Friday, July 10, 2026
HomeHigh CourtVivo India: SFIO की शिकायतों पर संज्ञान लेने से पहले आरोपियों को...

Vivo India: SFIO की शिकायतों पर संज्ञान लेने से पहले आरोपियों को सुनना जरूरी नहीं…यूं लगा वीवो (Vivo) कंपनी को झटका, पढ़िए फैसले को

Vivo India: चीन की दिग्गज स्मार्टफोन निर्माता कंपनी वीवो (Vivo India) को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने विशेष कॉर्पोरेट अदालतों की कार्यप्रणाली और नए कानूनों के प्रभाव को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष मेहला की एकल पीठ ने वीवो इंडिया की उस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें गुरुग्राम की विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले उसे सुनने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा, कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और गंभीर वित्तीय अपराधों की जांच करने वाली केंद्रीय एजेंसी सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) द्वारा कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत दर्ज कराई गई शिकायतों पर संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले आरोपियों को प्रारंभिक सुनवाई (Pre-cognizance hearing) का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

एसएफआईओ की जांच रिपोर्ट को कानूनन पुलिस रिपोर्ट के समकक्ष

एसएफआईओ की जांच रिपोर्ट को कानूनन पुलिस रिपोर्ट (Police Report) के समकक्ष माना जाता है, इसलिए इस पर नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 का वह प्रावधान लागू नहीं होगा जो निजी शिकायतों (Private Complaints) के मामले में मजिस्ट्रेट के सामने आरोपियों को पक्ष रखने का मौका देता है।”

मामला क्या है?: वीवो इंडिया बनाम SFIO (गुरुग्राम कोर्ट का विवाद)

यह कानूनी विवाद कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के अधीन आने वाली एजेंसी SFIO द्वारा वीवो इंडिया के खिलाफ गुरुग्राम की एक विशेष अदालत में दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत से शुरू हुआ।

वीवो की दलील: वीवो इंडिया ने गुरुग्राम की ट्रायल कोर्ट में नए कानून बीएनएसएस (BNSS) की धारा 223 के तहत एक आवेदन दायर कर मांग की थी कि कोर्ट द्वारा एसएफआईओ की शिकायत पर औपचारिक संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने और प्रारंभिक सुनवाई का मौका दिया जाए।

ट्रायल कोर्ट का इनकार: गुरुग्राम की विशेष अदालत ने वीवो की इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ वीवो ने सीनियर एडवोकेट आर. एस. राय के माध्यम से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि बीएनएसएस (BNSS) की धारा 223 के तहत अब किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करना अनिवार्य है।

हाई कोर्ट का फैसला (7 जुलाई, 2026): हाई कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि गुरुग्राम कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या अधिकार क्षेत्र की त्रुटि नहीं है।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: विशेष कानून बनाम सामान्य प्रक्रिया (BNSS)

जस्टिस सुभाष मेहला ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि क्यों कंपनी अधिनियम के तहत एसएफआईओ की शिकायतें आम जनता द्वारा की जाने वाली निजी शिकायतों से पूरी तरह अलग पायदान पर खड़ी हैं।

विशेष कानून हमेशा सामान्य कानून पर हावी रहेगा

अदालत ने बीएनएसएस (BNSS) की ही धारा 4 और 5 का हवाला देते हुए नोट किया कि ये धाराएं स्वयं स्पष्ट करती हैं कि देश के सामान्य दांडिक/आपराधिक कानूनों के प्रावधान किसी भी विशेष कानून (Special Law) द्वारा निर्धारित विशिष्ट प्रक्रियाओं को ओवरराइड या समाप्त नहीं करेंगे। चूंकि कंपनी अधिनियम, 2013 एक विशेष कानून है, इसलिए इसकी अपनी प्रक्रियाएं लागू रहेंगी।

कंपनी एक्ट में ‘प्री-कॉग्निजेंस’ हियरिंग का कोई प्रावधान नहीं

हाई कोर्ट ने कहा, कंपनी अधिनियम की धारा 436(1)(डी) का सीधा पाठ यह दर्शाता है कि शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को प्रारंभिक सुनवाई का अवसर देने की कोई वैधानिक आवश्यकता (Statutory Requirement) नहीं है। यह प्रावधान अपने डिजाइन में बिल्कुल स्पष्ट है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कंपनी एक्ट संज्ञान की प्रक्रिया पर मौन है; बल्कि यह बिना किसी पूर्व-संज्ञान नोटिस के एक विशिष्ट तंत्र प्रदान करता है।

एसएफआईओ की रिपोर्ट ‘पुलिस रिपोर्ट’ के समान है

अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी आम नागरिक द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर की जाने वाली निजी शिकायत (Private Complaint) और कंपनी अधिनियम की धारा 212 के तहत एक विस्तृत और वैज्ञानिक जांच के बाद किसी लोक सेवक (Public Servant) द्वारा दायर की जाने वाली वैधानिक शिकायत में जमीन-आसमान का अंतर है। कानून के अनुसार, एसएफआईओ की अंतिम जांच रिपोर्ट को एक ‘पुलिस रिपोर्ट’ माना जाता है, और पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेने से पहले आरोपियों को नोटिस भेजने की बीएनएसएस में कोई व्यवस्था नहीं है।

बीएनएसएस की धारा 223 केवल ‘मजिस्ट्रेट’ पर लागू होती है, विशेष अदालत पर नहीं

हाई कोर्ट ने तकनीकी अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि बीएनएसएस की धारा 223 अपनी भाषा के अनुसार केवल ‘अधिकार क्षेत्र रखने वाले मजिस्ट्रेट’ पर लागू होती है। इसके विपरीत, वीवो का मामला गंभीर कॉर्पोरेट अपराधों (जैसे कंपनी एक्ट की धारा 447 और 448 के तहत धोखाधड़ी) से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई कंपनी एक्ट की धारा 435(2)(ए) के तहत नामित एक ‘विशेष अदालत’ (Special Court) कर रही है, जिसकी अध्यक्षता एक सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश करते हैं।

केस शीट: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (चंडीगढ़)
फैसले की तारीख7 जुलाई, 2026
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सुभाष मेहला
मामले का शीर्षकवीवो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) व अन्य
मुख्य कानूनी विषयक्या BNSS की धारा 223 के तहत SFIO की शिकायत पर संज्ञान से पहले आरोपी को सुनना अनिवार्य है?
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका पूरी तरह खारिज; विशेष अदालत बिना किसी प्रारंभिक नोटिस के वीवो के खिलाफ शिकायत पर सीधे संज्ञान ले सकती है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
34.7 ° C
34.7 °
34.7 °
51 %
2.9kmh
100 %
Thu
35 °
Fri
36 °
Sat
32 °
Sun
31 °
Mon
34 °

Recent Comments