Monday, November 2, 2026
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Child Abuse Material: मोबाइल न मिलने से नहीं रुक सकती कानूनी कार्रवाई…चाइल्ड पोर्नोग्राफी मामले में अपराध में इस्तेमाल हुआ था मोबाइल

केस मैट्रिक्स: Saket Court Ruling on Child Abuse Material & Digital Evidence

Child Abuse Material: चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) अपलोड करने के आरोपी व्यक्ति की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए साकेत कोर्ट (दिल्ली) ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी (Saket Courts) ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 की धारा 67B के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने या आरोप तय (Framing of Charges) होने की प्रक्रिया नहीं रोकी जा सकती क्योंकि अपराध में इस्तेमाल किया गया मोबाइल फोन बरामद नहीं हुआ है।

मामला क्या था?: NCMEC रिपोर्ट से शुरू हुई जांच

  1. मामले की शुरुआत: यह मामला राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के माध्यम से साइबर पुलिस स्टेशन को मिली एक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) द्वारा जनरेट की गई एक ‘साइबरटिपलाइन रिपोर्ट’ (CyberTipline Report) पर आधारित थी।
  2. आरोप: रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि एक फेसबुक (Facebook) अकाउंट से 17 सेकंड का एक वीडियो अपलोड किया गया था, जिसमें एक बच्चा यौन कृत्य में लिप्त दिखाई दे रहा था।
  3. जांच प्रक्रिया: पुलिस ने आईपी एड्रेस (IP Address) और मोबाइल नंबर को ट्रैक किया। जिस व्यक्ति के नाम पर सिम पंजीकृत थी, उसने पुलिस को बताया कि आरोपी ने उसके फोन का इस्तेमाल करके वह फेसबुक अकाउंट बनाया और संचालित किया था।

आरोपी की दलीलें और साकेत कोर्ट का रुख

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने को साकेत सत्र अदालत में चुनौती दी थी:

आरोपी के तर्कसत्र अदालत (Sessions Court) का फैसला / रुख
1. फोन बरामद नहीं हुआ: आरोपी से कोई मोबाइल फोन नहीं मिला है।ट्रायल के स्तर पर फोन अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट के Just Rights for Children Alliance v. S. Harish (2024) फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब आईपी लॉग्स (IP Logs) और सब्सक्राइबर डिटेल्स आरोपी को सोशल मीडिया अकाउंट से जोड़ते हैं, तो फोन की रिकवरी न होना केस को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। आरोपी द्वारा फोन ठिकाने लगाने का फायदा उसे नहीं दिया जा सकता।
2. NCMEC/फेसबुक रिपोर्ट की ग्राह्यता (Admissibility): न तो फेसबुक और न ही NCMEC के अधिकारियों से जांच के दौरान पूछताछ की गई।ट्रायल का विषय: रिपोर्ट की साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की ग्राह्यता ट्रायल (गवाही) के दौरान तय होगी, आरोप तय करते समय नहीं।
3. वीडियो की सामग्री और उम्र का विवाद: वीडियो धारा 67B के तहत नहीं आता और इसमें बच्चे की पहचान स्पष्ट नहीं है।गंभीर संदेह (Grave Suspicion): आरोप तय करने के चरण में केवल यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया गंभीर संदेह बनता है। ट्रायल कोर्ट ने खुद वीडियो देखकर माना है कि यह बच्चे से जुड़ा यौन सामग्री वाला वीडियो है।

अदालत की मुख्य टिप्पणी

साकेत कोर्ट (जस्टिस हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी) का आदेश: आरोप तय (Framing of Charge) करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपी के खिलाफ ‘गंभीर संदेह’ पैदा करती है, न कि यह कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के मामला साबित कर दिया है। यदि डिजिटल साक्ष्य (IP Logs व Subscriber details) आरोपी का सोशल मीडिया अकाउंट पर नियंत्रण साबित करते हैं, तो भौतिक उपकरण (मोबाइल) की अनुपस्थिति के आधार पर एक वैध अभियोजन को शुरुआत में ही खत्म (Nip in the bud) नहीं किया जा सकता।

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