Cancer Medicine: केरल हाईकोर्ट के कार्यवाहक/मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन को लिखे एक बेहद संवेदनशील और गंभीर पत्र में भारतीय न्याय व्यवस्था में होने वाली ‘न्यायिक देरी’ (Judicial Delays) के मानवीय और जानलेवा प्रभाव को उजागर किया गया है।
जीवन रक्षक कैंसर दवाओं की अधिक कीमत का मामला
यह पत्र ‘वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट’ के सह-संयोजक ज्योत्सना सिंह और के.एम. गोपीकुमार द्वारा 10 जुलाई, 2026 को भेजा गया है। इस पत्र के जरिए अदालत से मांग की गई है कि स्तन कैंसर (Breast Cancer) की पेटेंट दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने से जुड़े इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की 15 जुलाई, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर बिना किसी रुकावट के अंतिम फैसला (Final Adjudication) सुनाया जाए। अदालत ने कहा, जब सवाल जिंदगी और मौत का हो, तो अदालत की तारीखें किसी के जीवन का अंत बन सकती हैं। जीवन रक्षक कैंसर दवाओं (Life-saving Cancer Drugs) की अत्यधिक कीमतों के खिलाफ साल 2022 में कोर्ट पहुंचने वाली एक महिला मरीज की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई। इसके बाद कोर्ट ने जनहित को देखते हुए इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले में बदल दिया। लेकिन बेहद अफसोसजनक है कि पिछले 4 साल में यह केस कम से कम 57 बार लिस्ट हुआ, 40 बार टाला गया, 8 अलग-अलग जजों के सामने से गुजरा, मगर अंतिम फैसला आज भी कोसों दूर है।”
मामला क्या है?: ₹95,000 प्रति माह की दवा और एक मरीज का संघर्ष
यह पूरा कानूनी विवाद जून 2022 में शुरू हुआ था, जब स्तन कैंसर से पीड़ित एक लाचार महिला ने केरल हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
अफोर्डेबल इलाज की मांग: याचिकाकर्ता का तर्क था कि भारत में पेटेंट कानूनों के कारण कुछ जीवन रक्षक दवाएं आम नागरिकों की पहुंच से बिल्कुल बाहर हैं। उदाहरण के लिए, ‘रिबोसिब्लिब’ (Ribociclib) दवा का मासिक खर्च लगभग ₹78,468.75 है, जबकि ‘अबेमासिब्लिब’ (Abemaciclib) की कीमत ₹47,752 से ₹95,504 प्रति माह तक जाती है।
पेटेंट का एकाधिकार: पेटेंट प्रोटेक्शन के कारण अन्य भारतीय दवा निर्माता कंपनियां इन दवाओं का जेनेरिक (सस्ता) वर्जन नहीं बना पा रही हैं, जिससे मरीजों को मजबूरी में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मनमाफिक कीमतें चुकानी पड़ रही हैं।
मरीज की मौत और स्वतः संज्ञान: अपनी याचिका के जरिए देश की लाखों महिलाओं के लिए सस्ती दवाओं की उम्मीद जगाने वाली इस मुख्य याचिकाकर्ता ने सितंबर 2022 में इलाज के अभाव और बीमारी के कारण दम तोड़ दिया। कोर्ट ने इस मानवीय त्रासदी की गंभीरता को समझा और 16 सितंबर 2022 को इस केस को बंद करने के बजाय इसे ‘In Re Exorbitant Pricing of Life Saving Patented Medicines’ नाम से एक ‘सुओ मोटो’ (स्वतः संज्ञान) जनहित याचिका में तब्दील कर दिया।
तारीख पर तारीख का अंतहीन चक्र: 4 साल की कानूनी सुस्ती
मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र में केस की जो क्रोनोलॉजी (समय-सारणी) बताई गई है, वह देश के अदालती ढर्रे की कड़वी सच्चाई को बयां करती है।
57 बार लिस्टिंग और रोस्टर बदलाव: जून 2022 से लेकर अब तक यह मामला कम से कम 57 बार कोर्ट के सामने आ चुका है। इसे 40 बार अलग-अलग प्रशासनिक कारणों से स्थगित (Adjourn) किया गया। इस दौरान केस की फाइल 8 अलग-अलग माननीय न्यायाधीशों की बेंच से होकर गुजरी।
स्पेशल हियरिंग का रद्द होना: इस मामले को निर्णायक मोड़ पर लाने के लिए 21 जनवरी, 2023 को एक विशेष अंतिम सुनवाई (Exclusive Final Hearing) तय की गई थी, लेकिन ठीक उसी समय जजों के ‘रोस्टर’ (कार्यक्षेत्र) में बदलाव हो गया और मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया।
बहस पूरी, फिर भी फैसला नहीं: पत्र में फ्लैग किया गया है कि साल 2025 के दौरान कई बार यह केस कोर्ट की कार्यसूची में ‘FOR DISPOSAL’ (निस्तारण के लिए) के रूप में लिस्ट हुआ। केंद्र सरकार, फार्मास्युटिकल कंपनियों और चिकित्सा विशेषज्ञों के सारे जवाब और वैज्ञानिक रिपोर्ट ऑन-रिकॉर्ड आ चुके हैं। इसके बावजूद, 2 जुलाई 2026 की हालिया सुनवाई में भी कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका।
‘संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) का सीधा उल्लंघन’
पत्र के जरिए कड़े शब्दों में याद दिलाया गया है कि स्वास्थ्य का अधिकार केवल एक नीति-निर्देशक सिद्धांत नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक का मूल अधिकार है:
अदालत से अपील: याचिकाकर्ताओं ने चीफ जस्टिस सौमेन सेन से प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की है ताकि 15 जुलाई, 2026 को जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की पीठ के समक्ष होने वाली सुनवाई में इस केस की निरंतर और निर्बाध अंतिम सुनवाई सुनिश्चित की जा सके।
महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रहार: पत्र में कहा गया है कि स्तन कैंसर भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बीमारी है। दवाओं की अत्यधिक कीमत के कारण गरीब और मध्यम वर्ग की महिलाएं तड़प-तड़प कर मरने को मजबूर हैं। कानूनी देरी इन मरीजों से उनके जीने का अधिकार छीन रही है।
केस शीट: केरल हाई कोर्ट स्वतः संज्ञान समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और विवरण |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय, कोच्चि |
| मुख्य प्रशासनिक प्राधिकारी | चीफ जस्टिस सौमेन सेन (जिनसे हस्तक्षेप की मांग की गई है) |
| मामले का शीर्षक | In Re Exorbitant Pricing of Life Saving Patented Medicines |
| लंबित अवधि और लिस्टिंग | वर्ष 2022 से लंबित; 57 बार लिस्टेड, 40 बार स्थगित, 8 जज बदले। |
| संबद्ध जीवन रक्षक दवाएं | Ribociclib (₹78K+/माह) और Abemaciclib (₹95K/माह तक) |
| आगामी सुनवाई की तिथि | 15 जुलाई, 2026 (जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की पीठ के समक्ष) |

