Sunday, August 23, 2026
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Lawyer Booked: CCTV फुटेज देखना है, इसलिए वकील को मर्डर का आरोपी बना दिया?’: यह कानून का घोर दुरुपयोग, IO पर लग सकता है जुर्माना

Lawyer Booked: पेशेवर दायित्वों को निभाने वाले वकीलों और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त और तल्ख टिप्पणी की है।

वकील के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और जांच पर अंतरिम रोक

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागाप्रसन्ना की एकल पीठ ने मर्डर केस में आरोपी बनाए गए एक स्थानीय वकील के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और जांच पर अंतरिम रोक (Interim Stay) लगा दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता वकील के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई या गिरफ्तारी न की जाए। अदालत ने राज्य के विशेष लोक अभियोजक (SPP) से यह जवाब भी मांगा है कि इस मामले के जांच अधिकारी (IO) पर भारी जुर्माना (Exemplary Costs) क्यों न लगाया जाए और उसके खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) क्यों न शुरू की जाए।

क्या पुलिस साक्ष्य जुटाने के नाम पर किसी भी बेगुनाह को अपराध के जाल में घसीट लेगी

अदालत ने कहा, जांच अधिकारी (IO) द्वारा एक वकील को सिर्फ इसलिए हत्या के मामले में आरोपी बना देना क्योंकि उसका घर और दफ्तर घटनास्थल के पास है और पुलिस को वहां लगे CCTV कैमरे की फुटेज देखनी है, कानून की प्रक्रियाओं का घोर और क्रूर दुरुपयोग (Gross Abuse of Process of Law) है। अगर पुलिस की इस मनमानी को स्वीकार कर लिया गया, तो देश का कोई भी नागरिक जिसके घर या दफ्तर में CCTV लगा है, वह कभी सुरक्षित नहीं रहेगा। पुलिस साक्ष्य जुटाने के नाम पर किसी भी बेगुनाह को अपराध के जाल में घसीट लेगी।

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मामला क्या है?: घटनास्थल के पास घर होना और मुवक्किल का केस लड़ना बना ‘गुनाह’

यह अजीबोगरीब और हैरान करने वाला मामला बेंगलुरु के बन्नेरघट्टा पुलिस स्टेशन से जुड़ा है।

हत्या का मामला: 9 जून 2026 को पुलिस को एक खाली जमीन पर एक व्यक्ति का शव मिला, जिसके बाद बन्नेरघट्टा पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 103 (हत्या) और 238 (साक्ष्य मिटाना) के तहत केस (FIR No. 142/2026) दर्ज किया गया था।

शुरुआत में नाम नहीं था: अनेकल में वकालत करने वाले एडवोकेट बी. लोकेश का नाम शुरुआत में दर्ज की गई एफआईआर में कहीं नहीं था।

रिमांड अर्जी में बनाया आरोपी: लेकिन बाद में, जांच अधिकारी (IO) ने कोर्ट में एक रिमांड एप्लिकेशन दाखिल की, जिसमें अचानक वकील बी. लोकेश को आरोपी नंबर 7 (A7) के रूप में शामिल कर लिया गया।

पुलिस का तर्क: पुलिस ने वकील को आरोपी बनाने के पीछे जो अजीब तर्क दिए, वे इस प्रकार थे। वकील का घर और दफ्तर घटनास्थल के बिल्कुल पास है और वहां लगे CCTV कैमरों की फुटेज की जांच करनी है। वकील बी. लोकेश ने इस मर्डर केस के मुख्य आरोपी (आरोपी नंबर 1) की तरफ से अदालत में पैरवी की थी (उसका केस लड़ा था)।

वकील की दलील: पेशेवर कर्तव्य निभाने की सजा दे रही पुलिस

याचिकाकर्ता वकील की ओर से कोर्ट में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी. आर. रविशंकर ने दलील दी कि मूल एफआईआर में बी. लोकेश के खिलाफ दूर-दूर तक कोई आरोप या सामग्री नहीं है। वह केवल एक पेशेवर वकील हैं जिन्होंने अपने मुवक्किल (जो अब इस केस का मुख्य आरोपी है) का प्रतिनिधित्व किया था। पुलिस ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से उन्हें इस गंभीर मामले में घसीटा है।

हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: CCTV लगाने वाला कोई व्यक्ति सुरक्षित नहीं बचेगा

6 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस एम. नागाप्रसन्ना ने रिकॉर्ड्स का अवलोकन करने के बाद पुलिस की थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया और मौखिक रूप से कहा।

यह कानून का खुला मजाक है

कोर्ट ने कहा कि इससे बड़ा आपराधिक कानून का दुरुपयोग और कोई नहीं हो सकता कि आप किसी व्यक्ति के दफ्तर या घर की CCTV फुटेज की जांच करना चाहते हैं, इसलिए उसे ही उठाकर मर्डर का आरोपी बना दें। अगर ऐसा होने लगा, तो कोई भी आम नागरिक अपने घर में CCTV कैमरा लगाने से डरेगा।

मुवक्किल का केस लड़ने पर वकील को सजा नहीं दे सकते

अदालत ने इस बात को भी गंभीर माना कि पुलिस ने वकील को इसलिए भी निशाना बनाया क्योंकि उसने मुख्य आरोपी की पैरवी की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया। कहा, एक अधिवक्ता को केवल इसलिए अपराध के जाल में खींच लेना क्योंकि उसने अपने पेशेवर कर्तव्य का निर्वहन करते हुए आरोपी नंबर 1 की पैरवी की थी, प्रथम दृष्टया पूरी कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

अदालत का सख्त आदेश और अगली तारीख

हाई कोर्ट ने वकील बी. लोकेश को तुरंत राहत देते हुए बन्नेरघट्टा पुलिस स्टेशन के केस से जुड़ी सभी कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने राज्य के सरकारी वकील बी. एन. जगदीश को सख्त निर्देश दिया है कि वे जांच अधिकारी (IO) से इस मामले में निर्देश प्राप्त करें और स्पष्ट करें कि इस तरह की मनमानी के लिए उन पर व्यक्तिगत जुर्माना क्यों न थोपा जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई, 2026 को तय की गई है।

केस शीट: कर्नाटक उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतरिम आदेश
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागाप्रसन्ना
याचिकाकर्ता (वकील)बी. लोकेश (अधिवक्ता, अनेकल)
संबंधित पुलिस स्टेशनबन्नेरघट्टा पुलिस स्टेशन (Crime No. 142/2026)
कानूनी धाराएंभारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (Murder) और 238 (Destroying Evidence)
अदालत का अंतरिम आदेशजांच और आपराधिक कार्यवाही पर तुरंत रोक; गिरफ्तारी या किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर प्रतिबंध।
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