Right To Appeal: कर्नाटक में दीवानी मुकदमों (Civil Cases) के अपीलीय क्षेत्राधिकार और हाई कोर्ट के बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में कर्नाटक हाईकोर्टने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
साल 2023 में राज्य सरकार ने किया था कानूनी संशोधन
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस सी.एम. पूनाचा की खंडपीठ ने साल 2023 में राज्य सरकार द्वारा किए गए उन कानूनी संशोधनों को संवैधानिक रूप से पूरी तरह वैध (Constitutionally Valid) करार दिया है, जिसके तहत सीनियर सिविल जज के फैसलों के खिलाफ पहली अपील (First Appeal) सुनने का अधिकार हाई कोर्ट से छीनकर जिला अदालतों (District Courts) को सौंप दिया गया था। हालांकि, कोर्ट ने इस कानून को पूरी तरह वैध मानते हुए इसकी धारा 4 (Section 4) को ‘रीड डाउन’ (Read Down – यानी उसके दायरे को सीमित) कर दिया है, जो इस कानून को साल 2007 से यानी भूतपूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू कर रही थी, ताकि पुराने तय हो चुके मुकदमों में कोई कानूनी अराजकता न फैले।
कानूनी संशोधन को लेकर यह रही राय
अदालत ने कहा, “किसी भी नागरिक के पास निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने का कानूनी अधिकार (Right to Appeal) एक मौलिक और ठोस अधिकार (Substantive Right) है। लेकिन, वह अपील किस फोरम या किस अदालत (High Court या District Court) में सुनी जाएगी, यह पूरी तरह से ‘प्रक्रियात्मक मामला’ (Matter of Procedure) है। संसद या राज्य विधायिका को मुकदमों के बोझ को कम करने और ‘दहलीज पर न्याय’ (Justice at the Doorstep) पहुंचाने के उद्देश्य से अपील के फोरम को बदलने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।”
मामला क्या है?: 2023 के ऐतिहासिक संशोधन और पुरानी व्यवस्था
साल 2023 से पहले कर्नाटक में यह व्यवस्था थी कि यदि सीनियर सिविल जज की अदालत से कोई दीवानी डिक्री या आदेश पास होता था और उस मुकदमे की वित्तीय कीमत (Suit Value) 10 लाख रुपये से अधिक होती थी, तो उसके खिलाफ पहली अपील सीधे कर्नाटक हाई कोर्ट में ‘रेगुलर फर्स्ट अपील’ (RFA) के रूप में दायर होती थी।
2023 का संशोधन कानून: राज्य सरकार ने कर्नाटक सिविल कोर्ट (संशोधन) अधिनियम, 2023 और कर्नाटक उच्च न्यायालय (संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित किया। इसके तहत 10 लाख रुपये की इस सीमा (Distinction) को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। नए नियम के अनुसार, सीनियर सिविल जज के फैसलों के खिलाफ सभी पहली अपीलें, मूल्य चाहे जो भी हो, अब सीधे संबंधित जिला अदालत (District Court) के सामने ही दायर होंगी।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति: इस कानून को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया गया कि यह संशोधन मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मुकदमों के पक्षकारों (Litigants) के पास यह स्थापित अधिकार है कि उनकी अपील देश की उच्च अदालत (High Court) द्वारा सुनी जाए। साथ ही, कानून को 2007 से लागू करने से पिछले कई पुराने फैसले अवैध घोषित हो जाएंगे।
सरकार का बचाव: राज्य सरकार ने एडिशनल एडवोकेट जनरल किरण वी. रोन के माध्यम से दलील दी कि हाई कोर्ट में पेंडिंग पड़े हजारों मामलों के बोझ को कम करने और लोगों को उनके गृह जिलों में ही न्याय सुलभ कराने के लिए कर्नाटक विधि आयोग (Karnataka Law Commission) की सिफारिश पर यह कदम उठाया गया है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 14?
8 जुलाई, 2026 को दिए अपने फैसले में चीफ जस्टिस विभु बाखरू की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की सभी दलीलों को खारिज करते हुए दो बेहद महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत सामने रखे।
बेंगलुरु और अन्य जिलों में कोई ‘भेदभाव’ नहीं
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यह कानून भेदभावपूर्ण है क्योंकि बेंगलुरु शहर (Bengaluru Urban District) के सिटी सिविल कोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपीलें अभी भी सीधे हाई कोर्ट जा रही हैं, जबकि बाकी जिलों के लोगों को जिला अदालत भेजा जा रहा है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा, “संविधान का अनुच्छेद 14 तार्किक वर्गीकरण (Reasonable Classification) की अनुमति देता है। बेंगलुरु सिटी सिविल कोर्ट के जज स्वयं ‘जिला जज’ कैडर के अधिकारी होते हैं, जबकि अन्य जिलों के न्यायालयों में वे ‘सीनियर सिविल जज’ होते हैं। इसलिए बेंगलुरु शहरी जिले की अपीलों को इस दायरे से बाहर रखने के पर्याप्त और ठोस कानूनी कारण मौजूद हैं।”
प्रक्रियात्मक बदलाव हमेशा ‘बैकडेट’ (Retrospective) हो सकते हैं
अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि अपील के फोरम का निर्धारण प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए विधायिका इसे भूतपूर्व प्रभाव (Retrospective) से लागू कर सकती है।
कोर्ट का सुधार: पुराने और बंद हो चुके फैसलों को सुरक्षा कवच
इस मामले में सबसे बड़ा पेंच कानून की धारा 4 को लेकर था, जो इस संशोधन को 28 अगस्त, 2007 से लागू कर रही थी। याचिकाकर्ताओं को डर था कि इससे पिछले 16-17 सालों में हाई कोर्ट द्वारा दिए गए सैकड़ों अंतिम फैसले ‘बिना क्षेत्राधिकार’ (Without Jurisdiction) के मानकर शून्य (Nullity) घोषित हो जाएंगे। इस कानूनी उलझन को सुलझाने के लिए हाई कोर्ट ने धारा 4 को ‘रीड डाउन’ करते हुए सुरक्षा कवच दिया। कहा, “हम सिविल कोर्ट संशोधन अधिनियम की धारा 4 के दायरे को इस तरह सीमित (Read Down) करते हैं ताकि इसके भूतपूर्व संचालन (Retrospective Operation) से दो चीजों को बाहर रखा जा सके: (i) वे सभी अपीलें जो अंतिम निर्णयों और आदेशों द्वारा पूरी तरह समाप्त/तय हो चुकी हैं; और (ii) लंबित कार्यवाहियों में पहले ही पारित किए जा चुके अंतरिम आदेश। विधायिका का यह इरादा कभी नहीं हो सकता कि हाई कोर्ट द्वारा तय किए जा चुके पुराने मुकदमों को अमान्य घोषित कर दिया जाए।”
लंबित मुकदमों पर क्या असर होगा?: अदालत ने साफ किया कि इस ‘बैकडेट’ कानून का असर केवल उन अपीलीय मुकदमों पर पड़ेगा जो वर्तमान में हाई कोर्ट में लंबित (Pending) हैं। इन लंबित अपीलों को अब जिला अदालतों में स्थानांतरित (Transfer) किया जाएगा और जिला अदालतें इन मुकदमों को उसी चरण (Stage) से आगे बढ़ाएंगी, जहाँ पर वे ट्रांसफर के वक्त थीं। हाई कोर्ट के 3 जुलाई, 2024 के अंतरिम आदेश के तहत अब तक हुई कोई भी कार्यवाही अवैध नहीं मानी जाएगी।
कोर्ट में पैरवी किसने की?
अदालत की सहायता के लिए (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एम. चंद्रशेखर ने न्यायमित्र के रूप में कोर्ट की मदद की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता के.एन. फणींद्र, विवेक रेड्डी, डी.आर. रविशंकर और अधिवक्ता रोहित आर. कुमार पेश हुए।
कर्नाटक सरकार की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) किरण वी. रोन और अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता नीलोफर अकबर ने पक्ष रखा।
केस शीट: कर्नाटक उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस सी.एम. पूनाचा |
| चुनौती के दायरे में कानून | कर्नाटक सिविल कोर्ट (संशोधन) अधिनियम, 2023 |
| विवाद का मुख्य विषय | क्या सीनियर सिविल जज के ₹10 लाख से ऊपर के फैसलों की अपील जिला कोर्ट भेजना असंवैधानिक है? |
| अदालत का अंतिम आदेश | संशोधन कानून पूरी तरह वैध; पुराने तय हो चुके मुकदमों पर इसका असर नहीं पड़ेगा, लेकिन वर्तमान में लंबित सभी अपीलें जिला अदालतों में ट्रांसफर होंगी। |

