Non Prosecution: चेक बाउंस और आपराधिक मामलों में सजा के खिलाफ अपील करने वाले नागरिकों के विधिक अधिकारों को मजबूत करते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. वेंकट ज्योतिर्मय प्रतापा की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में अपील सुनना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिक की स्वतंत्रता से जुड़ा एक वैधानिक अधिकार है। हाई कोर्ट ने एक चेक बाउंस मामले में दोषी पाए गए व्यक्ति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को स्वीकार करते हुए निचली अपीलीय अदालत के उस आदेश को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसने वकील के मौजूद न होने पर केस को बंद कर दिया था।
मामले के गुण-दोष (Merits) के आधार पर ही प्रक्रिया करने पर जोर
अदालत ने कहा, यदि सजा के खिलाफ दायर किसी आपराधिक अपील (Criminal Appeal) की सुनवाई के दौरान आरोपी (याचिकाकर्ता) या उसका वकील अदालत में अनुपस्थित रहता है, तो भी अदालत गैर-पैरवी (Non-prosecution) या डिफॉल्ट के आधार पर उस अपील को खारिज नहीं कर सकती। अपीलीय अदालत की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और दस्तावेजों का खुद अध्ययन करे और मामले के गुण-दोष (Merits) के आधार पर ही अंतिम फैसला सुनाए।
मामला क्या है?: चेक बाउंस में 1 साल की सजा, वारंट और अपील खारिज
यह पूरा कानूनी विवाद ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881’ (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के एक मामले से शुरू हुआ था।
निचली अदालत की सजा: ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता (बादेती श्रीधर) को दोषी पाते हुए एक साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी और साथ ही ₹7.90 लाख का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया था।
अपील और कोर्ट का रुख: इस सजा के खिलाफ आरोपी ने सेशंस कोर्ट (अपीलीय अदालत) में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान आरोपी के खिलाफ एक जमानती वारंट (Bailable Warrant) लंबित था और वह कोर्ट में पेश नहीं हो पा रहा था।
अपीलीय अदालत की कार्रवाई: सेशंस कोर्ट ने यह नोट करते हुए कि “अपीलकर्ता वारंट के बावजूद लगातार अनुपस्थित है और अपने केस की पैरवी नहीं कर रहा है”, उसकी आपराधिक अपील को बिना सुने ही गैर-पैरवी (Dismissed for default) में खारिज कर दिया। इसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: आदेश में ही विरोधाभास और कानून की अनदेखी
जस्टिस डॉ. वेंकट ज्योतिर्मय प्रतापा ने अपीलीय अदालत के आदेश की बारीकी से समीक्षा की और उसमें गंभीर विधिक कमियां (Legal Infirmities) पाईं। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे।
आदेश के कागजात में ही दर्ज थी वकील की मौजूदगी
हाई कोर्ट ने हैरानी जताते हुए नोट किया कि निचली अदालत के आदेश की प्रस्तावना (Preamble) में ही यह दर्ज था कि याचिकाकर्ता के वकील कोर्ट में मौजूद थे। याचिकाकर्ता के वकील ने हाई कोर्ट में बताया कि उन्होंने अपीलीय अदालत से कुछ वास्तविक पारिवारिक कारणों से थोड़ी देर बाद (Pass over) केस सुनने की गुजारिश की थी। हाई कोर्ट ने कहा, जब अदालत खुद अपने आदेश में वकील की उपस्थिति को स्वीकार कर रही है, तो उसके ठीक बाद यह कहना कि ‘केस की पैरवी करने वाला कोई नहीं है इसलिए इसे खारिज किया जाता है’, पूरी तरह विरोधाभासी और कानूनन टिकने योग्य नहीं है।
आपराधिक अपील खारिज करने का कोई ‘शॉर्टकट’ नहीं
हाई कोर्ट ने स्थापित विधिक सिद्धांतों को दोहराते हुए साफ किया कि आपराधिक अपील को तकनीकी आधार पर खारिज करने का अदालतों के पास कोई अधिकार नहीं है। सजा के खिलाफ अपील करना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 374 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 415) के तहत एक नागरिक का वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है। यदि किसी कारणवश मुवक्किल या उसका वकील कोर्ट रूम में मौजूद नहीं भी है, तो भी अदालत के पास केवल दो ही रास्ते बचते हैं: या तो वह मामले को अगली तारीख के लिए स्थगित (Adjourn) कर दे, या फिर रिकॉर्ड पर मौजूद फाइलों को खुद पढ़कर मेरिट के आधार पर न्यायोचित फैसला दे। तीसरा कोई रास्ता कानून सम्मत नहीं है।
केस शीट: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय, अमरावती |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस डॉ. वेंकट ज्योतिर्मय प्रतापा (एकल पीठ) |
| केस का शीर्षक | बादेती श्रीधर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व अन्य |
| केस नंबर | क्रिमिनल रिवीजन केस नंबर- 502 / 2026 |
| प्रासंगिक कानून | धारा 138 (NI Act) एवं धारा 374 (CrPC) / धारा 415 (BNSS) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | निचली अदालत का खारिज करने का आदेश रद्द; अपील को बहाल करते हुए 2 महीने में मेरिट पर फैसला करने का निर्देश। |
आगे क्या होगा?: दो महीने में नए सिरे से सुनवाई का आदेश
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले को वापस अपीलीय अदालत (सेशंस कोर्ट) में पुनर्स्थापित (Restore) कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों को अपनी दलीलें रखने का पूरा और उचित मौका दिया जाए और इस अपील का निपटारा दो महीने के भीतर प्राथमिकता के आधार पर केवल और केवल ‘मेरिट’ के आधार पर किया जाए।

