AIIMS Case: जब अदालत ने आपसे ‘स्पष्टीकरण’ (Explanation) मांगा था, तो आपने ‘जवाब’ के तौर पर ‘हलफनामा’ (Affidavit) कैसे दाखिल कर दिया?
बच्चे के डीएनए (DNA) टेस्ट में हुई अत्यधिक देरी और पेश दस्तावेज का मामला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने एक बच्चे के डीएनए (DNA) टेस्ट में हुई अत्यधिक देरी और उसके बाद अदालत के सामने पेश किए गए दस्तावेज़ की शब्दावली पर गहरी नाराजगी जताई।क्या आप सुप्रीम कोर्ट को जवाब दे रहे हैं? क्या देश के बड़े अधिकारियों को ‘स्पष्टीकरण’ शब्द का इस्तेमाल करने में शर्म आती है? इस तरह का लापरवाह रवैया और टकराव का रुख (Confrontationist stance) बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालती आदेशों की भाषा, उनके पालन में होने वाली प्रशासनिक लापरवाही और अधिकारियों के कथित ‘अहंकार’ को लेकर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक (Acting Director) को बेहद तीखी और कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने एक समय निदेशक के खिलाफ अवमानना (Contempt) की कार्यवाही शुरू करने और उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति से मिली छूट को रद्द करने तक का आदेश दे दिया था, हालांकि बाद में बिना शर्त माफी और दस्तावेज़ में सुधार के बाद मामले को बंद किया गया।
मामला क्या है?: अक्टूबर 2025 से लटका था बच्चे का DNA टेस्ट
यह पूरा विवाद अदालत के एक आदेश के समय पर पालन न होने और एम्स प्रशासन की हीलाहवाली से शुरू हुआ।
अक्टूबर 2025 का मुख्य आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2025 में ही एक मुख्य याचिका का निपटारा करते हुए एम्स (AIIMS) को एक बच्चे का डीएनए टेस्ट करने का निर्देश दिया था। लेकिन तय तारीख पर पीड़िता और बच्चा अस्पताल नहीं पहुंचे, तो एम्स ने रजिस्ट्री को पत्र लिखकर मामला टाल दिया।
अप्रैल 2026 की समयसीमा: कोर्ट ने दोबारा आदेश देकर 16 अप्रैल, 2026 तक टेस्ट पूरा करने को कहा। लेकिन इस तारीख तक भी टेस्ट नहीं हुआ।
एम्स का अजीब तर्क: एम्स ने कोर्ट को बताया कि जो व्यक्ति इस डीएनए टेस्ट का प्रभारी (In-charge) था, वह सेवानिवृत्त (Superannuate) हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बहाने को पूरी तरह “अमान्य” और “अस्वीकार्य” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि निदेशक कोर्ट से उस सेवानिवृत्त कर्मचारी की सेवाएं लेने की अनुमति मांग सकते थे, क्योंकि वे जानते थे कि मामला कितना संवेदनशील है।
कोर्ट हैरान…निदेशक गायब, डिप्टी सेक्रेटरी से हलफनामा
मई 2026 की सुनवाई में जब कोर्ट ने इस देरी पर निदेशक से ‘Explanation’ (स्पष्टीकरण) मांगा, तो कोर्ट यह देखकर हैरान रह गया कि निदेशक के बजाय एम्स के डिप्टी सेक्रेटरी ने हलफनामा दायर कर दिया था। कोर्ट को बताया गया कि उस समय एम्स में कोई स्थायी निदेशक नहीं था। इस पर कोर्ट ने तल्ख रुख अपनाते हुए कार्यकारी निदेशक को अवमानना का नोटिस जारी किया और कहा, हम इस जवाब से न केवल हैरान हैं बल्कि स्तब्ध हैं। जो भी व्यक्ति किसी पद पर है, चाहे वह स्थायी क्षमता में हो या कार्यकारी (Acting) क्षमता में, उसे उस पद की जिम्मेदारी लेनी होगी और कर्तव्यों का पालन करना होगा। हम अज्ञानता का कोई लाभ नहीं देंगे। प्रथम दृष्टया, एम्स के कार्यकारी निदेशक ने अदालत की अवमानना की है। हालांकि, इस तारीख तक डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट आ चुकी थी और कोर्ट ने मुख्य मामले को मेरिट के आधार पर निपटाते हुए रिपोर्ट हाई कोर्ट भेजने को कह दिया था, लेकिन कोर्ट के आदेश की अवहेलना के लिए कार्यकारी निदेशक को 7 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया था।
‘Affidavit’ बनाम ‘Explanation’ की कानूनी जंग
7 जुलाई को कार्यकारी निदेशक कोर्ट में पेश हुए, लेकिन उन्होंने जो दस्तावेज़ जमा किया, उस पर ‘रिप्लाई एफिडेविट’ (जवाबदेह हलफनामा) लिखा था। साथ ही, माफी मांगने के बावजूद उसमें टेस्ट न करा पाने के अपने कृत्य को सही ठहराने (Justify) की कोशिश की गई थी। आज की सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में बहस का मुख्य बिंदु दस्तावेज़ की शब्दावली बन गया।
जस्टिस अमानुल्लाह की तीखी टिप्पणी: “हमने आपसे स्पष्टीकरण मांगा था। पिछली बार भी आपने कहा ‘जवाब’। आप हमें जवाब दे रहे हैं? आज भी इस पर ‘हलफनामा’ लिखा है। क्या आईसीएस (अधिकारियों) को ‘स्पष्टीकरण’ शब्द का उपयोग करने में शर्म आती है? खारिज! हम इन्हें किसी न किसी रूप में दंडित करने जा रहे हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ‘एफिडेविट’ लिखने की? इसका मतलब है कि यह केवल एक जवाब है। मैं शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बहुत गंभीर हूँ… इतना कैजुअल अप्रोच?”
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) का बचाव: केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को समझाने की कोशिश की कि उनकी समझ के अनुसार, कोई भी स्पष्टीकरण ‘हलफनामे’ (Affidavit) के माध्यम से ही अदालत के रिकॉर्ड पर लाया जाता है। लेकिन जस्टिस अमानुल्लाह ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि यह अधिकारी के अहंकार और टकराव वाले रवैये को दर्शाता है।
कोर्ट का अंतिम रुख: माफी स्वीकार, पर सुधार के बाद
दुपहर करीब 12:30 बजे कोर्ट का रुख इतना सख्त था कि उसने एएसजी ऐश्वर्या भाटी से कहा कि वे दोपहर 1 बजे बेंच के उठने से पहले कार्यकारी निदेशक की कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करें, अन्यथा अवमानना का कड़ा आदेश जारी रहेगा।
मामले का पटाक्षेप कैसे हुआ?:
अंत में, एएसजी ऐश्वर्या भाटी के हस्तक्षेप और कार्यकारी निदेशक द्वारा बिना किसी शर्त के मांगी गई बिना शर्त माफी (Unconditional and unqualified apology) को देखते हुए कोर्ट ने नरमी दिखाई। अदालत ने एएसजी को उस ‘एफिडेविट’ शब्द को संशोधित करके ‘Explanation’ (स्पष्टीकरण) करने की अनुमति दी। एएसजी भाटी ने कोर्ट को यह आश्वासन भी दिया कि भविष्य में अदालती आदेशों और कार्यवाहियों को लेकर अधिकारियों की समझ में सुधार के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे ताकि ऐसी ‘गलती’ दोबारा न हो। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस अवमानना मामले को पूरी तरह बंद कर दिया।
केस शीट: उच्चतम न्यायालय निर्देश (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और रुख |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन |
| प्रतिवादी अधिकारी | कार्यकारी निदेशक, एम्स (AIIMS), नई दिल्ली |
| विवाद का मुख्य कारण | डीएनए टेस्ट के आदेश में देरी और ‘स्पष्टीकरण’ के बदले ‘जवाबदेह हलफनामा’ दाखिल करना। |
| अदालत का संदेश | अदालती आदेशों की भाषा का सम्मान अनिवार्य है। अधिकारी स्पष्टीकरण को अपना ‘जवाब’ या कानूनी ढाल नहीं बना सकते। |
| अंतिम आदेश | ‘एफिडेविट’ को ‘एक्सप्लेनेशन’ में संशोधित करने और बिना शर्त माफी के बाद अवमानना का मामला बंद। |

