Monday, July 13, 2026
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Rent Control: किराया मामलों में हाई कोर्ट्स अनुच्छेद 227 के तहत हर बार दखल नहीं दे सकते…यह नीतिगत फैसला सभी के लिए अहम, जरूर पढ़ें

Rent Control: मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच लंबे समय से चलने वाले मुकदमों और अदालती शक्तियों के दायरे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 का मुख्य उद्देश्य यह देखना नहीं है कि निचली अदालत का फैसला सही है या गलत, बल्कि इसका मकसद सत्ता के दुरुपयोग, कर्तव्य विफलता या गंभीर अन्याय को रोकना है। अदालत ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 227 (Article 227) के तहत उच्च न्यायालयों (High Courts) को मिली पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (Supervisory Jurisdiction) की शक्ति का इस्तेमाल किराया नियंत्रण (Rent Control) मामलों में केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट रिकॉर्ड पर मौजूद ठोस सबूतों के बिना अपनी मर्जी से सीधे किराया नहीं बढ़ा सकते और न ही वे निचली अदालतों या ट्रिब्यूनल के फैसलों की जगह जबरन अपना दृष्टिकोण थोप सकते हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि: 1966 से चल रहा उत्तर प्रदेश सरकार का किराया विवाद

यह मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसका कानूनी सफर काफी लंबा रहा है।

सरकारी विभाग का कब्जा: साल 1966 में मकान मालिकों ने अपनी एक बड़ी इमारत (5,866 वर्ग फुट का प्लॉट) उत्तर प्रदेश सरकार के व्यापार कर विभाग (Trade Tax Department) को किराए पर दी थी। 1990 के दशक में किरायेदारों (सरकार) को बेदखल करने के प्रयास विफल होने के बाद, मकान मालिकों ने किराया बढ़ाने के लिए एक आवेदन दायर किया था।

निचली अदालतों का रुख: रेंट कंट्रोल अथॉरिटी ने संपत्ति के मुख्य स्थान (Prime Location) को देखते हुए किराया 4 रुपये प्रति वर्ग फुट (कुल 14,400 रुपये प्रति माह) तय किया। मकान मालिकों ने इसे कम माना और अपील की, जिसके बाद एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज (ADJ) ने मामले को दोबारा नए सिरे से विचार के लिए अथॉरिटी के पास वापस (Remand) भेज दिया।

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हाई कोर्ट ने क्या किया और सुप्रीम कोर्ट को क्यों हस्तक्षेप करना पड़ा?

ADJ के इसी रिमांड ऑर्डर को मकान मालिकों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी।

हाई कोर्ट द्वारा किराया बढ़ोतरी (5 मई, 2025): हाई कोर्ट ने मकान मालिकों की इस दलील को स्वीकार कर लिया कि बगल की संपत्ति का किराया 14 रुपये प्रति वर्ग फुट है। अदालत ने माना कि मामले को बार-बार वापस भेजने से केवल देरी होगी, इसलिए सीधे किराया बढ़ाकर 14 रुपये प्रति वर्ग फुट करने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ सरकारी किरायेदारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट का फैसला रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट के पास इस बात का कोई दस्तावेजी सबूत या रिकॉर्ड नहीं था कि बगल की संपत्ति का किराया वाकई 14 रुपये प्रति वर्ग फुट था। यह आंकड़ा केवल मकान मालिकों के वकील की मौखिक दलील में था, जिस पर किरायेदारों की कोई सहमति दर्ज नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: रिकॉर्ड पर सामग्री के अभाव में, अनुच्छेद 227 के तहत सीधे किराया बढ़ाने का आदेश टिकाऊ नहीं है। हाई कोर्ट असाधारण परिस्थितियों में रेंट कंट्रोल मामलों में अपनी पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन इस मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड पर सबूत न होने के कारण विवादित फैसले को खारिज किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के 3 सबसे बड़े विधिक सिद्धांत (Core Rulings)

अदालत ने इस फैसले के जरिए रेंट कंट्रोल और हाई कोर्ट की शक्तियों को लेकर तीन प्रमुख बातें स्पष्ट कीं।

अनुच्छेद 227 का उपयोग कब और कैसे हो?

अदालत ने समझाया कि हाई कोर्ट राज्य के सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी होने के नाते अपने क्षेत्राधिकार के भीतर की अदालतों पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति रखते हैं। इसका उपयोग मुख्य रूप से तीन स्थितियों में होना चाहिए। जब कोई निचली अदालत या ट्रिब्यूनल उस शक्ति का प्रयोग करे जो उसके पास नहीं है। जब वह उस शक्ति का प्रयोग करने में विफल रहे जो उसके पास है। जब वह अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपने क्षेत्राधिकार की सीमाओं को लांघ जाए। “यह एक अपीलीय शक्ति (Appellate Power) नहीं है, बल्कि एक असाधारण और विवेकाधीन शक्ति है जिसका उपयोग बहुत ही सावधानी और संयम से किया जाना चाहिए।”

सरकार किरायेदार है, तो मकान मालिक बंधक नहीं बन जाता

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराया, किरायेदारी और बेदखली विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 21(8) की व्याख्या करते हुए राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा, अगर अपीलकर्ता-राज्य की दलील मान ली जाए, तो यह वास्तव में किरायेदार को ही मकान मालिक बनाने जैसा होगा। कोई प्रामाणिक आवश्यकता नहीं, कोई किराया वृद्धि नहीं—इसका मतलब यह होगा कि मकान मालिक के लिए अपनी ही संपत्ति को शारीरिक या वित्तीय रूप से वापस पाने का कोई रास्ता ही नहीं बचेगा। किसी भी वैधानिक प्रावधान की इतनी संकीर्ण व्याख्या महज इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि किरायेदार ‘सरकार’ है।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 227 एवं किराया विवाद समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
संबंधित कानूनयूपी शहरी भवन (किराया, किरायेदारी और बेदखली विनियमन) अधिनियम, 1972
संविधान का अनुच्छेदअनुच्छेद 227 (उच्च न्यायालयों की पर्यवेक्षी शक्ति)
अदालत का अंतिम निर्णयहाई कोर्ट का आदेश रद्द; मामला सक्षम अथॉरिटी को वापस (Remand) भेजा गया।

भविष्य की दिशा: 4 महीने के भीतर नया फैसला करने का निर्देश

हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विवाद के त्वरित निपटारे के लिए सख्त समय-सीमा तय की है।

समय-सीमा: सक्षम रेंट अथॉरिटी को निर्देश दिया गया है कि वह 4 महीने के भीतर रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर देय किराए का नए सिरे से निर्धारण करे।

पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect): कोर्ट ने साफ किया कि अथॉरिटी द्वारा अंततः जो भी किराया तय किया जाएगा, वह साल 2008 (मूल आवेदन दायर करने की तारीख) से ही लागू माना जाएगा, ताकि मकान मालिकों को उनके लंबे इंतजार का उचित वित्तीय मुआवजा मिल सके।

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