Bank Action: देश के वकीलों के पेशेवर सम्मान, स्वायत्तता और उनके काम करने के मौलिक अधिकार की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।
वकीलों को पेशेवर ट्रेनिंग के लिए एकेडमी करें स्थापित
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए साफ किया कि बैंक एसोसिएशन द्वारा वकीलों को ब्लैकलिस्ट करने की यह परिपाटी पूरी तरह गैर-कानूनी है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने वकीलों की पेशेवर ट्रेनिंग के लिए देश में ‘नेशनल लीगल एकेडमी’ (National Legal Academy) स्थापित करने का भी एक ऐतिहासिक निर्देश जारी किया है।
यह रही मामले में सुप्रीम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) या कोई भी बैंक किसी पैनल एडवोकेट (वकील) का नाम ‘कॉशन लिस्ट’ (Caution List) में डालकर उसे ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता, भले ही उस पर किसी कर्जदार की मदद करने या कानूनी राय देने में लापरवाही बरतने के आरोप क्यों न हों। वकीलों के पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) या लापरवाही की जांच करने और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का विशेष और अनन्य अधिकार (Exclusive Jurisdiction) केवल बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों के पास है। बैंक खुद जज बनकर वकीलों की आजीविका पर वार नहीं कर सकते।
मामला क्या है?: गलत ‘टाइटल रिपोर्ट’ देने पर वकील को बनाया निशाना
यह पूरा कानूनी विवाद बैंकों के लिए काम करने वाले पैनल वकीलों की जवाबदेही और उनके अधिकारों से जुड़ा है।
बैंक का आरोप: सिंडिकेट बैंक (अब केनरा बैंक) ने अपने एक पैनल एडवोकेट (याचिकाकर्ता) पर आरोप लगाया था कि उन्होंने लोन के लिए गिरवी रखी जाने वाली एक अचल संपत्ति की ‘सर्च और टाइटल रिपोर्ट’ (Search and Title Report) तैयार करते समय लापरवाही बरती। बैंक के मुताबिक, वकील ने यह बात छिपाई कि संपत्ति का एक हिस्सा कर्जदार पहले ही बेच चुका था, जिससे बैंक को वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा।
IBA की कार्रवाई: इस शिकायत के आधार पर इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) ने 5 फरवरी 2020 को एक ‘कॉशन लिस्ट’ (चेतावनी सूची) जारी की, जिसमें याचिकाकर्ता वकील का नाम सीरियल नंबर 781 पर डाल दिया गया। इस लिस्ट के सर्कुलेट होने के बाद अन्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने भी उक्त वकील को अपने पैनल से हटा दिया।
हाई कोर्ट का इनकार: वकील ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस लिस्ट को रद्द करने की मांग की। लेकिन हाई कोर्ट ने तकनीकी आधार पर यह कहते हुए रिट याचिका खारिज कर दी कि IBA संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ (State) नहीं है, इसलिए उसके खिलाफ यह याचिका सुनवाई योग्य (Maintainable) नहीं है। इसके बाद वकील ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
वकील की दलील: “बिना सुनवाई के खत्म कर दिया मेरा करियर”
याचिकाकर्ता वकील की ओर से कोर्ट में दमदार दलीलें पेश की गईं।
नियमों का उल्लंघन: आरबीआई (RBI) की जुलाई 2009 की गाइडलाइंस के मुताबिक, किसी भी ‘थर्ड पार्टी’ (जैसे वकील या वैल्यूअर) का नाम कॉशन लिस्ट में डालने से पहले विस्तृत जांच, पूर्व नोटिस और सुनवाई का निष्पक्ष मौका (Fair Opportunity of Hearing) देना अनिवार्य है, जिसे IBA ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया।
मौलिक अधिकार का हनन: बिना किसी ठोस जांच के नाम लिस्ट में डालने से वकील को न केवल भारी वित्तीय नुकसान हुआ, बल्कि समाज और लीगल फ्रेटरनिटी में उनकी प्रतिष्ठा (Reputation) मटियामेट हो गई, जो उनके आजीविका कमाने के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में दखल बर्दाश्त नहीं
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की वकील राधिका गौतम और केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे ने भी याचिकाकर्ता का समर्थन किया। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं।
बैंकों को ब्लैकलिस्टिंग का कोई हक नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट (Advocates Act) के तहत वकीलों के आचरण को विनियमित (Regulate) करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ बार काउंसिल के पास है। कोई भी वित्तीय संस्था या बैंकों का समूह अपनी समानांतर व्यवस्था चलाकर वकीलों को सीधे दंडित या ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता।
वकीलों के लिए बनेगी ‘नेशनल लीगल एकेडमी’
सुनवाई के दौरान जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा ने मौजूदा समय में बार काउंसिल और स्टेट बार काउंसिलों द्वारा वकीलों के कदाचार पर कार्रवाई करने के ढीले तंत्र पर चिंता भी जताई। इसी को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया कि वह जजों की ‘नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी’ की तर्ज पर वकीलों के लिए एक ‘नेशनल लीगल एकेडमी’ (National Legal Academy फॉर एडवोकेट्स) की स्थापना करे, ताकि देश में वकीलों की निरंतर कानूनी शिक्षा (Continuing Legal Education) और अनुशासन की संस्कृति को संस्थागत रूप दिया जा सके।
केस शीट: उच्चतम न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे |
| प्रतिवादी संस्था | इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) और केनरा बैंक |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | वकीलों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार सिर्फ बार काउंसिल (BCI) के पास है। |
| ऐतिहासिक निर्देश | वकीलों की ट्रेनिंग और अनुशासन के लिए ‘National Legal Academy’ बनाने का आदेश। |
| अदालत का अंतिम आदेश | वकील की अपील स्वीकार; इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला रद्द और बैंकों को वकीलों को कॉशन लिस्ट के जरिए ब्लैकलिस्ट करने पर रोक। |

