Case Listing: अदालतों में मुकदमों की बढ़ती संख्या और लिस्टिंग (मामलों को सुनवाई के लिए लगाने) की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नीतिगत फैसला सुनाया है।
संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ‘परमादेश रिट’ की व्याख्या
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वकील रजिस्ट्री पर अपनी मर्जी से केस लिस्ट करने का दबाव नहीं बना सकता और न ही इसके लिए अदालत से न्यायिक आदेश हासिल कर सकता है। अदालत ने कहा, किसी भी व्यक्तिगत वादी (Litigant) या अधिवक्ता को यह मौलिक या निहित अधिकार नहीं है कि वह अपने मुकदमों को पहले से लंबित अन्य मामलों से आगे (Out of turn) लिस्ट करने की मांग करे, सिवाय उन मामलों के जिनमें स्थापित आपातकालीन प्रक्रियाओं (Established Urgent Protocols) का पालन किया गया हो। रोस्टर के अनुसार मामलों के आवंटन को बाधित करने या रजिस्ट्री को बाईपास करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ‘परमादेश रिट’ (Writ of Mandamus) जारी नहीं की जा सकती।”
मामला क्या है?: 21 मुकदमों को तुरंत लिस्ट कराने पहुंचे थे वकील
यह मामला एक युवा वकील द्वारा अपनी व्यावसायिक दिक्कतों और मुकदमों में हो रही देरी को लेकर दायर की गई याचिका से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता की मांग: एडवोकेट एल. के. चार्ल्स अलेक्जेंडर ने मद्रास हाई कोर्ट में खुद एक याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने कोर्ट रजिस्ट्री को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनके द्वारा अपने मुवक्किलों (Clients) की तरफ से दायर किए गए 21 लंबित मामलों (जिनमें सिविल मिसलेनियस अपील, क्रिमिनल ओरिजिनल पिटीशन और रिट याचिकाएं शामिल थीं) को तुरंत सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाए।
वकील का दर्द: इन-पर्सन पेश हुए वकील ने दलील दी कि बार-बार रजिस्ट्री को पत्र लिखने के बावजूद उनके केस लंबे समय से लिस्ट नहीं हुए हैं। इस प्रशासनिक ढिलाई के कारण उन्हें गंभीर मानसिक तनाव (Mental Distress) का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वे अपने मुवक्किलों के प्रति जवाबदेह हैं।
रजिस्ट्री का पक्ष: रजिस्ट्री की ओर से अधिवक्ता एम. केम्पराज पेश हुए और उन्होंने व्यवस्थागत चुनौतियों को कोर्ट के सामने रखा।
हाई कोर्ट का रुख: “वकीलों की चिंता से सहानुभूति, लेकिन सिस्टम नहीं तोड़ सकते”
मद्रास हाई कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर जोर दिया।
रजिस्ट्री के पास ‘हरक्यूलिन’ (विशाल) चुनौतियां हैं
अदालत ने माना कि मुकदमों की लिस्टिंग करना कोई मैकेनिकल डेटा एंट्री का काम नहीं है। रजिस्ट्री को हर हफ्ते हजारों नए मुकदमों की स्क्रूटनी करनी होती है, साथ ही बरसों से लंबित मामलों को भी संभालना होता है। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए मामलों को आमतौर पर क्रोनोलॉजिकल (समय के क्रम के अनुसार) या श्रेणीवार कतार का पालन करना पड़ता है।
आंतरिक मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी
खंडपीठ ने आगाह किया कि यदि हर उस वकील को रजिस्ट्री के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति दे दी गई जिसके मामलों में देरी हो रही है, तो अदालत पूरी तरह से आंतरिक मुकदमों से घिर जाएगी। इससे न्याय का पूरा प्रशासन ही पंगु (Paralyse) हो जाएगा।
‘लीपफ्रॉग’ (लांगने) की इजाजत नहीं
अदालत ने कहा कि यदि किसी एक वकील को न्यायिक आदेश के जरिए हजारों अन्य वादियों से आगे निकलने (Leapfrog) की अनुमति दी जाती है, तो यह ‘न्याय तक समान पहुंच’ (Equal Access to Justice) के सिद्धांत का खुला उल्लंघन होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें बार (Bar) के एक युवा सदस्य की पेशेवर चिंताओं और चिंताओं के प्रति पूरी सहानुभूति है, लेकिन संवैधानिक उपायों का इस्तेमाल प्रशासनिक औजार के रूप में नहीं किया जा सकता।
वकीलों के लिए क्या है कानूनी उपाय? (Remedies)
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता वकील के पास उपाय खत्म नहीं हुए थे। यदि कोई मामला वास्तव में बेहद जरूरी है या प्रक्रियात्मक विसंगति में फंस गया है, तो वकील इन स्थापित तरीकों को अपना सकते हैं।
मेंशनिंग मेमो (Mention Memo): वकील संबंधित रोस्टर जज या खंडपीठ के समक्ष एक औपचारिक ‘प्रिसेप’ (Praecipe) या मेंशनिंग मेमो प्रस्तुत कर सकते हैं।
रजिस्ट्रार (न्यायिक) को प्रतिनिधित्व: वैकल्पिक रूप से, लिस्टिंग की विसंगतियों को ठीक करने के लिए रजिस्ट्रार (Judicial) के समक्ष एक व्यापक आवेदन दिया जा सकता है, जिनके पास इसका प्रशासनिक अधिकार होता है।
केस शीट: मद्रास उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन |
| याचिकाकर्ता वकील | एल. के. चार्ल्स अलेक्जेंडर (Charles Alexander Vs Registrar General) |
| मूल कानूनी मुद्दा | क्या वकील रजिस्ट्री को बाईपास कर केस लिस्टिंग के लिए ‘Writ of Mandamus’ मांग सकते हैं? |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका पूरी तरह खारिज; वादियों में समानता बनाए रखने के लिए तय प्रक्रिया का पालन अनिवार्य। |

