Tuesday, August 25, 2026
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Landlord’s Right To Evict: कनॉट प्लेस से PNB को हटने के आदेश…बैंक मर्जर से मकान मालिक का बेदखली का अधिकार खत्म नहीं होता

Landlord’s Right To Evict: बैंकों के एकीकरण और वाणिज्यिक संपत्तियों के किरायेदारी अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रेंट कंट्रोल कानून स्वैच्छिक (Voluntary) और अनैच्छिक (Involuntary) कब्जे के हस्तांतरण में कोई अंतर नहीं करता। कोर्ट ने देश के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में से एक, पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस (CP) के एक प्राइम कमर्शियल स्पेस से बेदखल करने का आदेश जारी कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बैंकिंग विनियमन अधिनियम (Banking Regulation Act), 1949 के तहत जनहित में किया गया बैंकों का सरकारी विलय (Merger), किराएदार मकान मालिक कानूनों (Rent Control Laws) के तहत मकान मालिक को मिलने वाले वैधानिक संरक्षण को खत्म नहीं कर सकता। अगर मूल किराएदार का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और मकान मालिक की लिखित सहमति (Written Consent) के बिना कोई नई इकाई (Entity) उस परिसर पर कब्जा कर लेती है, तो चाहे वह हस्तांतरण स्वैच्छिक हो या सरकार के आदेश से, कानूनन मकान मालिक को उसे बेदखल करने का पूरा अधिकार है।”

मामला क्या है?: 1947 की किरायेदारी और 1986 का सरकारी विलय

यह कानूनी विवाद लगभग आठ दशक पुराना है और देश के सबसे महंगे कमर्शियल इलाकों में से एक से जुड़ा है।

किरायेदारी की शुरुआत (1947): भारत की आजादी के साल यानी 1947 में, ब्रिटिश मोटर कार कंपनी लिमिटेड (मकान मालिक) ने नई दिल्ली के कनॉट सर्कस स्थित ‘प्रताप बिल्डिंग’ में 3,500 वर्ग फुट से अधिक का एक बड़ा कमर्शियल स्पेस ‘हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक’ (HCB) को महज ₹585 प्रति महीने के किराए पर दिया था।

सरकारी मर्जर (1986): दिसंबर 1986 में, भारत सरकार ने एक गजट नोटिफिकेशन जारी कर जनहित में हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (HCB) का विलय पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में कर दिया। इस आरबीआई (RBI) योजना के तहत HCB की सभी संपत्तियां, देनदारियां और इस शाखा का भौतिक कब्जा भी पीएनबी के पास चला गया।

मकान मालिक की कोर्ट में दस्तक: मूल किराएदार (HCB) के गायब होते ही मकान मालिक (ब्रिटिश मोटर कार कंपनी) ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (DRC Act) की धारा 14(1)(b) के तहत पीएनबी को बेदखल करने की याचिका दायर कर दी। उनका सीधा तर्क था कि मूल किराएदार ने मकान मालिक की बिना किसी लिखित सहमति के संपत्ति का कब्जा तीसरी पार्टी (PNB) को सौंप दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का विधिक सिद्धांत: ‘लिखित सहमति के बिना सब-लेटिंग अवैध’

पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने अदालत में दलील दी थी कि वह किसी निजी सौदे या पिछले दरवाजे से इस संपत्ति में नहीं घुसा है, बल्कि उसे एक संप्रभु सरकारी अधिसूचना (Sovereign Notification) के तहत वहां बिठाया गया है। पीएनबी का यह भी तर्क था कि चूंकि यह विलय बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत संसद के सामने रखा गया था, इसलिए यह एक केंद्रीय कानून का रूप ले चुका है जो स्थानीय किराया कानूनों से ऊपर है।

सुप्रीम कोर्ट ने बैंक की इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए।

धारा 14(1)(b) निरपेक्ष (Absolute) है

अदालत ने अपने पुराने ऐतिहासिक फैसलों (सिंगर इंडिया लिमिटेड और परसराम हरनंद राव) का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(b) इस बात से सरोकार नहीं रखती कि मूल किराएदार ने जगह क्यों छोड़ी या नया किराएदार वहां कैसे आया। इस धारा का लागू होना केवल एक तथ्यात्मक स्थिति पर निर्भर करता है, यानी—बिना अनुमति के उप-किरायेदारी पर देना (Sub-letting) या कब्जा सौंपना। यह किराएदार का स्वैच्छिक कार्य है या नहीं, या ऐसा करने के पीछे क्या कारण थे, यह कानून की नजर में पूरी तरह से अप्रासंगिक (Irrelevant) है।

आरबीआई का मर्जर ‘प्रशासनिक आदेश’ है, ‘संसद का कानून’ नहीं

जस्टिस संजय करोल की पीठ ने के.आई. शेफर्ड बनाम भारत संघ मामले का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि आरबीआई द्वारा तैयार की गई विलय की योजना विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक कार्य (Administrative Function) है, न कि विधायी नियम (Legislative Rule)। चूंकि यह संसद द्वारा बनाया गया कानून नहीं है, इसलिए इसमें दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत मकान मालिक को मिलने वाले ‘लिखित सहमति के अनिवार्य संरक्षण’ को ओवरराइड (Override) करने की ताकत नहीं है।

कोर्ट का फैसला: पीएनबी को खाली करने के लिए मिला ग्रेस पीरियड

सुप्रीम कोर्ट ने मकान मालिक (ब्रिटिश मोटर कार कंपनी) की अपील को स्वीकार करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के पुराने आदेश को उलट दिया। हालांकि, यह देखते हुए कि पंजाब नेशनल बैंक इस प्रतिष्ठित कनॉट प्लेस लोकेशन से दशकों से काम कर रहा है, अदालत ने मानवीय और व्यावहारिक आधार पर बैंक को 31 जनवरी, 2027 तक का ग्रेस पीरियड (रियायती समय) दिया है।

अदालत की शर्तें

पीएनबी को 31 जनवरी, 2027 तक शांतिपूर्वक परिसर खाली करके मकान मालिक को सौंपना होगा। इसके लिए बैंक को चार सप्ताह के भीतर अदालत में एक औपचारिक वचनपत्र (Undertaking) देना होगा। बैंक को इस अवधि के दौरान अपने सभी पिछले और वर्तमान किराये के बकाये का नियमित भुगतान जारी रखना होगा। इस ऐतिहासिक मामले में मकान मालिक कंपनी की ओर से देश के दिग्गज वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और श्याम मेहता पेश हुए, जबकि हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक/पीएनबी का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता राजेश कुमार गौतम ने किया।

केस शीट: उच्चतम न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
मामले का शीर्षकब्रिटिश मोटर कार कंपनी लिमिटेड बनाम पीएनबी/एचसीबी
मूल विधिक कानूनदिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(b)
मुख्य कानूनी विषयक्या सरकारी बैंक विलय मकान मालिक के बेदखली के अधिकार को रद्द कर सकता है?
अदालत का अंतिम आदेशमकान मालिक के पक्ष में फैसला; पीएनबी को 31 जनवरी, 2027 तक परिसर खाली करने के कड़े निर्देश।
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