Muslim law Vs POCSO: देश में बाल अधिकारों और पर्सनल लॉ के बीच लंबे समय से चल रहे कानूनी टकराव पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा और स्पष्ट विधिक रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने साफ किया कि कोई भी पर्सनल लॉ देश के धर्मनिरपेक्ष बाल संरक्षण कानूनों को ओवरराइड (निरस्त) नहीं कर सकता। अदालत ने बाल विवाह रुकवाने गई पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम पर हमला करने और 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को जबरन छीन ले जाने के आरोपी 19 लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया।
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत 15 वर्ष की आयु वाली महिला को निकाह की इजाजत
अदालत ने कहा, देश के हर नागरिक के लिए चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या पर्सनल लॉ को मानता हो, शादी की कानूनी उम्र वही होगी जो बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006 में तय की गई है। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत लड़की के प्यूबर्टी (वयस्कता/आमतौर पर 15 वर्ष) की आयु प्राप्त करने पर निकाह की दी गई इजाजत, देश के बाल विवाह विरोधी कानून और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act), 2012 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित इन वैज्ञानिक कानूनों से बचने का किसी के पास कोई रास्ता नहीं है।”
मामला क्या है?: 16 साल की लड़की का निकाह रुकवाने गई टीम पर हमला
यह पूरा कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले से जुड़ा है।
घटनाक्रम (15 फरवरी 2026): बुलंदशहर के काकोर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पुलिस और चाइल्ड लाइन (Child Line) की टीम को सूचना मिली कि एक 16 वर्षीय मुस्लिम नाबालिग लड़की का बाल विवाह कराया जा रहा है। टीम कानून के मुताबिक शादी रुकवाने और लड़की को रेस्क्यू कर बाल कल्याण समिति (CWC) के सामने पेश करने उसके घर पहुंची।
सरकारी टीम पर हमला: अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब टीम ने लड़की को संरक्षण में लेने का प्रयास किया, तो लड़की के परिजनों और समुदाय के लोगों (याचिकाकर्ताओं) ने पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम को गंदी गालियां दीं, उन्हें जान से मारने की धमकी दी और पूरी टीम पर हमला कर दिया। आरोपी उस नाबालिग लड़की को चाइल्ड लाइन सदस्य की कस्टडी से जबरन छीनकर भगा ले गए।
आरोपियों का तर्क: आरोपियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग की। उनके वकील ने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत यदि लड़की प्यूबर्टी (वयस्कता) की उम्र यानी 15 वर्ष पार कर चुकी है, तो वह निकाह के योग्य है। इसलिए, उन पर बाल विवाह का कानून लागू नहीं होता।
हाई कोर्ट का कड़ा विधिक रुख: “शादी और शारीरिक संबंध अलग नहीं किए जा सकते”
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इन दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए कई अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत रेखांकित किए।
निकाह की आड़ में पॉक्सो (POCSO) से नहीं बच सकते
अदालत ने एक बेहद व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलू को सामने रखते हुए कहा, यदि 18 वर्ष से कम उम्र के किसी व्यक्ति के विवाह की अनुमति दी जाती है, तो चूंकि शारीरिक/वैवाहिक संबंध (Carnal Relations) विवाह की संस्था से पूरी तरह अविभाज्य (Inseparable) हैं, इसलिए इसके परिणामस्वरूप सीधे तौर पर पॉक्सो एक्ट (POCSO) का उल्लंघन होगा।
पीसीएमए और पॉक्सो ‘राष्ट्रीय नीति’ के कानून हैं
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पीसीएमए (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) जैसे कानून देश के लोक स्वास्थ्य (Public Health) और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। यह कानून वैज्ञानिक समझ के आधार पर संसद द्वारा बनाए गए हैं, इसलिए देश का कोई भी नागरिक धार्मिक या पर्सनल लॉ की दुहाई देकर इन कानूनों के दायरे से बच नहीं सकता। बाद में बनाए गए ये व्यापक कानून, पुराने मेजॉरिटी एक्ट, 1875 या पर्सनल लॉ के अपवादों पर हावी (Prevail) होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के रुख और लैप्स हुए बिल का जिक्र
हाई कोर्ट ने नोट किया कि इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों (जैसे पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट और केरल हाई कोर्ट) के विचारों में मतभेद रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केरल हाई कोर्ट के 2024 के फैसले से पूरी तरह सहमत है कि बाल विवाह हर धर्म के व्यक्ति के लिए प्रतिबंधित है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में इस पर संशय व्यक्त किया था और मामला संसद में लंबित ‘बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक 2021’ के भरोसे था (जिसका उद्देश्य पीसीएमए को पर्सनल लॉ पर सर्वोच्चता देना था)। चूंकि 17वीं लोकसभा के भंग होने के साथ वह बिल लैप्स (समाप्त) हो गया, इसलिए मौजूदा स्थिति में पीसीएमए और पॉक्सो को ही सर्वोच्च माना जाएगा।
पुलिस और चाइल्ड लाइन की सराहना; एफआईआर रद्द करने से इनकार
अदालत ने बुलंदशहर पुलिस और चाइल्ड लाइन की रेस्क्यू टीम की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पॉक्सो और बाल विवाह रोकने की अपनी कानूनी ड्यूटी को पूरी ईमानदारी से निभाया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों द्वारा सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालना, उन पर हमला करना और पीड़िता को जबरन छीनना प्रथम दृष्टया गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामले में शुरुआती स्तर पर एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता, बल्कि इसकी गहन जांच की आवश्यकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने 19 आरोपियों की याचिका खारिज कर दी।
केस शीट: इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव (खंडपीठ) |
| मामले का शीर्षक | रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Rubi Vs State of UP) |
| लागू कानून | PCMA, 2006 और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act), 2012 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | विवाह की न्यूनतम उम्र (लड़कियों के लिए 18 वर्ष) सभी धर्मों पर समान रूप से लागू है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | एफआईआर रद्द करने से इनकार; याचिका खारिज। आरोपियों के खिलाफ पुलिस जांच जारी रहेगी। |

