Sunday, November 1, 2026
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Vehicle Interim Custody: केवल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के आधार पर जब्त वाहन की अंतरिम कस्टडी तय नहीं हो सकती…यह कानूनी सिद्धांत जान लें

केस मैट्रिक्स: Supreme Court Ruling on Vehicle Interim Custody

पहलूविवरण
मामले का नामKrishnan Narayana v. State of Andhra Pradesh & Ors.
माननीय पीठजस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
मूल सिद्धांतRC साक्ष्य है, अंतिम प्रमाण नहीं; समग्र परिस्थितियों के आधार पर होगी कस्टडी।
याचिकाकर्ता के वकीलवरिष्ठ अधिवक्ता एस. नागामुथु एवं अन्य
उत्तरदाताओं के वकीलवरिष्ठ अधिवक्ता आनंद एम. संजय नूली एवं अन्य

Vehicle Interim Custody: आपराधिक मामलों की जांच के दौरान जब्त किए गए वाहनों की अंतरिम कस्टडी (Interim Custody) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कृष्णन नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में यह निर्णय सुनाया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल वाहन का पंजीकरण प्रमाणपत्र (Registration Certificate – RC) ही यह तय नहीं करता कि कस्टडी किसे मिलेगी। अदालतों को प्रत्येक मामले की समग्र परिस्थितियों और प्राथमिक साक्ष्यों (Prima Facie Assessment) का आकलन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य कानूनी सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह) की टिप्पणी: “वाहन का पंजीकरण (RC) एक प्रासंगिक कारक है, लेकिन यह साक्ष्य के रूप में काम करता है; यह अंतरिम कब्जे/कस्टडी के अधिकार का अंतिम या निश्चित प्रमाण नहीं है… इस शक्ति के प्रयोग के लिए अदालत को संपत्ति की प्रकृति, उसके जब्त होने की परिस्थितियों और प्रस्तुत सामग्री को ध्यान में रखते हुए केवल एक प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मूल्यांकन करना होता है कि कस्टडी का सबसे बेहतर हकदार कौन है। यह स्वामित्व (Ownership) का अंतिम निर्णय नहीं है।”

मामला क्या था?: ग्रेनाइट कारोबार और वाहनों का विवाद

  1. विवाद की पृष्ठभूमि: ग्रेनाइट व्यवसायी कृष्णन नारायण और कंपनी ‘अर्थ स्टेन’ (Earth Stein) के बीच पिक-अप ट्रक, 3 एक्सकेवेटर और 1 टिपर की कस्टडी को लेकर विवाद शुरू हुआ।
  2. आरोप-प्रत्यारोप: कृष्णन नारायण का आरोप था कि अर्थ स्टेन कंपनी के अधिकारियों ने उनकी कंपनी (M/s Pure Minerals) के परिसर से वाहन अवैध रूप से जब्त करवा दिए। वहीं, अर्थ स्टेन का कहना था कि जब नारायण कंपनी में निदेशक थे, तब कंपनी के फंड से ये वाहन खरीदे गए थे जिन्हें उन्होंने दुरुपयोग कर अपने नाम/अपनी कंपनी के नाम कराया था। दोनों पक्षों ने एफआईआर दर्ज कराई थी।
  3. निचली अदालतों का रुख: पुलिस द्वारा वाहनों की जब्ती के बाद ट्रायल कोर्ट ने दोनों की याचिकाएं खारिज कर दीं। बाद में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने वाहनों की अंतरिम कस्टडी ‘अर्थ स्टेन’ कंपनी को दे दी, जिसके खिलाफ नारायण सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

कृष्णन नारायण की मुख्य दलील यह थी कि वाहन उनकी कंपनी के नाम पर पंजीकृत (Registered) हैं, इसलिए आरसी के आधार पर अंतरिम कस्टडी उन्हें मिलनी चाहिए। अदालत ने आरसी से परे जाकर निम्नलिखित समग्र परिस्थितियों (Overall Circumstances) को आधार बनाया।

  • जब्ती का स्थान: पुलिस ने वाहनों को ‘अर्थ स्टेन’ के कार्यस्थल (Operational Site) से जब्त किया था।
  • ऋण की किश्तें (EMI): वाहनों के लोन की किश्तों का भुगतान कृष्णन नारायण के बजाय ‘अर्थ स्टेन’ के बैंक खाते से किया गया था।
  • निर्णय: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ये परिस्थितियां पंजीकरण प्रमाणपत्र से अधिक वजनदार हैं। इसलिए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अंतरिम कस्टडी ‘अर्थ स्टेन’ को ही सौंपी।

अदालत का स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसकी यह टिप्पणी केवल अंतरिम कस्टडी तक सीमित है और इसका असर लंबित मुकदमों (जैसे स्वामित्व, फंड का दुरुपयोग या शेयर ट्रांसफर की वैधता) पर नहीं पड़ेगा।

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