Thursday, August 20, 2026
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Corrupt Practices: गंभीर आरोपों में सिर्फ देरी के आधार पर विभागीय जांच रद्द नहीं हो सकती…पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ जांच से जुड़ा केस पढ़ें

Corrupt Practices: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने विभागीय जांच में होने वाली देरी और उसकी कानूनी वैधता को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

राज्य सरकार ने सिंगल जज के फैसले को दी थी चुनौती

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लीसा गिल और जस्टिस निनाला जयसूर्या की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि समय-सीमा से जुड़े सरकारी आदेश (जैसे G.O.Ms.No.679) केवल ‘निर्देशात्मक’ (Directory) होते हैं, ‘अनिवार्य’ (Mandatory) नहीं। अदालत ने कहा, यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार या शक्तियों के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप हैं, तो केवल जांच पूरी होने में हुई देरी (Delay in Conclusion) के आधार पर पूरी अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Proceedings) को रद्द नहीं किया जा सकता। विशेषकर तब, जब इस देरी के लिए केवल नियोक्ता (Employer) ही पूरी तरह जिम्मेदार न हो, बल्कि कर्मचारी का आचरण और कानूनी परिस्थितियां भी इसका कारण रही हों। अदालत ने यह फैसला राज्य सरकार द्वारा दायर एक अपील पर दिया, जिसमें एक सिंगल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसने देरी के आधार पर एक पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ चल रही जांच को खारिज कर दिया था। खंडपीठ ने सिंगल जज के आदेश को रद्द करते हुए जांच को 3 महीने में पूरा करने का निर्देश दिया है।

पृष्ठभूमि: भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरा था ट्रैफिक इंस्पेक्टर

यह मामला ट्रैफिक पुलिस (यातायात-II) के एक पूर्व इंस्पेक्टर से जुड़ा है, जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोप थे।

आरोप: लॉरी चालकों से अवैध वसूली, आधिकारिक शक्ति का दुरुपयोग, यातायात कर्मियों को प्रताड़ित करना, और फ्लेक्सी बैनर छपवाने के बहाने तेल उद्योगों (Oil Industries) से मोटी रकम वसूलना और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का बकाया न चुकाना।

जांच में बाधाएं: साल 2012 में इस मामले में चार्ज मेमो जारी हुआ। लेकिन आरोपी इंस्पेक्टर विभागीय जांच के समन मिलने के बावजूद कई तारीखों पर उपस्थित नहीं हुआ।

नौकरी से दो बार बर्खास्तगी और बहाली: इसी बीच, एक आपराधिक मामले (C.C.No.114/2005) में दोषी ठहराए जाने के बाद उसे सेवा से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया गया। जब उसने अपील जीती, तो वह बहाल हुआ। दोबारा रिमांड पर उसे फिर दोषी ठहराया गया और फिर बर्खास्त किया गया। अंततः दूसरी आपराधिक अपील में बरी होने के बाद वह फिर बहाल हुआ और इस दौरान 2019 में सेवानिवृत्त (Superannuation) भी हो गया। अधिकारियों के तबादलों और इस कानूनी उठापटक के कारण विभागीय जांच रुकी रही। जब विभाग ने दोबारा नए सिरे से मेमो जारी कर जांच आगे बढ़ानी चाही, तो इंस्पेक्टर ने हाई कोर्ट के सिंगल जज के सामने इसे चुनौती दी। सिंगल जज ने ‘पी.वी. महादेवन बनाम एमडी, तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड’ मामले का हवाला देते हुए जांच में अत्यधिक देरी के आधार पर कार्रवाई को ही रद्द कर दिया था।

खंडपीठ की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी व्याख्या

डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले को पूरी तरह उलट दिया और मामले के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया।

पी.वी. महादेवन मामले का गलत संदर्भ (Misapplication of Precedent)

खंडपीठ ने नोट किया कि सिंगल जज ने जिस ‘पी.वी. महादेवन’ मामले के आधार पर राहत दी थी, वह जांच शुरू करने में हुई देरी (Delay in Initiation) से संबंधित था। वर्तमान मामले में अपराध 2011 में दर्ज हुआ और जांच 2012 में ही शुरू हो गई थी, इसलिए शुरुआत में कोई देरी नहीं थी। यहां देरी जांच को निष्कर्ष तक पहुंचाने (Delay in Conclusion) में हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट के ‘ए. मणिलामली’ फैसले का सहारा

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के Chairman, LIC of India v. A.Masilamani मामले पर भरोसा जताया, जिसके तहत “विभागीय कार्यवाही में जारी की गई चार्जशीट या कारण बताओ नोटिस को केवल जांच पूरी होने में देरी के आधार पर आमतौर पर रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत को आरोपों की गंभीरता (Gravity of Charges) सहित सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना चाहिए।

सरकारी आदेश (G.O.Ms.No.679) अनिवार्य नहीं है

आरोपी कर्मचारी का तर्क था कि सरकारी आदेश (G.O.) के अनुसार विभागीय जांच 6 महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। इस पर बेंच ने कहा कि यह 6 महीने की समय-सीमा निर्देशात्मक (Directory) प्रकृति की है, अनिवार्य (Mandatory) नहीं। इसे प्रशासनिक दक्षता के लिए बनाया गया है, न कि गंभीर अपराधियों को तकनीकी आधार पर बचाने के लिए।

पुलिस विभाग से उच्च मानदंडों की अपेक्षा

अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि आरोपी पुलिस विभाग में कार्यरत था, जिससे ईमानदारी और निष्ठा के उच्चतम मानकों की उम्मीद की जाती है। इतने गंभीर आरोपों को केवल समय बीत जाने के आधार पर ‘कालीनों के नीचे नहीं छुपाया जा सकता’ (Cannot be swept under the carpet)।

अदालत का अंतिम निर्देश

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए सिंगल जज के फैसले को खारिज कर दिया। अदालत ने संतुलन बनाते हुए निर्देश दिया कि विभाग को इस अनुशासनात्मक जांच को हर हाल में 3 महीने के भीतर पूरा करना होगा। यदि विभाग इस तय समय-सीमा (3 महीने) के भीतर जांच पूरी करने में विफल रहता है, तो यह कार्यवाही तुरुंत और स्वतः ही समाप्त (Automatically Terminated) मान ली जाएगी।

केस शीट: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट निर्णय (2026)

कानूनी बिंदुकोर्ट की स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतआंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (डिवीजन बेंच)
माननीय न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश लीसा गिल और जस्टिस निनाला जयसूर्या
मुख्य सिद्धांतगंभीर आरोपों में केवल निष्कर्ष की देरी के आधार पर चार्जशीट रद्द नहीं हो सकती।
समय सीमा (G.O.679)6 महीने की तय सीमा ‘निर्देशात्मक’ है, इसके उल्लंघन से जांच शून्य नहीं होती।
देरी की वजहकर्मचारी का असहयोग और आपराधिक मुकदमों के कारण दो बार हुई बर्खास्तगी।
अंतिम आदेशविभाग को 3 महीने में जांच पूरी करने का अंतिम अवसर; विफल रहने पर स्वतः समाप्त।
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