Wednesday, July 8, 2026
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Integrity Of The Judicial Institution: मुकदमा खत्म होने से पहले ही जज ने लिख दिया बरी करने का फैसला…विश्वास नहीं हो रहा तो यह केस पढ़ें

Integrity Of The Judicial Institution: न्यायपालिका की शुचिता, निष्पक्षता और जजों के नैतिक आचरण को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा और कड़ा संदेश देने वाला फैसला सुनाया है।

सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की याचिका खारिज

हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी. पी. शर्मा की खंडपीठ ने इंदौर में पदस्थ रहे एक सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की उस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ जारी चार्जशीट और विभागीय जांच को रद्द करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक पदों पर बैठे लोगों का आचरण हर संदेह से परे होना चाहिए और भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग के मामलों में कोई ढील नहीं दी जा सकती।

आपराधिक मुकदमे के कानूनी रूप से संपन्न होने से पहले ही आरोपी किया बरी

हाईकोर्ट ने कहा, एक न्यायिक अधिकारी (जज) पर यह आरोप लगना कि उसने आपराधिक मुकदमे के कानूनी रूप से संपन्न होने से पहले ही एक आरोपी को बरी (Acquittal) करने का फैसला तैयार कर लिया, अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। ऐसे कृत्य सीधे तौर पर पूरी न्यायिक संस्था की ईमानदारी और साख (Integrity of the Judicial Institution) पर प्रहार करते हैं। इसलिए, आरोपी सिविल जज के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक जांच (Disciplinary Inquiry) को बीच में नहीं रोका जा सकता।

मामला क्या है?: अफसर को IAS प्रमोट कराने के लिए जज ने की ‘सेटिंग’!

यह हैरान करने वाला मामला एक राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को अनुचित लाभ पहुंचाने और न्याय की गरिमा को ताक पर रखने से जुड़ा है।

अधिकारी की मजबूरी: मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी संतोष वर्मा का नाम IAS अवार्ड (प्रमोशन) के लिए विचाराधीन था। लेकिन उनके खिलाफ एक आपराधिक मुकदमा लंबित (Pending) होने के कारण उन्हें यह प्रमोशन नहीं मिल पा रहा था।

जज पर आरोप: आरोप है कि इंदौर में तैनात उक्त सिविल जज (याचिकाकर्ता) ने उस अधिकारी को फायदा पहुंचाने के लिए आपराधिक मुकदमे की सुनवाई पूरी होने, गवाहियां दर्ज होने और कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने से पहले ही अपनी तरफ से उसे ‘क्लीन चिट’ देने यानी बरी करने का पूरा फैसला (Judgment) एडवांस में ही तैयार कर लिया था।

हाई कोर्ट की प्रशासनिक कार्रवाई: जब यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक विंग (Administrative Side) के संज्ञान में आया, तो इसे न्यायपालिका के साथ गंभीर धोखाधड़ी माना गया। अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सिविल जज को निलंबित (Suspend) कर दिया और 19 दिसंबर 2025 को ‘मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966’ के तहत उनके खिलाफ चार्जशीट (आरोप पत्र) जारी कर विभागीय जांच शुरू कर दी।

आरोपी जज की दलील: देरी से जारी हुई चार्जशीट और क्रिमिनल केस भी लंबित

निलंबित सिविल जज (याचिकाकर्ता विजेंद्र सिंह रावत) ने अपने खिलाफ शुरू हुई इस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी और निम्नलिखित तर्क दिए।

कार्रवाई में देरी: याचिकाकर्ता के वकील नरेंद्र चौहान ने दलील दी कि कथित घटना साल 2020 की है, जबकि हाई कोर्ट प्रशासन ने इसके लिए चार्जशीट दिसंबर 2025 में जारी की। इस लंबी देरी के कारण पूरी अनुशासनात्मक प्रक्रिया दूषित (Vitiated) हो गई है।

दोहरी मार का तर्क: जज का तर्क था कि इसी मामले को लेकर उनके खिलाफ पहले से ही एक आपराधिक मुकदमा (Criminal Prosecution) भी चल रहा है। ऐसे में समानांतर रूप से विभागीय जांच जारी रखने से आपराधिक अदालत में उनके बचाव (Defence) पर बुरा असर पड़ेगा।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: क्रिमिनल ट्रायल खत्म होने तक इंतजार नहीं कर सकते

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी. पी. शर्मा की बेंच ने राज्य सरकार (सरकारी वकील कनक गहरवार) और अन्य प्रतिवादियों की दलीलों से सहमति जताते हुए सिविल जज की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य विधिक बिंदु स्पष्ट किए।

जांच अनिश्चितकाल के लिए नहीं टल सकती

अदालत ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि क्रिमिनल केस लंबित होने के कारण विभागीय जांच रोक दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा, एक न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी से जुड़े ऐसे गंभीर आरोपों को आपराधिक मुकदमे के समाप्त होने तक अनिश्चित काल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता। अनुशासनात्मक प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह यह जांचे कि अधिकारी का आचरण एक जज से अपेक्षित ईमानदारी और शिष्टाचार के मानकों के अनुरूप है या नहीं।

दोनों कार्रवाइयां साथ-साथ चल सकती हैं

हाई कोर्ट ने स्थापित विधिक सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच को एक साथ चलाने से रोकता हो। दोनों के उद्देश्य अलग हैं एक का मकसद अपराध की सजा देना है, तो दूसरे का मकसद सेवा नियमों के तहत विभागीय अनुशासन बनाए रखना है।

देरी का कोई पूर्वाग्रह साबित नहीं हुआ

अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि 2020 की घटना पर 2025 में चार्जशीट जारी होने से उसके कानूनी अधिकारों को क्या वास्तविक नुकसान या पूर्वाग्रह (Prejudice) पहुंचा है। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच पूरी होना बेहद जरूरी है।

केस शीट: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर/जबलपुर बेंच)
फैसले की तारीख24 जून, 2026
मामले का शीर्षकविजेंद्र सिंह रावत बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य
याचिकाकर्ता का पदसिविल जज (सीनियर डिवीजन), इंदौर (निलंबित)
मुख्य आरोपमुकदमा पूरा होने से पहले ही प्रशासनिक अधिकारी के पक्ष में बरी करने का फैसला लिखना।
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका पूरी तरह खारिज; जज के खिलाफ विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा दोनों समानांतर जारी रहेंगे।
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