सुप्रीम कोर्ट का मुख्य आदेश और कानून
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, तब तक निम्नलिखित कानूनों में तय न्यूनतम योग्यता के बिना किसी भी शिक्षक को स्कूलों या कॉलेजों में नियुक्त या समायोजित नहीं किया जाएगा:
- RTE Act, 2009 (निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009)
- NCTE Act, 1993 (राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993)
- UGC Act, 1956 (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956)
सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कड़ी मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा: “अयोग्य व्यक्तियों को शिक्षकों के रूप में शामिल करना और बनाए रखना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तबाह कर देगा। इस तरह की चीजें देश के भविष्य को नष्ट कर देंगी।” — CJI सूर्यकांत
मामले की पृष्ठभूमि: असम प्रांतीकरण योजना विवाद
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कोर्ट को बताया कि असम सरकार ने स्कूलों को चलाने के नाम पर स्थानीय रूप से ऐसे शिक्षकों (ट्यूटर्स) की नियुक्ति की जिनके पास अपेक्षित शैक्षणिक योग्यता नहीं थी। बाद में 2017 के अधिनियम में 2018 में संशोधन करके इन नियुक्तियों को वैध बनाने का प्रयास किया गया।
- गुवाहाटी हाईकोर्ट का पिछला फैसला: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 के अपने फैसले में इन ट्यूटर्स को नियमित वेतनमान देने और अयोग्य पाए गए शिक्षकों को भी पूरा वेतन जारी रखने का निर्देश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने असम अधिनियम के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय मानकों और कानूनों (NCTE/UGC/RTE) से समझौता कर अयोग्य शिक्षकों को किसी भी हाल में कक्षा में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के प्राथमिक विद्यालयों, माध्यमिक स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों (कॉलेजों) में निर्धारित न्यूनतम विधिक योग्यता के बिना शिक्षकों की नियुक्ति या उन्हें सेवा में बनाए रखने (Continuation) पर राष्ट्रव्यापी अंतरिम रोक लगा दी है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने असम सरकार के शिक्षक प्रांतीयकरण ढांचे (Teacher Provincialisation Scheme) को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह देशव्यापी अंतरिम आदेश पारित किया। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि जब तक अभ्यर्थी शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम (NCTE Act, 1993) या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम (UGC Act, 1956) के तहत निर्धारित वैधानिक योग्यता पूरी नहीं करते, तब तक उन्हें किसी भी स्कूल या कॉलेज में नियुक्त या समायोजित (Absorb) नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व मौखिक टिप्पणियां
1. ‘अयोग्य शिक्षक भविष्य की पीढ़ियों को तबाह कर देंगे’ अयोग्य शिक्षकों को सेवा में बनाए रखने और वेतन दिए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की: “इस प्रकार की व्यवस्थाएं और अयोग्य व्यक्तियों को शिक्षक के रूप में बनाए रखना हमारे देश की भावी पीढ़ियों (Future Generations) के भविष्य को पूरी तरह बर्बाद कर देगा। विद्यार्थियों के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”
2. वैधानिक योग्यताओं का पालन अनिवार्य (अंतरिम निर्देश) खंडपीठ ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट व्यवस्था दी: “एक अंतरिम उपाय के रूप में, यह निर्देश दिया जाता है कि अगले आदेश तक किसी भी स्कूल या कॉलेज में किसी भी शिक्षक को नियुक्त या समायोजित (Appointed/Absorbed) नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसे अभ्यर्थी ‘निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, ‘राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993’ अथवा ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956’ के तहत निर्धारित अनिवार्य योग्यताएं पूरी न करते हों।”
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मामले की पृष्ठभूमि (असम शिक्षक प्रांतीयकरण अधिनियम विवाद)
- असम शिक्षा अधिनियम, 2017 और 2018 का संशोधन: असम सरकार ने स्कूलों को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति की थी। बाद में इस योजना को ‘असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017’ में 2018 के संशोधन के माध्यम से विधायी वैधता दी गई।
- गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला (4 अक्टूबर 2024):
- गुवाहाटी उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मोहर अली शेख एवं अन्य बनाम असम राज्य मामले में इस प्रांतीयकरण ढांचे की जांच की थी और राज्य सरकार को प्रभावित ट्यूटरों/शिक्षकों के लिए नियमित वेतनमान लागू करने का निर्देश दिया था।
- याचिकाकर्ता के अनुसार, हाईकोर्ट ने अयोग्य पाए गए शिक्षकों के संबंध में भी निर्देश दिया था कि उन्हें पूरा वेतन दिया जाता रहे।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: इस व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई, जिसमें केंद्रीय कानूनों (RTE/NCTE/UGC) के मानकों को दरकिनार कर अयोग्य शिक्षकों को नियमित करने और वेतन देने का कड़ा विरोध किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का प्रभाव
- राष्ट्रव्यापी असर: यह आदेश केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर के सभी राज्यों के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होगा।
- अनिवार्य योग्यता के बिना नियुक्ति पर पूर्ण रोक: कोई भी राज्य सरकार या शिक्षण संस्थान अब RTE, NCTE या UGC द्वारा निर्धारित पात्रता (जैसे TET, B.Ed, NET आदि) को पूरा किए बिना शिक्षकों की भर्ती, नियमितीकरण या सेवा विस्तार नहीं कर सकेगा।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार।
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।
Talented Teacher: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| मूल मामला | असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीकरण) अधिनियम, 2017 की संवैधानिक वैधता |
| मुख्य अंतरिम आदेश | निर्धारित वैधानिक योग्यता के बिना किसी भी शिक्षक की नियुक्ति या सेवा विस्तार पर अंतरिम रोक। |

