Animation Centre Lucknow: लखनऊ के अलीगंज में एनिमेशन सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है।
पूरी त्रासदी ‘प्रशासनिक विफलता और मिलीभगत’ का नतीजा
हाईकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने इस पूरी त्रासदी को ‘प्रशासनिक विफलता और मिलीभगत’ का नतीजा बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर समय रहते अवैध निर्माण को रोका गया होता, तो इन मासूमों की जान बचाई जा सकती थी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) और दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने वाली रिपोर्ट मांगी है। कहा, अग्निकांड जैसी दर्दनाक घटनाओं के तुरंत बाद प्रशासनिक अधिकारी ‘एक्शन मोड’ में आ जाते हैं, लेकिन उनकी यह तत्परता और फुर्ती बहुत जल्द ही ठंडी पड़ जाती है। अदालतें भी ऐसे मामलों का संज्ञान लेती हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है और फिर कोई नया अग्निकांड मासूमों की जान ले लेता है।
अदालत की रडार पर आईं 4 बड़ी प्रशासनिक और कानूनी खामियां
एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने इस हादसे के पीछे सरकारी विभागों की चार सबसे बड़ी लापरवाहियों को बेनकाब किया।
कानून का अजीब झोल: 15 मीटर से छोटी इमारतों को फायर NOC से छूट!
सुनवाई के दौरान राज्य के स्थायी वकील ने कोर्ट को बताया कि यूपी फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज एक्ट, 2022 की धारा 26 के तहत, 15 मीटर से कम ऊंचाई वाली बहुमंजिला इमारतों को फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट (NOC) लेने से पूरी तरह छूट दी गई है।
कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने इस प्रावधान को पहली नजर में ही “तर्कहीन और अनुचित” (Prima Facie Unreasonable) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि अलीगंज का यह हादसा खुद यह साबित करता है कि 15 मीटर से छोटी इमारतें भी कितनी खतरनाक हो सकती हैं। सरकार को इस कानून की तुरंत समीक्षा (Revisit) करनी चाहिए।
नक्शा ‘आवासीय’ का, बना दी ‘कमर्शियल’ बिल्डिंग
अदालत के पूछने पर सामने आया कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) से इस इमारत का नक्शा विशुद्ध रूप से रहने (Residential) के लिए पास कराया गया था, लेकिन वहां धड़ल्ले से कमर्शियल एक्टिविटी (एनिमेशन सेंटर) चल रही थी।
चौंकाने वाला खुलासा: कोर्ट ने नोट किया कि 10 मई 2016 को इस बिल्डिंग के अवैध बेसमेंट को गिराने (Demolition) का आदेश जारी हुआ था, लेकिन महज दो महीने बाद यानी 5 जुलाई 2016 को इस ध्वस्तीकरण आदेश को रहस्यमय तरीके से वापस (Withdraw) ले लिया गया। कोर्ट ने पूछा कि जब अवैध निर्माण सरेआम चल रहा था, तो यूपी नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
आवासीय पते पर 20 किलोवाट का कमर्शियल बिजली कनेक्शन!
बिजली कॉरपोरेशन (UPPCL/MVVNL) ने कोर्ट को बताया कि साल 2016 में इस परिसर को केवल 2 किलोवाट (KV) का घरेलू कनेक्शन दिया गया था। लेकिन बाद में, विद्युत सुरक्षा निदेशक की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के आधार पर इसे बढ़ाकर 20 किलोवाट का कमर्शियल कनेक्शन कर दिया गया।
कोर्ट का रुख: कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कागजों पर वह एक आवासीय इमारत थी, तो बिजली विभाग के अधिकारियों ने आंखें मूंदकर कमर्शियल कनेक्शन कैसे दे दिया? अगर उसी स्तर पर जांच हो जाती, तो यह हादसा कभी न होता।
‘मुआवजे के खेल’ पर उठाए सवाल: किसी को 50 लाख, किसी को महज 12 लाख क्यों?
अदालत को बताया गया कि मृतकों के परिवारों को अलग-अलग विभागों की तरफ से कुल 12-12 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया है।
कोर्ट का रुख: बेंच ने राज्य सरकार की मुआवजा नीति में एकरूपता न होने पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा, “हम देखते हैं कि कुछ हादसों में सरकार 25 लाख या 50 लाख रुपये का मुआवजा देती है, जबकि इस मामले में यह महज कुछ लाख रुपये ही है। आखिर सरकार के पास मुआवजे की रकम तय करने का पैमाना या कानूनी आधार क्या है?”
हाई कोर्ट के कड़े निर्देश: इन बड़े अफसरों को बनाया ‘पार्टी’
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई से पहले उत्तर प्रदेश के कई शीर्ष अधिकारियों को इस मामले में प्रतिवादी (Opposite Parties) के रूप में शामिल करें, इसमें आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव, उ.प्र. आवास एवं विकास परिषद के आवास आयुक्त, ऊर्जा (बिजली विभाग) के प्रमुख सचिव हैं।
राज्य सरकार को आदेश: कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह इन सभी बिंदुओं पर अलग-अलग जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल करे। साथ ही, बिल्डिंग बायलॉज और फायर सेफ्टी का उल्लंघन करने वाले दागी अफसरों पर सख्त आपराधिक और दंडात्मक देनदारी (Penal Liability) तय करने वाली नियमावली पेश करे। अदालत की सहायता के लिए अवध बार एसोसिएशन के सदस्य और अधिवक्ता श्री राकेश कुमार को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae – अदालत का मित्र) नियुक्त किया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को होगी।
केस शीट: लखनऊ अग्निकांड सुनवाई (2026)
| प्रशासनिक पहलू (Aspects) | हाई कोर्ट द्वारा चिह्नित विफलताएं और आदेश |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला |
| कानूनी खामी | यूपी फायर एक्ट 2022 की धारा 26 (15 मीटर से कम की इमारतों को फायर एनओसी से छूट) को अनुचित माना। |
| प्रशासनिक विफलता | 2016 का डेमोलिशन ऑर्डर वापस लिया गया; आवासीय प्लॉट पर कमर्शियल गतिविधि और भारी बिजली लोड की अनुमति दी गई। |
| मुआवजे पर आपत्ति | मुआवजे की रकम में एकरूपता की कमी; सरकार से पूछा- ‘पैमाना क्या है?’ |
| अगला कदम | सरकार को सुरक्षा SOP बनाने और दोषी अफसरों पर सख्त कार्रवाई तय करने का निर्देश। |
| अगली सुनवाई की तिथि | 4 अगस्त 2026 |

