Friday, October 9, 2026
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Gyatri Mantra: स्कूलों में गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना पर रोक नहीं…क्यों धार्मिक नहीं, ये नैतिक शिक्षा है, पढ़िए छतीसगढ़ के स्कूल का मामला

Gyatri Mantra: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा (Morning Assembly) और मध्याह्न भोजन (Mid-day Meal) से पहले गायत्री मंत्र, सरस्वती वंदना और भोजन मंत्र के पाठ को अनिवार्य करने वाले सरकारी सर्कुलर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हरी झंडी दे दी है।

जनहित याचिका को समय पूर्व बताते हुए पूरी तरह से किया खारिज

हाईकोर्ट के जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने इस सर्कुलर के खिलाफ दायर जनहित याचिका को ‘समय पूर्व’ (Premature) बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि जब तक किसी छात्र को उसकी मर्जी के खिलाफ इन प्रार्थनाओं को बोलने के लिए मजबूर नहीं किया जाता, तब तक इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने कहा, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28(1) सरकारी धन से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में किसी विशिष्ट धार्मिक रीति-रिवाज, पूजा पद्धति या कर्मकांड की शिक्षा (Religious Instruction) देने पर कड़ाई से रोक लगाता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि स्कूलों में ‘नैतिक शिक्षा’ (Moral Instruction) देने पर भी प्रतिबंध है। गायत्री मंत्र, सरस्वती वंदना या महापुरुषों की जीवनियां किसी संप्रदाय विशेष की संकीर्ण मान्यताओं से परे, छात्रों में अनुशासन, कृतज्ञता, नागरिकता के संस्कार और सामाजिक सद्भाव विकसित करने वाली सार्वभौमिक नैतिक शिक्षा का हिस्सा हैं।

मामला क्या है?: स्कूल शिक्षा विभाग के सर्कुलर पर क्यों मचा बवाल?

यह पूरा विवाद छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक सर्कुलर (परिपत्र) से शुरू हुआ था।

सर्कुलर का निर्देश: राज्य सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों को निर्देश दिया था कि वे सुबह की प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत के साथ-साथ दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का आयोजन करें। इसके अलावा, दोपहर के भोजन से पहले ‘भोजन मंत्र’ और स्कूल की छुट्टी (Dispersal) से पहले ‘गायत्री मंत्र’ और ‘शांति मंत्र’ का पाठ कराया जाए। साथ ही महापुरुषों की जीवनियां भी पढ़ाई जाएं।

याचिकाकर्ताओं की चुनौती: छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने इस सर्कुलर की संवैधानिक वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क: वकीलों (आमिर खान और सितारा खान) के माध्यम से दलील दी गई कि इस आदेश में उन छात्रों के लिए किसी छूट (Exemption) की व्यवस्था नहीं है जो इन प्रार्थनाओं में भाग नहीं लेना चाहते। यह एक विशेष धर्म (हिंदू धर्म) की प्रार्थनाओं को बढ़ावा देता है, जो राज्य की धार्मिक तटस्थता (Religious Neutrality) और छात्रों की अंतःकरण की स्वतंत्रता (Freedom of Conscience) के खिलाफ है।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: धार्मिक शिक्षा बनाम नैतिक शिक्षा

जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 28(1) की बेहद विस्तृत और स्पष्ट कानूनी व्याख्या की।

“धार्मिक शिक्षा” का अर्थ बेहद सीमित है

अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 28(1) के तहत प्रतिबंधित ‘धार्मिक शिक्षा’ का एक बहुत ही सीमित और विशिष्ट अर्थ है। इसका मतलब किसी खास धर्म के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों, पूजा पद्धतियों या संप्रदाय विशेष के सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से सिखाना है।

नैतिक शिक्षा देश के नागरिकों के निर्माण के लिए जरूरी है

कोर्ट ने कहा, अनुच्छेद 28 का खंड (1) यह बिल्कुल साफ करता है कि यह प्रावधान किसी भी सांप्रदायिक सिद्धांतों से मुक्त ‘नैतिक शिक्षा’ (Moral Instruction) पर प्रतिबंध नहीं लगाता। नैतिक शिक्षा देश के अच्छे नागरिकों के निर्माण, राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक ताने-बाने (Social Cohesion) को मजबूत करने का एक अनिवार्य हिस्सा है।

किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं है

हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि पूरे सर्कुलर में कहीं भी ऐसा कोई दंडात्मक या बाध्यकारी शब्द नहीं लिखा है, जो दूसरे धर्म के छात्रों को अपनी धार्मिक मान्यताओं या आस्था के विपरीत कार्य करने के लिए मजबूर (Compel) करता हो। यह केवल एक सामान्य शड्यूल है।

राज्य सरकार का पक्ष और अदालत का अंतिम फैसला

राज्य सरकार की ओर से पेश डिप्टी एडवोकेट जनरल आनंद दादरिया ने कोर्ट में दलील दी कि इन मंत्रों और श्लोकों में कोई संकीर्ण धार्मिक एजेंडा नहीं है, बल्कि ये भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत (Civilisational Heritage) को दर्शाते हैं। इनका उद्देश्य बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, अनुशासन और कृतज्ञता का भाव पैदा करना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम राज्य के सभी स्कूलों में शांतिपूर्वक लागू है और किसी भी छात्र, अभिभावक या शिक्षक की ओर से अब तक कोई शिकायत नहीं आई है।

हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं ने बिना किसी वास्तविक पीड़ित छात्र या शिकायत के, केवल ‘आशंकाओं’ (Apprehensions) के आधार पर सीधे कोर्ट का रुख कर लिया। इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता (Liberty) सुरक्षित रखी है कि अगर भविष्य में किसी छात्र को जबरन इन प्रार्थनाओं में शामिल होने के लिए प्रताड़ित या मजबूर किया जाता है, तो वे पुख्ता और अकाट्य सबूतों (Cogent Evidence) के साथ दोबारा नई याचिका दायर कर सकते हैं।

केस शीट: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद
मामले का शीर्षकअब्दुल सलाम रिजवी व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
चुनौती का विषयस्कूलों में सरस्वती वंदना, भोजन मंत्र और गायत्री मंत्र के अनिवार्य पाठ का सर्कुलर
संविधान का मूल आधारअनुच्छेद 28(1) — धार्मिक शिक्षा बनाम नैतिक शिक्षा का अंतर
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका पूरी तरह खारिज; सर्कुलर वैध है क्योंकि यह नैतिक शिक्षा के दायरे में है और इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है।
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