Simulated Hanging: वैवाहिक जीवन में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों और संदिग्ध मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चिकित्सकीय-विधिक (Medico-Legal) मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आई आत्महत्या की थ्योरी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने अपनी पत्नी की हत्या करने और उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करने वाले एक शख्स की दोषसिद्धि (Conviction) और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Post-Mortem Report) में सामने आई चोटें आत्महत्या की थ्योरी को पूरी तरह खारिज करती हैं और यह साबित करती हैं कि पहले महिला की हत्या की गई और फिर मामले को आत्महत्या का रूप देने के लिए शव को फंदे से लटका दिया गया।
अदालत आंख मूंदकर हर फांसी लगाने को आत्महत्या नहीं मान सकती
शीर्ष अदालत ने कहा, “अगर किसी महिला का शव घर के भीतर फंदे से लटका हुआ मिलता है, तो अदालतें आंख मूंदकर इसे आत्महत्या (Suicide) नहीं मान सकतीं। यदि मृतका के शरीर पर मारपीट, चोट या संघर्ष के निशान हैं, तो ‘सिमुलेटेड हैंगिंग’ (Simulated Hanging / हत्या के बाद शव को फंदे पर लटकाना) की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत पति या घर के सदस्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे बताएं कि बंद कमरे के भीतर पत्नी की मौत कैसे और किन परिस्थितियों में हुई।”
मामला क्या है?: शादी के 15 महीने के भीतर संदिग्ध मौत, दोषी पति फरार
यह मामला त्रिपुरा के एक वैवाहिक घर के भीतर हुई क्रूरता से जुड़ा है, जिसकी कानूनी यात्रा इस प्रकार है।
दहेज प्रताड़ना और मौत: मृतका सोमा की शादी के महज 15 महीने के भीतर 16 जून, 2007 को उसके ससुराल में मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शादी के बाद से ही उसे मोटरसाइकिल और नकदी जैसी दहेज मांगों को लेकर लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। इस विवाद को सुलझाने के लिए कई बार सामाजिक पंचायतें भी हुई थीं।
अदालती फैसला: ट्रायल कोर्ट ने मृतका के पति गौर आचार्यजी (Gour Acharjee) को हत्या (Section 302 IPC) और क्रूरता (Section 498A IPC) का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साल 2012 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी पति की सजा को बरकरार रखा (जबकि साक्ष्यों के अभाव में माता-पिता और भाई को बरी कर दिया था)। इसके खिलाफ दोषी पति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: क्या होती है ‘सिमुलेटेड हैंगिंग’ और कानून के नियम?
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों और फोरेंसिक बारीकियों का गहराई से अध्ययन करने के बाद ‘दिखावटी फांसी’ (Simulated Hanging) और साक्ष्य कानून की स्थिति साफ की।
‘सिमुलेटेड हैंगिंग’ (Simulated Hanging) के चिकित्सकीय लक्षण
अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर नोट किया कि मृतका सोमा के सीने, जबड़े और सिर पर गंभीर चोटें थीं, जो किसी बाहरी हमले या संघर्ष (Struggle) को दर्शाती हैं। कोर्ट ने सामान्य आत्महत्या और दिखावटी फांसी के बीच का अंतर बताते हुए कहा कि मृतका के गले पर आत्महत्या की स्थिति में बनने वाला विशिष्ट लिगेचर मार्क (Ligature Mark) गायब था। गर्दन के टिशू (Tissues) के आसपास कोई खरोंच या सूजन/नील (Bruising) नहीं थी।आंखों, चेहरे, नाक या गले में कोई रक्त संकुलन (Congestion) नहीं था और न ही जीभ बाहर निकली हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “मृतका के शरीर पर पाई गई चोटें किसी साधारण आत्महत्या (Suicidal Hanging) से मेल नहीं खातीं। शरीर के विभिन्न हिस्सों पर मृत्यु से पहले आई ये चोटें (Ante-mortem injuries) ऐसी नहीं हैं जिन्हें कोई व्यक्ति खुद को पहुंचा सके। साफ है कि मौत सिर की गंभीर चोट के कारण हुई थी और बाद में शव को फंदे पर लटकाया गया था।”
साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 (Section 106, Evidence Act) का शिकंजा
अदालत ने दोहराया कि जब कोई अपराध चारदीवारी के भीतर यानी घर की गोपनीयता में होता है, तो कानून की यह धारा लागू होती है। हालांकि शुरुआती जिम्मेदारी (Initial Burden) हमेशा पुलिस/अभियोजन पर होती है, लेकिन एक बार जब यह साबित हो जाता है कि घटना के वक्त पति और पत्नी घर में अकेले थे, तो वहां मौजूद सदस्य (Inmate) पर यह विशेष जिम्मेदारी आ जाती है कि वह उस मौत का कारण स्पष्ट करे।
CrPC की धारा 313 [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 351] के तहत बयान दर्ज कराते समय आरोपी पति सोमा के शरीर पर आई चोटों या उसकी मौत का कोई भी तार्किक या विश्वसनीय स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह नाकाम रहा।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट ‘सिमुलेटेड हैंगिंग’ विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन |
| अपीलकर्ता (Appellant) | गौर अcharjee (पति) |
| अपराध और धाराएं | धारा 302 (हत्या) एवं 498A (दहेज क्रूरता) IPC [अब क्रमशः BNS की धारा 103 व 85] |
| फोरेंसिक निष्कर्ष | सिर की चोट से मौत; हत्या के बाद शव को फंदे से लटकाया गया (Simulated Hanging)। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | पति की अपील पूरी तरह खारिज; उम्रकैद की सजा बरकरार। |
फरार दोषी को तुरंत गिरफ्तार करने का सख्त आदेश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया कि अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी पति जमानत का दुरुपयोग करते हुए फरार (Absconding) हो गया है। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीधे प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं:
डीजीपी को निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की एक प्रति त्रिपुरा के पुलिस महानिदेशक (DGP, Tripura) को तुरंत भेजने का आदेश दिया है।
विशेष टीम का गठन: डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि वे तुरंत एक विशेष पुलिस टीम का गठन करें, फरार दोषी का पता लगाएं और उसे अविलंब हिरासत (Custody) में लेकर जेल भेजें।

