हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कड़ा रुख
- “यह एक इंसान के साहस का अपमान है”: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने बैंक की दलीलों पर कड़ी फटकार लगाते हुए कहा:“याचिकाकर्ता द्वारा दिखाए गए असाधारण और अनुकरणीय साहस को बैंक द्वारा महज ‘उनकी ड्यूटी का हिस्सा’ कहना न केवल इस घटना को मामूली बनाना है, बल्कि अपनी जान जोखिम में डालने वाले व्यक्ति का लगभग अपमान करना है। यह किसी फिल्म का दृश्य या किताब का अध्याय नहीं था, बल्कि एक वास्तविक जीवन का साहस था।” — दिल्ली हाईकोर्ट
- व्यवस्था को मांगनी चाहिए माफी: अदालत ने कहा कि मैनेजर चाहते तो अन्य कर्मचारियों और गार्ड्स की तरह अपनी जान बचाने के लिए सरेंडर कर सकते थे। लेकिन उन्होंने गोली खा जाने के जोखिम के बावजूद अलार्म दबाया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस नौकरशाही रवैये और 28 वर्षों तक कोर्ट के चक्कर कटवाने के लिए “पूरी व्यवस्था को उनसे माफी मांगनी चाहिए।”
- सम्मान की लड़ाई: कोर्ट ने रेखांकित किया कि यह मामला केवल पैसों का नहीं बल्कि सम्मान का है, जो बिना किसी मुकदमेबाजी के अपने आप उस बहादुर कर्मचारी को मिलना चाहिए था।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 में ₹40 लाख की सशस्त्र बैंक डकैती को जान की बाजी लगाकर नाकाम करने वाले एक बहादुर बैंक मैनेजर के पक्ष में ऐतिहासिक और भावुक फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने 10 सितंबर 2026 के अपने विस्तृत आदेश में बैंक की नौकरशाही और लालफीताशाही (Red-tapism) की कड़ी आलोचना करते हुए बैंक को निर्देश दिया कि वह पूर्व मैनेजर सुरजीत सिंह को केंद्र सरकार के 1991 के दिशा-निर्देशों के तहत ₹2.50 लाख से अधिक की पुरस्कार/मुआवजा राशि ब्याज सहित अदा करे। अदालत ने पंजाब एंड सिंध बैंक (PSB) के उस अड़ियल और संवेदनहीन तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें बैंक ने कहा था कि मैनेजर का लुटेरों को रोकना कोई बहादुरी नहीं बल्कि “उनकी सामान्य ड्यूटी का हिस्सा” था। अदालत ने बैंक की इस दलील को एक जांबाज कर्मचारी के असाधारण साहस का उपहास और अपमान करार दिया।
उच्च न्यायालय की प्रमुख और तीखी टिप्पणियां
1. असाधारण साहस को ‘ड्यूटी’ कहना बहादुरी का अपमान बैंक के रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा: “बहादुरी और त्वरित सूझबूझ (Presence of Mind) के ऐसे असाधारण कृत्य को विडंबना यह है कि बैंक द्वारा ‘उसकी ड्यूटी का हिस्सा’ करार दिया गया। यह न केवल याचिकाकर्ता द्वारा दिखाए गए असाधारण और अनुकरणीय साहस को महत्वहीन बनाना (Trivialisation) है, बल्कि उस व्यक्ति का सीधा अपमान है जिसने सार्वजनिक धन और ग्राहकों की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी थी।”
2. यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं, सिस्टम को माफी मांगनी चाहिए
- पीठ ने रेखांकित किया:“यह किसी फिल्म का दृश्य या किसी किताब का अध्याय नहीं है। दिनदहाड़े होने वाली एक भीषण डकैती को मैनेजर ने अपनी सूझबूझ से नाकाम किया। वे इस पूरी घटना के वास्तविक नायक (Hero) बनकर उभरे, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें नौकरशाही प्रक्रियाओं की लालफीताशाही और गुमनामी में धकेल दिया गया। सिस्टम को इस जांबाज कर्मचारी को 28 साल तक मुकदमेबाजी झेलने के लिए मजबूर करने और इस स्तर की संवेदनहीनता दिखाने के लिए माफी मांगनी चाहिए।”
- अदालत ने आगे जोड़ा कि यदि लुटेरे मैनेजर को गोली मार देते, तो बैंक शायद मरणोपरांत एक प्रशंसा प्रमाण पत्र और परिवार को खोखली सांत्वना के कुछ शब्द देकर पल्ला झाड़ लेता।
3. सवाल पैसे का नहीं, सम्मान (Honour) का है
- अदालत ने कहा कि यह लड़ाई केवल आर्थिक लाभ की नहीं बल्कि उस मान-सम्मान की थी जो बैंक को बिना किसी मुकदमे के स्वयं प्रदान करना चाहिए था। 28 वर्षों की मानसिक प्रताड़ना की भरपाई किसी भी धनराशि से नहीं की जा सकती।
घटना की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (28 दिसंबर 1998 की सशस्त्र डकैती)
- घटनास्थल: पंजाब एंड सिंध बैंक की रोशनपुरा, नजफगढ़ (दिल्ली) शाखा—जो एक ‘हाई-रिस्क’ ब्रांच घोषित थी और सुरक्षा के लिए दो सशस्त्र गार्ड तैनात थे।
- डकैतों का हमला: 28 दिसंबर 1998 को दोपहर लगभग 1 बजे, स्वचालित हथियारों से लैस 5 डकैत बैंक में घुसे। उन्होंने बैंक में मौजूद लगभग 40 ग्राहकों को काउंटरों के नीचे छिपने का आदेश दिया।
- गार्ड्स का आत्मसमर्पण बनाम मैनेजर का अदम्य साहस:
- दोनों सशस्त्र सुरक्षा गार्ड्स ने लुटेरों को रोकने के बजाय अपने हथियार सौंप दिए और आत्मसमर्पण कर दिया।
- कैशियर ने डकैतों की बंदूक के डर से ₹40 लाख नकद बैग में भर दिए।
- डकैतों ने मैनेजर के केबिन का कांच तोड़ दिया और उन पर रिवाल्वर तान दी।
- डकैती को नाकाम करने का साहसिक कदम:
- जान की परवाह किए बिना मैनेजर सुरजीत सिंह ने फोन उठाकर मदद मांगी और सीधे ‘इमरजेंसी अलार्म बटन’ (Emergency Alarm) दबा दिया।
- अलार्म का हूटर बजते ही लुटेरों में भगदड़ मच गई।
- भागते हुए डकैतों के सामने मैनेजर ने खुद मुख्य निकास द्वार (Exit Door) पर शारीरिक रूप से अड़कर रास्ता रोक दिया। धक्का-मुक्की में रुपयों से भरा बैग गिर गया और नोट बिखर गए। परिणामस्वरूप डकैत ₹40 लाख में से केवल ₹75,000 ही ले भाग सके और ₹39.25 लाख से अधिक का सार्वजनिक धन बच गया।
कानूनी विवाद: केंद्र सरकार की 1991 गाइडलाइंस
- 1991 के दिशा-निर्देश: वित्त मंत्रालय (आर्थिक कार्य विभाग – बैंकिंग प्रभाग) के 1991 के नियमों के अनुसार, बैंकों में होने वाली डकैतियों या आतंकी हमलों का सक्रिय रूप से मुकाबला करने वाले कर्मचारियों को विशेष वित्तीय पुरस्कार और आउट-ऑफ-टर्न पदोन्नति (Out-of-turn Promotion) देने का प्रावधान है।
- बैंक का इनकार: पुलिस, मीडिया और बैंक के जनरल मैनेजर द्वारा सिफारिश किए जाने के बावजूद बैंक प्रबंधन ने यह कहते हुए पुरस्कार व पदोन्नति से इनकार कर दिया कि मैनेजर ने “सक्रिय प्रतिरोध” (Active Resistance) नहीं किया और केवल अलार्म बजाना ड्यूटी का हिस्सा था।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- सक्रिय प्रतिरोध की पुष्टि: उच्च न्यायालय ने माना कि हथियार के सामने खड़े होकर हूटर बजाना और दरवाजे पर डकैतों का रास्ता रोकना 1991 की गाइडलाइंस के तहत ‘सक्रिय प्रतिरोध’ की स्पष्ट परिभाषा में आता है।
- मुआवजे और ब्याज का भुगतान: बैंक को निर्देश दिया गया कि वह पूर्व मैनेजर सुरजीत सिंह को ₹2.50 लाख से अधिक की निर्धारित पुरस्कार/मुआवजा राशि देय तिथि से ब्याज सहित तत्काल जारी करे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सिविल रिट याचिका (बैंक डकैती प्रतिरोध मुआवजा व आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन विवाद)
- प्रासंगिक नीति: आर्थिक कार्य विभाग (बैंकिंग प्रभाग), भारत सरकार की 1991 की मुआवजा नीति
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- प्रतिवादी (पंजाब एंड सिंध बैंक) की ओर से: अधिवक्ता रजत अरोड़ा एवं नीरज कुमार
- पीठ: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Brave Manager: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा (Justice Neena Bansal Krishna) |
| याचिकाकर्ता | सुरजीत सिंह (तत्कालीन वरिष्ठ प्रबंधक, रोशन पुरा, नजफगढ़ शाखा) |
| संबंधित नीति | 1991 का वित्त मंत्रालय/बैंकिंग विभाग का दिशानिर्देश (डकैती व आतंकी हमलों का विरोध करने वाले बैंक कर्मचारियों को मुआवजा व आउट-ऑफ-टर्न पदोन्नति) |
| मुख्य मुद्दा | क्या सशस्त्र डकैती को अपनी जान जोखिम में डालकर रोकना महज ‘ड्यूटी का हिस्सा’ है या ‘विशेष साहस’? |
| अदालत का फैसला | याचिका मंजूर; बैंक की लापरवाही पर फटकार, ₹2.50 लाख से अधिक का मुआवजा और ब्याज देने का आदेश। |

