Vigilance Commission: तमिलनाडु में प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार और अनुशासनिक मामलों में हो रही भारी देरी पर मद्रास हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणी की है।
समर्पित और निरंतर कार्रवाई से ही भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है
हाईकोर्ट के जस्टिस बी. पुगालेंदी की एकल पीठ ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो सरकार वास्तव में ‘भष्टाचार मुक्त शासन’ का दावा करती है, उसे सबसे पहले एक पूर्णकालिक और स्वतंत्र सतर्कता आयुक्त (Independent Vigilance Commissioner) की नियुक्ति करनी चाहिए। अदालत ने कहा, देश में हर नई सरकार सत्ता में आते ही यह ढिंढोरा पीटती है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही है। भ्रष्टाचार आज हर जगह इतनी गहराई तक जड़ें जमा चुका है कि इसे केवल नारों से नहीं, बल्कि समर्पित और निरंतर कार्रवाई से ही खत्म किया जा सकता है। और यह तभी मुमकिन है जब सतर्कता आयोग (Vigilance Commission) और भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (DVAC) को मजबूत और स्वतंत्र बनाया जाए।
अतिरिक्त प्रभार (Additional Charge) के भरोसे चल रहा है सतर्कता आयोग
हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता और हैरानी जताई कि तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में सतर्कता आयोग का कामकाज किसी स्थायी अफसर के हाथ में नहीं है।
अदालत की टिप्पणी: “वर्तमान में राज्य के पास कोई नियमित या स्थायी सतर्कता आयुक्त नहीं है। सरकार के एक बेहद संवेदनशील और बड़े विभाग को संभालने वाले एक वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी को इस बेहद महत्वपूर्ण पद का ‘अतिरिक्त प्रभार’ दे दिया गया है।”
स्वतंत्रता की जरूरत: कोर्ट ने साफ किया कि सतर्कता आयुक्त का काम सरकार को प्रशासनिक चुनौतियों, सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार को रोकने के तरीकों और सामने आने वाले व्यक्तिगत घोटालों पर निष्पक्ष सलाह देना है। अगर वह अधिकारी खुद किसी अन्य बड़े विभाग का बोझ संभाल रहा होगा, तो वह सतर्कता आयोग के कामकाज पर पूरा ध्यान केंद्रित (Wholly Concentrating) नहीं कर पाएगा।
फाइलों में दबा इंसाफ: 5 साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं जांचें
यह मामला विभिन्न अनुशासनिक कार्यवाही न्यायाधिकरणों (Tribunals for Disciplinary Proceedings – TDP) के समक्ष लंबित पड़े सरकारी कर्मचारियों के मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आया। तमिलनाडु में ये न्यायाधिकरण सरकारी सेवा नियमावली, 1955 के तहत विभागीय और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करते हैं। अदालत के प्रशासनिक नियंत्रण में जब इन ट्रिब्यूनल्स की प्रोग्रेस रिपोर्ट मंगवाई गई, तो देरी का एक भयावह आंकड़ा सामने आया, जो सरकारी गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ा रहा था।
क्या है सरकारी नियम? मानव संसाधन प्रबंधन विभाग के सरकारी आदेश (G.O.) के मुताबिक, किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनिक कार्यवाही को पूरा करने की अधिकतम समय सीमा 1 वर्ष तय की गई है।
हकीकत की रिपोर्ट (लंबित मामलों का ग्राफ)
27 जांचें: पिछले 5 वर्षों से अधिक समय से लटकी हुई हैं।
08 जांचें: 4 साल से अधिक समय से लंबित हैं।
34 जांचें: 3 साल से अधिक समय से धूल फांक रही हैं।
अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि साल 1976 तक इन ट्रिब्यूनल्स की कमान न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) के हाथ में होती थी, लेकिन बाद में उनकी जगह आईएएस (IAS) और जिला राजस्व अधिकारियों (DRO) जैसे प्रशासनिक अफसरों को बैठा दिया गया, जिससे मामलों के निपटारे की गति और प्रभावित हुई।
हाई कोर्ट के कड़े निर्देश और सरकार का आश्वासन
सुनवाई के दौरान राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) ने अदालत को भरोसा दिलाया कि राज्य के सभी छह अनुशासनिक कार्यवाही आयुक्तों को सुनवाई के दिन बढ़ाने और लंबे समय से लंबित मामलों को बिना किसी देरी के तेजी से निपटाने का अनुरोध किया गया है। इस पर अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए सतर्कता आयुक्त और ट्रिब्यूनल्स को सख्त निर्देश जारी किए।
गवाहों की निगरानी: सतर्कता आयुक्त खुद इस बात की निगरानी करेंगे कि ट्रिब्यूनल में हर दिन कितने गवाहों की जांच हो रही है। गवाहों को समय पर पेश करना और लोक अभियोजकों (Public Prosecutors) की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना सतर्कता आयुक्त की जिम्मेदारी होगी।
समय सीमा का सख्ती से पालन: ट्रिब्यूनल्स को आदेश दिया गया है कि वे सरकारी आदेशों (G.O.) में तय की गई समय सीमा के भीतर ही इन याचिकाओं पर अनुशासनिक कार्यवाही को समयबद्ध तरीके से पूरा करें।
केस सारांश: मद्रास हाई कोर्ट जजमेंट (2026)
| विधिक और प्रशासनिक बिंदु | अदालत की टिप्पणियां और निर्देश |
| संबंधित मामला | The Commissioner and Others v M Rathinam and Others |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बी. पुगालेंदी |
| मुख्य मुद्दा | तमिलनाडु में स्वतंत्र सतर्कता आयुक्त की कमी और विभागीय जांच में अत्यधिक देरी। |
| वर्तमान स्थिति पर आपत्ति | संवेदनशील विभाग के प्रमुख अधिकारी को सतर्कता आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार देना गलत। |
| नियम उल्लंघन | 1 साल की तय सीमा के बावजूद दर्जनों मामले 3 से 5 साल से लंबित। |
| अदालत का आदेश | ट्रिब्यूनल्स को समयबद्ध तरीके से जांच पूरी करने और सतर्कता तंत्र को स्वतंत्र करने का निर्देश। |

