Legal Professionals: देश के विधिक पेशेवरों को बड़ी राहत देते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने उपभोक्ता अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।
मुवक्किल की रिट याचिका खारिज
हाईकोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत की खंडपीठ (Division Bench) ने साफ किया है कि वकीलों के खिलाफ जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम में की जाने वाली शिकायतें कानूनी रूप से विचारणीय (Maintainable) नहीं हैं। हाई कोर्ट ने उपभोक्ता अदालतों के तीनों स्तरों (District, State & NCDRC) द्वारा वकील के खिलाफ शिकायत खारिज करने के फैसले को बिल्कुल सही ठहराते हुए मुवक्किल की रिट याचिका को खारिज कर दिया है।
वकील और मुवक्किल के बीच व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध
अदालत ने कहा, “एक मुवक्किल (Client) और उसके वकील (Advocate) के बीच का रिश्ता एक व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध (Contract of Personal Service) जैसा होता है। इसलिए, अगर किसी मुवक्किल को लगता है कि उसके वकील ने केस लड़ने में कोई लापरवाही या कमी (Deficiency in Service) बरती है, तो भी वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकता। वकीलों की कानूनी सेवाएं इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।
मामला क्या है?: सिविल सूट में हार, तो वकील को घसीटा कंज्यूमर कोर्ट
यह मामला एक मुवक्किल और उसके द्वारा नियुक्त किए गए एक सिविल वकील के बीच विवाद से शुरू हुआ था।
लापरवाही का आरोप: याचिकाकर्ता (मुवक्किल) ने एक सिविल मुकदमे में अपनी पैरवी के लिए एक वकील को नियुक्त किया था। केस में मनमुताबिक परिणाम न मिलने या कानूनी सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए मुवक्किल ने सीधे जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (District Commission) में उपभोक्ता शिकायत दर्ज करा दी।
तीनों फोरम से निराशा: जिला उपभोक्ता फोरम ने इस शिकायत को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद मुवक्किल ने राज्य उपभोक्ता आयोग (SCDRC) में अपील की और वहां से भी राहत न मिलने पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) में पुनरीक्षण (Revision) याचिका दायर की। तीनों ही उपभोक्ता अदालतों ने एक सुर में कहा कि वकीलों के खिलाफ उपभोक्ता कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती।
हाई कोर्ट का रुख: हारकर मुवक्किल ने इन तीनों आदेशों को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में रिट याचिका के जरिए चुनौती दी। लेकिन हाई कोर्ट ने भी मुवक्किल को झटका देते हुए कहा कि वह वकीलों पर कंज्यूमर केस चलाने की वैधता का कोई कानूनी आधार पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: क्यों बाहर हैं वकील?
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत की पीठ ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की बारीकियों और सुप्रीम कोर्ट की स्थापित नज़ीरों का हवाला देते हुए निम्नलिखित मुख्य विधिक बिंदु सामने रखे।
धारा 2(42) और ‘Contract of Personal Service’
अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(42) के तहत ‘सेवा’ (Service) की जो परिभाषा दी गई है, उसमें से “व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध” (Contract of Personal Service) को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। चूंकि एक वकील अपने मुवक्किल के व्यक्तिगत विश्वास, विशेषज्ञता और सीधे निर्देशों के आधार पर कोर्ट में पैरवी करता है, इसलिए यह रिश्ता एक सामान्य कमर्शियल सर्विस प्रदाता (जैसे बैंक, टेलीकॉम या इंश्योरेंस कंपनी) जैसा नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला सर्वोपरि, NCDRC का पुराना रुख खत्म
हाई कोर्ट ने नोट किया कि पूर्व में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) ने वकीलों को उपभोक्ता कानून के दायरे में लाने का एक अलग विचार रखा था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा इस संबंध में कानून स्पष्ट कर दिए जाने के बाद, NCDRC का वह पुराना दृष्टिकोण पूरी तरह निष्प्रभावी (Superseded) हो चुका है।
खंडपीठ ने दो टूक शब्दों में कहा: “यह कानून पूरी तरह से स्थापित और स्पष्ट है कि एक अधिवक्ता/वकील द्वारा अपने कानूनी कामकाज के सिलसिले में दी जाने वाली सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में नहीं आती हैं।”
स्टेट बार काउंसिल ही सही मंच
अदालत ने यह भी नोट किया कि मुवक्किल ने इस मामले में पहले स्टेट बार काउंसिल (State Bar Council) के सामने भी वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की शिकायत की थी, जिसे बार काउंसिल पहले ही खारिज कर चुकी है। यदि किसी वकील के आचरण में कोई कमी है, तो उसके लिए ‘बार काउंसिल’ ही एकमात्र विधिक मंच है, न कि कंज्यूमर फोरम।
केस शीट: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय, अमरावती |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत (खंडपीठ) |
| साइटेशन (Citation) | एएसएसके दुर्गा प्रसाद बनाम राज्य |
| प्रासंगिक कानून | उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 [धारा 2(42)] |
| विवाद का मुख्य विषय | क्या वकील की सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता फोरम में केस हो सकता है? |
| अदालत का अंतिम निर्णय | रिट याचिका खारिज; वकीलों के खिलाफ उपभोक्ता शिकायतें कानूनी रूप से विचारणीय नहीं हैं। |

