Certification System: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उप्र में जाति प्रमाण पत्र जारी करने की जटिल और खामियों भरी प्रक्रिया में बड़े सुधार की वकालत करते हुए राज्य सरकार को महत्वपूर्ण और आधुनिक डिजिटल सुझाव दिया है।
अक्सर संदिग्ध या गलत जाति प्रमाण पत्र जारी हो जाते हैं
हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने ‘यूपी कोली कोरी प्रतिनिधि सभा’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की। कहा, वर्तमान समय में तकनीक इतनी सक्षम हो चुकी है कि राज्य सरकार पूरे प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के नागरिकों के लिए एक मजबूत, पारदर्शी और पूरी तरह से सॉफ्टवेयर-आधारित प्रमाण पत्र प्रणाली (Software-Based Certification System) शुरू कर सकती है। ऐसा करने से निचले स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों, जो अक्सर तहसीलदार रैंक से ऊपर के नहीं होते, उनके पास मौजूद ‘अवांछित और असीमित विवेकाधिकार’ (Unbridled Discretion) को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकेगा, जिसके कारण अक्सर संदिग्ध या गलत जाति प्रमाण पत्र जारी हो जाते हैं।
मामला क्या है?: ‘कोली’ और ‘कोरी’ के उच्चारण (Phonetics) का भ्रम
अदालत के सामने आई यह जनहित याचिका उत्तर प्रदेश में दो जातियों के नामों में ध्वन्यात्मक समानता (Phonetic Similarity) के कारण हो रहे गलत प्रमाण पत्रों के आवंटन से जुड़ी है।
विवाद की जड़: याचिकाकर्ता संगठन ने चिंता जताई थी कि ‘कोली’ (Koli) जाति के लोगों को, जो उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) के तहत सूचीबद्ध नहीं हैं, धोखे से या गलती से ‘कोरी’ (Kori) जाति के नाम पर अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है। ‘कोरी’ जाति राष्ट्रपति के आदेश (Presidential Order) के तहत एक मान्यता प्राप्त अनुसूचित जाति है।
अधिकारियों की लापरवाही: याचिका में कहा गया कि हालांकि अनुसूचित जातियों की सूची पूरी तरह से राष्ट्रपति के आदेश द्वारा तय और नियंत्रित होती है, लेकिन स्थानीय स्तर के अधिकारी केवल इस आधार पर गलत प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं क्योंकि कुछ जातियों के नाम सुनने में एक जैसे लगते हैं या उनकी स्पेलिंग (वर्तनी) लगभग समान होती है।
हाई कोर्ट का रुख: निचले स्तर के अफसरों की मनमानी पर तकनीक का चाबुक
भले ही सुनवाई के दिन याचिकाकर्ता की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ, लेकिन अदालत ने मामले के व्यापक सामाजिक और विधिक महत्व को देखते हुए राज्य सरकार की तरफ से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) मनीष गोयल, अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ए.के. गोयल और स्थायी वकील अंकित गौड़ को सुना।
सुनवाई के बाद खंडपीठ ने वर्तमान सत्यापन प्रक्रिया (Verification Process) में सुधार के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया।
तहसीलदार स्तर की मनमानी पर रोक
हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि वर्तमान व्यवस्था में स्थानीय राजस्व अधिकारियों (जैसे लेखपाल, कानूनगो और तहसीलदार) के पास अत्यधिक और अनियंत्रित शक्तियां हैं। वे अपनी मर्जी या व्यक्तिगत वेरिफिकेशन के आधार पर प्रमाण पत्र जारी करते हैं, जिससे भ्रष्टाचार और मानवीय त्रुटि (Human Error) की संभावना बनी रहती है। सॉफ्टवेयर आधारित सेंट्रलाइज्ड सिस्टम इस मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम कर देगा।
QR कोड और यूनिक नंबरिंग (Unique Numbering)
बेंच ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार को उन डिजिटल सत्यापन मॉडलों को अपनाना चाहिए जो पहले से ही देश के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे डिजिटल वित्तीय लेन-देन या आधार सत्यापन) में मानक अभ्यास (Standard Practice) बन चुके हैं। अदालत ने कहा, अगर राज्य सरकार द्वारा प्रमाण पत्रों में यूनिक नंबरिंग (एक विशिष्ट संख्या) और क्यूआर कोड (QR Code) आधारित सत्यापन प्रक्रिया उपलब्ध कराई जाती है, तो इससे न केवल प्रमाण पत्रों का उचित ऑडिट और क्रॉस-चेक किया जा सकेगा, बल्कि आम जनता और विभागों के पास भी सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी असली प्रमाण पत्रों की प्रामाणिकता जांचने का एक विश्वसनीय साधन मौजूद होगा।
अदालत का अंतिम आदेश और सरकार का रुख
हाई कोर्ट की इन दूरदर्शी और तकनीकी टिप्पणियों के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने इस विषय पर शासन स्तर से व्यापक और विस्तृत निर्देश (Comprehensive Instructions) प्राप्त करने के लिए अदालत से कुछ समय की मोहलत मांगी। अदालत ने सरकार के अनुरोध को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि इस मामले को 23 जुलाई 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए और इसे उस दिन के ‘टॉप 10’ (Top 10) मुख्य मुकदमों में शामिल रखा जाए ताकि इस पर त्वरित प्रगति हो सके।
केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट निर्देश (2026)
| प्रशासनिक और विधिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की स्थिति और सुझाव |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी |
| याचिकाकर्ता | यूपी कोली कोरी प्रतिनिधि सभा (जनहित याचिका) |
| मूल समस्या | उच्चारण की समानता के कारण गैर-SC (कोली) को SC (कोरी) का प्रमाण पत्र जारी होना। |
| प्रस्तावित समाधान | सॉफ्टवेयर-आधारित ऑटोमेटेड सिस्टम, यूनिक नंबर और QR कोड वेरिफिकेशन। |
| अदालत का उद्देश्य | तहसीलदार/स्थानीय अधिकारियों के असीमित विवेकाधिकार (Discretion) को समाप्त करना। |
| अगली सुनवाई की तिथि | 23 जुलाई 2026 (टॉप 10 मामलों में) |

