केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस जे.बी. पारदीवाला एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन |
| केस का नाम | राजस्थान राज्य व अन्य बनाम देव कांत मीणा (State of Rajasthan & Ors. v Dev Kant Meena) |
| संबंधित कानून | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (धारा 19) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | नए साक्ष्यों के बिना केवल राजनीतिक दबाव या राय बदलकर अभियोजन की मंजूरी (Sanction for Prosecution) की समीक्षा नहीं की जा सकती। |
| अंतिम निर्णय | राज्य की अपील खारिज; राज्य सरकार पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया गया। |
Red Hand: भ्रष्टाचार के एक मामले में डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा चलाने (Sanction for Prosecution) की अनुमति देने के फैसले को राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद बदलने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की कड़ी खिंचाई की है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला (Justice JB Pardiwala) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की पीठ ने राजस्थान सरकार द्वारा दायर अपील पर फैसला सुनाते हुए यह कड़ा रुख अपनाया [राजस्थान राज्य व अन्य बनाम देव कांत मीणा (State of Rajasthan & Ors. v Dev Kant Meena)]।सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की याचिका को खारिज करते हुए उस पर ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का जुर्माना (Cost) ठोका है।
शेक्सपियर के ‘हेमलेट’ का हवाला और सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 और राज्य का रवैया
│
┌─────────────────────────────────┴─────────────────────────────────┐
▼ ▼
'To be or not to be' की दुविधा अमान्य राजनीतिक हस्तक्षेप पर प्रहार
• सक्षम प्राधिकारी बार-बार अपना रुख नहीं बदल सकते। • बिना किसी नए साक्ष्य के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO)
• धारा 19 का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों की रक्षा करना है। के इशारे पर फैसला पलटना पूरी तरह अवैध।
फैसला हेमलेट की दुविधा जैसा नहीं हो सकता
शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘हेमलेट’ के संवाद का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई [2026] के अपने आदेश में कहा, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया हेमलेट की दुविधा ‘To be or not to be’ (करें या न करें) जैसी नहीं हो सकती। यदि निर्णय में ढुलमुल रवैया (Ambivalence) दिखता है, तो यह माना जा सकता है कि बाहरी विचार हावी थे। यह एक ऐसा मामला है जहां राजनीतिक दबाव (Political Dictate) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
बिना नए साक्ष्य के पुराना फैसला पलटना गैर-कानूनी
पीठ ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 19 लोक सेवकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाने के लिए बनाई गई है। एक बार जब सरकार ने किसी अधिकारी के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर दिया, तो बिना किसी नए साक्ष्य/सामग्री (Fresh Material) के केवल राय बदलकर दोबारा मंजूरी देना पूरी तरह से अवैध है।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट आने पर नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने पर भी सवाल उठाए। याचिकाकर्ता को मुख्यमंत्री कार्यालय के दबाव में समीक्षा (Review) के जरिए बेवजह हाई कोर्ट तक घसीटा गया। राज्य को कम से कम तब तो रुक जाना चाहिए था जब उसकी सीमा के भीतर की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत (हाई कोर्ट) ने एक स्पष्ट रूप से अवैध और दूषित आदेश को रद्द कर दिया था।
क्या था पूरा मामला? (₹5,000 की रिश्वत का आरोप)
- आरोप (2017): राजस्थान के एक सरकारी डॉक्टर पर आरोप लगा था कि उसने 2017 में घुटने के ऑपरेशन के लिए मरीज के रिश्तेदार से ₹5,000 से ₹6,000 की रिश्वत मांगी थी। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 29 मार्च 2017 को ट्रैप लगाकर लॉक्ड दराज (Locked Drawer) से ₹2,000 बरामद करने का दावा किया था।
- पहली जांच और इनकार: राजस्थान सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने साक्ष्यों की जांच की और पाया कि रिकॉर्ड की गई फोन कॉल रिश्वत के लिए नहीं, बल्कि ऑपरेशन में लगने वाले स्टील इम्प्लांट (Steel Implants) के खर्च से जुड़ी थीं। दराज तोड़कर ₹2,000 मिलने की थ्योरी पर भी संदेह जताया गया। इस आधार पर राज्य सरकार ने डॉक्टर पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इंतकार कर दिया।
- CMO का हस्तक्षेप: बाद में, बिना किसी नए सबूत के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के संयुक्त सचिव द्वारा इस फाइल को दोबारा समीक्षा के लिए भेजा गया। यद्यपि कार्मिक विभाग (Department of Personnel) ने फिर से मंजूरी न देने की सिफारिश की, लेकिन अंततः राजनीतिक दबाव में अभियोजन की मंजूरी दे दी गई।
- हाई कोर्ट का रुख: डॉक्टर ने इस मंजूरी को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने राज्य के आदेश को रद्द कर दिया, जिसके खिलाफ राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
उच्चतम न्यायालय का अंतिम आदेश
- अपील खारिज: राजस्थान सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया गया।
- ₹1 लाख का जुर्माना (Costs): सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को ₹50,000 हाई कोर्ट के समक्ष और ₹50,000 सुप्रीम कोर्ट के समक्ष (कुल ₹1,00,000) दो महीने के भीतर जमा करने का सख्त निर्देश दिया।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों की स्वायत्तता और उनके कानूनी संरक्षण के लिहाज से एक बड़ा नजीर है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि निष्पक्ष रूप से काम करने वाले लोक सेवकों को राजनीतिक प्रतिशोध या नौकरशाही के ढुलमुल रवैये का शिकार नहीं बनाया जा सकता।

