BAU Bhagalpur: पटना हाईकोर्ट ने बिहार के प्रशासनिक और शैक्षणिक विधिक गलियारों में बड़ा फैसला सुनाते हुएबिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर के एक मनमाने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया है।
याचिकाकर्ता को सभी सेवा लाभों के साथ उनके पद पर वापस बहाल करें: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने विश्वविद्यालय के उस फैसले को पूरी तरह अवैध माना, जिसके तहत एक डायरेक्टर को 5 साल का कार्यकाल पूरा होने का तर्क देकर उनके मूल पद से हटा दिया गया था। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को सभी सेवा लाभों के साथ उनके पद पर वापस बहाल किया जाए। अदालत ने कहा, जब तक किसी कानून या परिनियम (Statute) में स्पष्ट रूप से या आवश्यक निहितार्थ द्वारा पिछली तारीख से लागू होने (Retrospective Operation) का प्रावधान न किया गया हो, तब तक उसे केवल भविष्योन्मुखी (Prospective Operation) ही माना जाएगा। विशेषकर ऐसी स्थिति में, जहां किसी कर्मचारी के पहले से स्थापित सेवा अधिकारों (Vested Service Rights) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो। विश्वविद्यालय बाद में बनाए गए नियमों का हवाला देकर साल 2011 में सीधी भर्ती के जरिए की गई एक स्थायी नियुक्ति को ‘पांच साल के कार्यकाल’ (Tenure Appointment) में तब्दील नहीं कर सकता।
मामला क्या है?: स्थायी डायरेक्टर को 5 साल बाद ‘रिवर्ट’ करने की कोशिश
यह कानूनी विवाद बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) के सेवा नियमों की गलत व्याख्या से उपजा है।
सीधी भर्ती (2011): याचिकाकर्ता वर्ष 1991 में जूनियर वैज्ञानिक-कम-असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सेवा में आए थे। बाद में वे यूनिवर्सिटी प्रोफेसर-कम-चीफ साइंटिस्ट बने। साल 2011 में विश्वविद्यालय ने विज्ञापन संख्या 12/2011 जारी किया। याचिकाकर्ता ने नियमित चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद निदेशक, विस्तार शिक्षा (Director, Extension Education) के पद पर सीधी भर्ती (Direct Recruitment) के तहत 14 दिसंबर 2011 को नियुक्ति पाई।
विज्ञापन में कोई शर्त नहीं: न तो मूल विज्ञापन में और न ही उनकी नियुक्ति अधिसूचना में इस पद को ‘टेन्योर पोस्ट’ (सीमित अवधि का पद) बताया गया था और न ही कोई निश्चित समय-सीमा तय की गई थी। उस समय विश्वविद्यालय के नए परिनियम (Statutes 2010) लागू नहीं हुए थे, इसलिए राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के पुराने नियमों के तहत यह एक स्थायी पद था।
2017 के नियमों का सहारा: विश्वविद्यालय ने साल 2017 में आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में बिहार कृषि विश्वविद्यालय परिनियम, 2010 को अधिसूचित किया। इसके क्लॉज 13.2(c) में प्रावधान किया गया कि निदेशकों और डीन के पद 5 वर्ष के कार्यकाल (Tenure) के होंगे। इसी नियम की आड़ लेकर विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ता की 2011 की नियुक्ति को भी 5 साल का मान लिया और 19 सितंबर 2025 को एक कार्यालय आदेश जारी कर उन्हें उनके पद से हटाकर एक कथित समकक्ष पद पर भेज (रिवर्ट कर) दिया।
हाई कोर्ट का रुख: विश्वविद्यालय की प्रारंभिक आपत्तियां खारिज, नियमों की सही व्याख्या
विश्वविद्यालय के वकीलों ने कोर्ट में तकनीकी दलील (Preliminary Objection) दी कि यह याचिका विचारणीय नहीं है क्योंकि याचिकाकर्ता ने चांसलर (कुलाधिपति) के पास उपलब्ध वैकल्पिक वैधानिक उपाय का इस्तेमाल नहीं किया। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ हो, तो हाई कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।
मुख्य मुद्दे पर जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत तय किए।
भविष्य के नियमों के पालन के समझौते का मतलब ‘अधिकार छीनना’ नहीं
विश्वविद्यालय ने तर्क दिया था कि जॉइनिंग के समय याचिकाकर्ता ने एक समझौते (Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें लिखा था कि वे भविष्य के सभी नियमों/परिनियमों को मानने के लिए बाध्य होंगे। इस पर कोर्ट ने कहा, किसी कर्मचारी को सेवा नियमों में भविष्य के संशोधनों का पालन करने की आवश्यकता वाला क्लॉज एक सामान्य सेवा शर्त है। इस तरह के क्लॉज को, अपने आप में, किसी नियुक्ति की मूल प्रकृति को ही पिछली तारीख से बदलने (Retrospective Alteration) के लिए अधिकृत करने वाला नहीं माना जा सकता, जब तक कि कानून में ऐसा स्पष्ट प्रावधान न हो।
2017 के नियम केवल भविष्य की नियुक्तियों पर लागू होंगे
अदालत ने दोहराया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय परिनियम, 2010 केवल 2017 में गजट प्रकाशन के बाद लागू हुआ। इसके क्लॉज 13.2(c) में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि पहले से काम कर रहे स्थायी निदेशकों की नियुक्ति स्वतः ही ‘टेन्योर पोस्ट’ में बदल जाएगी। यह नियम केवल भविष्य में होने वाली नियुक्तियों के लिए है।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Natural Justice) की धज्जियां उड़ाईं
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का अपने पुराने पद से धारणाधिकार (Lien) पहले ही समाप्त हो चुका था और उन्हें इस पद की उच्च जिम्मेदारियों के लिए अग्रिम वेतनवृद्धियां (Advance Increments) भी मिल रही थीं। ऐसे में, इतने गंभीर नागरिक परिणाम (Civil Consequences) वाले आदेश को पारित करने से पहले याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर (Opportunity of Hearing) नहीं दिया गया, जो पूरी तरह अवैध है। इसके अलावा, विश्वविद्यालय यह साबित करने में भी विफल रहा कि याचिकाकर्ता को जिस पद पर भेजा गया था, वह वास्तव में निदेशक पद के समकक्ष था।
अदालत का अंतिम आदेश
पटना उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय के प्रबंधन बोर्ड (Board of Management) के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसके तहत याचिकाकर्ता को पद से हटाने का निर्देश दिया गया था। साथ ही 19 सितंबर 2025 के परिणामी कार्यालय आदेशों को भी क्वैश (Quash) कर दिया गया। कोर्ट ने उत्तरदाताओं (विश्वविद्यालय प्रशासन) को आदेश दिया है कि वे याचिकाकर्ता को निदेशक, विस्तार शिक्षा (Director, Extension Education) के पद पर तुरंत बहाल करें। याचिकाकर्ता को सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) और इस अवधि के दौरान के सभी परिणामी सेवा लाभ (Consequential Service Benefits) दिए जाएंगे। इस आदेश को अदालत ने दो महीने के भीतर पूरी तरह लागू करने का निर्देश दिया है।
केस शीट: पटना हाई कोर्ट निर्णय (2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा (एकल पीठ) |
| मूल नियुक्ति वर्ष | 14 दिसंबर 2011 (सीधी भर्ती – स्थायी पद) |
| यूनिवर्सिटी का विवादित नियम | परिनियम 2010 का क्लॉज 13.2(c) (2017 में अधिसूचित) |
| विवादित आदेश की तिथि | 19 सितंबर 2025 (पद से हटाने और रिवर्ट करने का आदेश) |
| अदालत का विधिक सिद्धांत | कानून स्पष्ट प्रावधान के बिना पिछली तारीख (Retrospective) से लागू नहीं हो सकते। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका मंजूर; पदावनति का आदेश रद्द, 2 महीने में ससम्मान बहाली का आदेश। |

