Friday, July 31, 2026
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Doctors’ Duties: अपराध की जानकारी के बिना सोनोग्राफी करने वाला डॉक्टर POCSO के तहत दोषी नहीं…POCSO एक्ट की धारा 19 व 21 जानें

केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)

पहलूकानूनी ब्योरा
संबंधित अदालतछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Bilaspur)
माननीय पीठमुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
संबंधित कानूनPOCSO अधिनियम की धारा 19 (रिपोर्टिंग का कर्तव्य) एवं धारा 21 (रिपोर्ट न करने की सजा)
मुख्य कानूनी सिद्धांतअपराध की जानकारी/आशंका के बिना केवल सोनोग्राफी करने पर डॉक्टर POCSO के तहत उत्तरदायी नहीं है।
अंतिम निर्णयडॉक्टर के खिलाफ दर्ज पूरक चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही रद्द (Quashed)।

Doctors’ Duties: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी पीड़िता की डायग्नोस्टिक सोनोग्राफी (Ultrasound Sonography) करने के आधार पर किसी डॉक्टर या रेडियोलॉजिस्ट के खिलाफ POCSO अधिनियम की धारा 21 (रिपोर्ट न करने पर सजा) के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि यह साबित करने के लिए कोई प्राथमिक सामग्री न हो कि डॉक्टर को यौन अपराध (POCSO Offence) के घटित होने की जानकारी या आशंका थी।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा (Chief Justice Ramesh Sinha) और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल (Justice Ravindra Kumar Agrawal) की खंडपीठ ने एक रेडियोलॉजिस्ट (सोनोलॉजिस्ट) डॉक्टर द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। अदालत ने माना कि पेशेवर डॉक्टरी कर्तव्यों का सामान्य पालन करने पर केवल अनुमानों (Surmises) के आधार पर आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) तय नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था?

  • घटना: एक 15 वर्षीय किशोरी के साथ एक नाबालिग (Juvenile) द्वारा यौन उत्पीड़न के बाद वह गर्भवती हो गई थी।
  • डॉक्टर पर आरोप: गर्भावस्था के उन्नत चरण (Advanced Stage of Pregnancy) के दौरान याचिकाकर्ता डॉक्टर ने पीड़िता की सोनोग्राफी की थी। जांच के दौरान पुलिस ने डॉक्टर को केवल इस आधार पर आरोपी बना दिया (धारा 21 POCSO Act) कि उसने यह जानते हुए भी मामले की सूचना पुलिस या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को नहीं दी।
  • डॉक्टर की दलील: याचिकाकर्ता डॉक्टर ने तर्क दिया कि उन्होंने PC-PNDT अधिनियम का पूरी तरह पालन करते हुए केवल अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन किया था। न तो प्राथमिकी (FIR) में और न ही चार्जशीट में ऐसा कोई साक्ष्य है जिससे यह साबित हो कि उन्हें किसी यौन अपराध की जानकारी दी गई थी या उन्हें इसका ज्ञान था।

हाई कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और सिद्धांत

                                                       POCSO कानून में रिपोर्टिंग की बाध्यता
                                                                           │
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धारा 19: रिपोर्ट करने का वैधानिक कर्तव्य                                                                              धारा 21: रिपोर्ट न करने पर दंड
• केवल तभी लागू जब अपराध की स्पष्ट जानकारी                                                                 • केवल धारा 19 के उल्लंघन पर लागू।
  या घटित होने कीआशंका (Apprehension) हो।                                                          • केवल सोनोग्राफी करने से अपराध सिद्ध नहीं होता।

धारा 19 और 21 POCSO का सही दायरा

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम की धारा 19 के तहत मामले की रिपोर्ट करने का वैधानिक कर्तव्य केवल तभी उत्पन्न होता है जब किसी व्यक्ति को यह स्पष्ट जानकारी (Knowledge) हो कि कोई अपराध हुआ है या उसकी आशंका (Apprehension) हो। धारा 21 केवल इस कर्तव्य का पालन न करने पर दंड का प्रावधान करती है।

पेशेवर कर्तव्य बनाम आपराधिक दायित्व

अदालत ने अपने आदेश में कहा, पेशेवर कर्तव्यों के सामान्य क्रम में केवल डायग्नोस्टिक सोनोग्राफी करने से यह स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चिकित्सा व्यवसायी को POCSO अधिनियम के तहत किसी अपराध के होने की जानकारी थी। वैधानिक प्राथमिक शर्तों के अभाव में केवल कयासों या धारणाओं के आधार पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।

मुकदमे को रद्द (Quashing) करने का आधार

हाई कोर्ट ने पाया कि FIR, गवाहों के बयानों या पूरक चार्जशीट (Supplementary Charge-sheet) में ऐसा कोई बयान या साक्ष्य नहीं था कि पीड़िता या उसके परिवार ने डॉक्टर को यौन उत्पीड़न के बारे में सूचित किया था। ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of Court) होगा।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रेडियोलॉजिस्ट के खिलाफ संज्ञान लेने वाले निचली अदालत के आदेश, पूरक चार्जशीट (POCSO अधिनियम की धारा 21 के संबंध में) और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द (Quashed) कर दिया।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इस फैसले से मेडिकल बिरादरी को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने साफ कर दिया है कि डॉक्टरों द्वारा नियमित इलाज या जांच करने पर उन्हें तब तक आपराधिक मामलों में नहीं घसीटा जा सकता जब तक कि उनके खिलाफ अपराध की जानकारी होने का कोई ठोस सबूत न हो।

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