Monday, August 24, 2026
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Gender Equality: बॉयज स्कूल महिला शिक्षकों की नियुक्ति से इनकार नहीं कर सकते…जेंडर के आधार पर आपत्ति का कोई कानूनी आधार नहीं, ऐसा क्यों

Gender Equality: शिक्षण संस्थानों में लैंगिक समानता (Gender Equality) और प्रशासनिक नियमों की सर्वोच्चता को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

आदेश का उल्लंघन करने वाले स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश

हाईकोर्ट के जस्टिस बी. पुगलेंदी की एकल पीठ ने साफ किया कि सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूल शिक्षा विभाग के वैधानिक आदेशों से ऊपर नहीं हैं। अदालत ने न केवल स्कूल की आपत्तियों को खारिज किया, बल्कि आदेश का उल्लंघन करने वाले स्कूल प्रबंधन के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर विचार करने के भी निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा, सरकारी सहायता प्राप्त (Government-aided) लड़कों के स्कूलों (Boys’ Schools) के प्रबंधन केवल इस आधार पर किसी महिला शिक्षक को शामिल करने से मना नहीं कर सकते कि वह एक महिला हैं। देश के कानूनों या नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो बॉयज स्कूलों में महिला शिक्षकों की तैनाती पर रोक लगाता हो। बुनियादी ढांचे (Infrastructural Facilities) की कमी या केवल पुरुष स्टाफ होने का बहाना बनाकर शिक्षा विभाग के स्थानांतरण आदेश को चुनौती देना पूरी तरह से अवैध है।

मामला क्या है?: ‘सरप्लस’ शिक्षिका के तबादले पर स्कूल ने अड़ाया रोड़ा

यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल और वहां तैनात की गई एक महिला शिक्षिका के बीच है।

सरप्लस घोषित होना: याचिकाकर्ता शारदा (Saratha) एक ड्राइंग टीचर (कला शिक्षिका) हैं। शैक्षणिक वर्ष 2024-25 के लिए स्टाफ फिक्सेशन (कर्मचारी निर्धारण प्रक्रिया) के दौरान उन्हें उनके पुराने स्कूल में ‘सरप्लस’ (अतिरिक्त) घोषित कर दिया गया था।

बॉयज स्कूल में तैनाती: नियमों के तहत मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) ने उन्हें एक सरकारी सहायता प्राप्त बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल में तैनात करने का आदेश जारी किया, जहाँ ड्राइंग टीचर का एक स्वीकृत पद खाली पड़ा था।

स्कूल का इनकार और बहानेबाजी: स्कूल प्रबंधन ने महिला शिक्षिका को ज्वाइन कराने से साफ इनकार कर दिया। स्कूल की दलील थी कि यह पूरी तरह से लड़कों का स्कूल है, जहां कोई भी महिला शैक्षणिक या गैर-शैक्षणिक स्टाफ नहीं है। स्कूल ने यह भी कहा कि उनके पास महिला शिक्षक के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा (जैसे अलग वॉशरूम आदि) नहीं है।

अधिकारी का यू-टर्न: स्कूल के इस अड़ंगे के बाद, मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) ने अपने ही आदेश को बदलते हुए महिला शिक्षिका को किसी अन्य सहायता प्राप्त स्कूल में भेज दिया। शिक्षिका ने इस आत्मसमर्पण और भेदभावपूर्ण रवैये के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

शिक्षिका का जज्बा: ‘मुझे कोई विशेष सुविधा नहीं चाहिए’

कानूनी लड़ाई के दौरान महिला शिक्षिका ने अदालत के सामने एक मिसाल पेश करते हुए एक लिखित हलफनामा (Undertaking) दायर किया था। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें उस बॉयज स्कूल में तैनात किया जाता है, तो वह महिला होने के नाते किसी भी विशेष व्यवहार (Special Treatment) या अतिरिक्त बुनियादी सुविधाओं की मांग नहीं करेंगी और उपलब्ध संसाधनों में ही काम करेंगी। इसके बावजूद अधिकारियों ने स्कूल के दबाव में उनका तबादला दूसरी जगह बनाए रखा।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘अधिकारियों के आदेश पर अपील करने का अधिकार स्कूल को नहीं’

जस्टिस बी. पुगलेंदी ने 3 जुलाई, 2026 को दिए अपने आदेश में स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों दोनों को कड़ी फटकार लगाई:

आपत्ति का कोई कानूनी आधार नहीं

अदालत ने तमिलनाडु निजी स्कूल (नियमन) अधिनियम, 2018 और 2023 के नियमों का हवाला देते हुए कहा, न तो अधिनियम और न ही नियम किसी महिला शिक्षक को लड़कों के स्कूल में तैनात करने से रोकते हैं। किसी वैधानिक रोक के अभाव में, स्कूल प्रबंधन द्वारा उठाई गई आपत्ति का कोई कानूनी आधार (No Legal Foundation) नहीं है और इसे क्रियान्वयन को रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता था।

स्कूल कोई अपीलीय अदालत नहीं है

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) कानून के तहत किसी सरप्लस शिक्षक की तैनाती का आदेश जारी करता है, तो सहायता प्राप्त स्कूल के प्रबंधन के पास इतनी शक्ति नहीं है कि वह उस फैसले की समीक्षा करने बैठ जाए या खुद यह तय करे कि शिक्षक को रखना है या नहीं। नियमों का उल्लंघन करने पर गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

अदालत का अंतिम निर्देश: ‘स्कूल प्रबंधन पर कार्रवाई की जांच हो’

मद्रास हाई कोर्ट ने मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसमें महिला शिक्षिका को दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया था। कोर्ट ने अधिकारी को चार सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार शिक्षिका की तैनाती पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, कोर्ट ने इस मामले में हुए प्रशासनिक विलंभ पर चिंता जताते हुए स्कूल शिक्षा निदेशक (Director of School Education) को दो महत्वपूर्ण निर्देश दिए। इस बात की जांच की जाए कि शिक्षिका के तैनाती आदेश को लागू करने में देरी क्यों हुई और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह जांच की जाए कि आदेश का पालन करने से इनकार करने वाले सहायता प्राप्त स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कानूनी कार्यवाही (Proceedings) शुरू की जानी चाहिए या नहीं। अदालत में शिक्षिका की ओर से अधिवक्ता ए. बालाजी पेश हुए। राज्य सरकार का पक्ष अतिरिक्त सरकारी वकील एम. सरंगन ने और स्कूल प्रबंधन का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता सी. अरुल वाडिवेल और अधिवक्ता एम. पोझिलन ने रखा।

केस शीट: मद्रास उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै बेंच)
फैसले की तारीख3 जुलाई, 2026
माननीय न्यायाधीशजस्टिस बी. पुगलेंदी
मामले का शीर्षकशारदा बनाम मुख्य शिक्षा अधिकारी व अन्य (Saratha v The Chief Educational Officer & Ors.)
मूल विधिक कानूनतमिलनाडु निजी स्कूल (नियमन) अधिनियम, 2018 और नियम, 2023
अदालत का अंतिम आदेशतबादला रद्द करने का आदेश खारिज; बॉयज स्कूल महिला शिक्षक को रखने के लिए बाध्य है। आदेश न मानने पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ जांच के निर्देश।
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