Two-Child Policy: सरकारी सेवा में कार्यरत महिलाओं के मातृत्व अधिकारों और राज्य की जनसंख्या नीतियों के टकराव पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।
दो जीवित बच्चों के नियम को लेकर अदालत ने टिप्पणी की
हाईकोर्ट के जस्टिस के. सरथ की एकल पीठ ने साफ किया कि दो जीवित बच्चों के नियम को उन मामलों में आड़े नहीं लाया जा सकता जहाँ पहली डिलीवरी में ही जुड़वां बच्चे पैदा हुए हों। कहा, जुड़वां (Twins) बच्चों का पैदा होना एक प्राकृतिक और जैविक घटना (Biological Event) है, जो किसी भी महिला के नियंत्रण से बाहर है। राज्य की ‘दो-संतान नीति’ (Two-Child Policy) का अंधाधुंध और कड़ा इस्तेमाल कर किसी महिला कर्मचारी को उसकी दूसरी गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) देने से मना नहीं किया जा सकता। नियमों की ऐसी संकीर्ण व्याख्या मातृत्व लाभ के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है, जो महिला के स्वास्थ्य की रक्षा और उसकी नौकरी की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं।
मामला क्या है?: जुड़वां बच्चों के बाद तीसरी संतान और कॉलेज का अड़ंगा
यह कानूनी लड़ाई मंचेरियल जिले के एक सरकारी महिला कॉलेज में कार्यरत 35 वर्षीय जूनियर इंग्लिश लेक्चरर जादी स्वरूपा रानी द्वारा दायर की गई थी।
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता शिक्षिका ने साल 2023 में अपनी पहली गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। इसके बाद, अप्रैल 2026 में अपनी दूसरी गर्भावस्था के दौरान उन्होंने अपनी तीसरी संतान को जन्म दिया।
विभाग का इनकार: जब शिक्षिका ने मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया, तो कॉलेज प्रशासन और संबंधित सोसाइटी ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया। सरकार की दलील थी कि राज्य के सेवा नियमों (2010 और 2014 के नियम) के अनुसार, मातृत्व अवकाश केवल उन्हीं विवाहित महिला कर्मचारियों को मिल सकता है जिनके दो से कम जीवित बच्चे हों। चूंकि उनके पास पहली डिलीवरी से पहले ही दो जीवित बच्चे थे, इसलिए वे इस लाभ की हकदार नहीं थीं।
वित्तीय बोझ की दलील: राज्य सरकार ने अदालत में यह तर्क भी दिया कि पात्रता से परे जाकर ऐसे लाभ देने से सरकारी खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ेगा।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: “नियमों की लकीर का फकीर बनना गलत”
जस्टिस के. सरथ ने सरकार की ‘कठोर’ विधिक दलीलों को पूरी तरह से खारिज करते हुए महिला अधिकारों के पक्ष में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
जैविक घटना पर इंसान का वश नहीं: याचिकाकर्ता के वकील गट्टू विनय कुमार की दलील से सहमति जताते हुए कोर्ट ने माना कि पहली बार में जुड़वां बच्चे होना पूरी तरह से एक जैविक कारक था। इसके आधार पर महिला को उसके मौलिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित करना पूरी तरह अनुचित है।
उद्देश्य को न मारें नियम: अदालत ने स्पष्ट किया कि यहाँ सवाल नियम की वैधता का नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके (Application) का है। नियमों की शाब्दिक और संकीर्ण व्याख्या (Literal Interpretation) मातृत्व अवकाश के उस मानवीय उद्देश्य को ही परास्त कर देगी, जो कामकाजी महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा करने और उन्हें बिना किसी शारीरिक या मानसिक तनाव के अपनी सेवा जारी रखने के लिए तैयार की गई है।
अन्य राज्यों के प्रगतिशील उदाहरणों का हवाला
अपने ऐतिहासिक फैसले को विधिक आधार देने के लिए जस्टिस सरथ ने अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों और राज्यों के संशोधनों का संदर्भ दिया।
मद्रास हाई कोर्ट और तमिलनाडु मॉडल: कोर्ट ने नोट किया कि मद्रास हाई कोर्ट के फैसलों के बाद तमिलनाडु सरकार ने अपने नियमों में संशोधन कर ऐसी विशेष परिस्थितियों में अतिरिक्त डिलीवरी के लिए मैटरनिटी लीव की अनुमति दी है।
आंध्र प्रदेश मॉडल: अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश ने मातृत्व अवकाश का लाभ उठाने के लिए जीवित बच्चों की संख्या की क्रूर शर्त को ही पूरी तरह से हटा दिया है।
अदालत का अंतिम आदेश: पूरे वेतन के साथ 180 दिनों की छुट्टी मंजूर
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए निर्देश जारी किए।
अवकाश की अवधि: याचिकाकर्ता जादी स्वरूपा रानी को उनकी दूसरी गर्भावस्था के लिए 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 तक पूरे 180 दिनों का वैध मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाए।
पूरा वेतन और भत्ते: कॉलेज प्रशासन को सख्त निर्देश दिया गया है कि वे इस पूरी छुट्टी की अवधि के लिए याचिकाकर्ता को उनका पूरा वेतन (Full Salary) और सभी स्वीकार्य भत्ते (Allowances) तुरंत जारी करें।
विधिक केस शीट: तेलंगाना हाई कोर्ट बनाम दो-संतान नीति (मैटरनिटी लीव विवाद)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस के. सरथ |
| याचिकाकर्ता | जादी स्वरूपा रानी (35 वर्षीय जूनियर लेक्चरर) |
| स्वीकृत अवकाश अवधि | 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 (180 दिन) |
| प्रशासनिक रुख | पहली बार जुड़वां बच्चे होने के कारण तीसरी संतान पर लीव देने से इनकार |
| न्यायालय का विधिक सिद्धांत | जैविक कारणों को आधार बनाकर महिलाओं के कल्याणकारी विधिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता |
अदालत ने यह साफ करके कि ‘डिलीवरी’ (गर्भावस्था की संख्या) और ‘बच्चों की संख्या’ में विधिक अंतर होता है, देश की लाखों कामकाजी महिलाओं के मातृत्व की गरिमा को सुरक्षित किया है। यह आदेश आंध्र और तमिलनाडु की तरह तेलंगाना में भी भविष्य के सेवा नियमों में बड़े बदलावों का रास्ता साफ करेगा।

