का निर्णयदोषसिद्धि बरकरार; सजा को ‘पहले से काटी गई जेल अवधि’ तक संशोधित किया गया।

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