Sunday, October 4, 2026
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Adultery Case: व्यभिचार साबित करने के लिए होटल रिकॉर्ड-कॉल डेटा मंगाना Privacy का उल्लंघन नहीं…पत्नी की याचिका क्यों हुई मंजूर

Adultery Case:सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक और संवैधानिक कानून के बीच संतुलन तय करते हुए ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है।

पत्नी को अपने पति के खिलाफ व्यभिचार के सबूत जुटाने थे

हाईकोर्ट जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के साल 2023 के उस ऐतिहासिक निर्णय को पूरी तरह बरकरार (Uphold) रखा, जिसमें एक पत्नी को अपने पति के खिलाफ व्यभिचार के सबूत जुटाने के लिए होटल रिकॉर्ड समन करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा, वैवाहिक विवादों में व्यभिचार (Adultery) के आरोपों को साबित करने के लिए किसी पक्ष के होटल बुकिंग रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDRs) को अदालत में मंगाने का निर्देश देना निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन नहीं है। हालांकि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। जब एक विवाहित पुरुष पर शादी के अस्तित्व में रहते हुए पर-स्त्री से शारीरिक संबंध बनाने का आरोप हो, तो अदालतें निजता के अधिकार की आड़ में उसे कानूनी संरक्षण नहीं दे सकतीं।”

मामला क्या है?: जयपुर का होटल, ‘दूसरी महिला’ और कॉल डिटेल्स का विवाद

यह कानूनी लड़ाई एक पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ क्रूरता और व्यभिचार (Adultery) के आधार पर दायर तलाक की याचिका से शुरू हुई थी।

पत्नी का आरोप: पत्नी का दावा था कि उसका पति जयपुर के एक होटल में किसी अन्य महिला और उसकी बेटी के साथ ठहरा था। अपने इस आरोप को साबित करने के लिए उसने फैमिली कोर्ट से गुहार लगाई कि संबंधित होटल के बुकिंग रिकॉर्ड, रूम ऑक्युपेंसी दस्तावेज और पति के दो मोबाइल नंबरों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को अदालत में समन (समन भेजकर मंगाना) किया जाए।

पति की ‘निजता’ वाली दलील: पति ने इस मांग का पुरजोर विरोध किया। उसका विधिक तर्क था कि होटल और कॉल रिकॉर्ड मंगाने से न केवल उसकी बल्कि उस ‘दूसरी महिला’ की निजता के अधिकार का भी हनन होगा। उसने यह भी दलील दी कि इससे उस महिला की छवि खराब होगी और उसकी नाबालिग बेटी के पितृत्व (Paternity) पर भी झूठे सवाल खड़े होंगे।

हाई कोर्ट का पिछला रुख (मई 2023): दिल्ली हाई कोर्ट की तत्कालीन जस्टिस रेखा पल्ली की पीठ ने पति की आपत्तियों को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) में व्यभिचार को तलाक का एक वैध आधार माना गया है, इसलिए समाज और न्याय के हित में यह बिल्कुल नहीं होगा कि कोर्ट निजता के बहाने ऐसे शख्स की मदद करे। इसी फैसले के खिलाफ पति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: “व्यभिचार के सीधे सबूत मिलना मुश्किल, परिस्थितिजन्य साक्ष्य जरूरी”

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के कानूनी दृष्टिकोण की पुष्टि करते हुए पति की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष इस प्रकार हैं।

निजता का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है

अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार एक बुनियादी अधिकार जरूर है, लेकिन व्यापक लोकहित (Larger Public Interest) और न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस पर तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। एक कानूनी शादी के भीतर वफादारी की उम्मीद और व्यभिचार के खिलाफ कानूनी उपाय खोजना पत्नी का अधिकार है।

यह कोई ‘फिशिंग इंक्वायरी’ (अंधेरे में तीर चलाना) नहीं है

पति ने तर्क दिया था कि पत्नी केवल जासूसी या उसे फंसाने के लिए एक व्यापक (Roving or Fishing) इंक्वायरी करा रही है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा, “यह ऐसा मामला नहीं है जहां पत्नी किसी अजनबी के होटल रिकॉर्ड मांग रही हो। उसकी याचिका केवल उसके कानूनी रूप से विवाहित पति के रिकॉर्ड से संबंधित है, जिसके बारे में उसके पास यह मानने के पुख्ता कारण हैं कि वह एक निश्चित होटल के कमरे में एक निश्चित महिला के साथ व्यभिचार में लिप्त था।”

होटल रिकॉर्ड और CDRs की विधिक प्रासंगिकता

अदालत ने माना कि व्यभिचार जैसी गुप्त गतिविधियों के सीधे या चश्मदीद सबूत (Direct Evidence) मिलना अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए वैवाहिक अदालतों को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर निर्भर रहना पड़ता है। होटल के रिजर्वेशन रिकॉर्ड, आईडी प्रूफ और पेमेंट डिटेल्स से यह साफ हो सकता है कि पति उस महिला के साथ ठहरा था या नहीं। मोबाइल के कॉल रिकॉर्ड्स से दोनों के बीच बातचीत की आवृत्ति (Frequency) और समय का पता चल सकता है, जो पत्नी के आरोपों की कड़ियों को जोड़ने में मदद करेगा।

फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 का हवाला

अदालत ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 के विशेष प्रावधानों को भी रेखांकित किया। यह धारा पारिवारिक अदालतों को यह विशेष शक्ति देती है कि वे किसी भी ऐसे साक्ष्य, रिपोर्ट या रिकॉर्ड को स्वीकार कर सकती हैं जो मामले का सही फैसला करने में मददगार हो, भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) के कड़े तकनीकी नियमों के तहत सीधे तौर पर स्वीकार्य न भी हो।

अदालत का अंतिम आदेश

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह बहाल (Affirm) रखा, जिसमें होटल प्रबंधन और टेलीकॉम कंपनियों को पति के बुकिंग रिकॉर्ड तथा कॉल डिटेल्स अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया था।

केस मैट्रिक्स: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (जुलाई 2026)

विधिक और वैवाहिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतमाननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ
फैसले की तिथि2 जुलाई 2026
मूल वैधानिक प्रावधानहिंदू विवाह अधिनियम (तलाक का आधार) और फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14
समन किए जाने वाले दस्तावेजहोटल बुकिंग रिकॉर्ड, आईडी प्रूफ, पेमेंट रसीदें और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDRs)
अदालत का अंतिम निर्णयपति की अपील खारिज; सबूत मंगाने की अनुमति बहाल, इसे निजता का हनन नहीं माना गया।
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