केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती |
| केस का नाम | बी. जगदीश्वरन बनाम राज्य (B Jagadeeshwaran v. State) |
| मुख्य निर्देश | BCI और राज्य बार काउंसिल को दागी वकीलों पर विस्तृत सर्वे/डेटा जुटाने का आदेश। |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट सी. दीपककुमार |
| राज्य के वकील | एडवोकेट एम. मोहम्मद रियाज |
| अगली सुनवाई | 24 अगस्त 2026 |
Practising Advocates: आपराधिक मुकदमों में वकीलों की बढ़ती संलिप्तता और बार एसोसिएशनों में उनका नेतृत्व हासिल करने की प्रवृत्ति पर मद्रास हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की है।
जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती (Justice D Bharatha Chakravarthy) की एकल पीठ ने [बी. जगदीश्वरन बनाम राज्य] मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया। हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एंड पुडुचेरी को राज्य में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अभ्यासकर्ता वकीलों (Practising Advocates) का व्यापक सर्वेक्षण (Survey) करने का निर्देश दिया है।
मद्रास हाई कोर्ट की चिंता और कड़े अवलोकन
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले वकीलों पर हाई कोर्ट की चिंता
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न्याय प्रणाली की साख पर खतरा बार एसोसिएशनों में नेतृत्व
• अदालत प्रतिदिन 30-40 ऐसे मामलों की सुनवाई कर रही है। • गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोग
• वकीलों का व्यक्तिगत अपराध न्याय व्यवस्था की छवि बिगाड़ता है। बार एसोसिएशनों के पदाधिकारी बन रहे हैं।
हर कार्य दिवस पर 30 से 40 मामले
सुनवाई के दौरान जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने टिप्पणी की, लगभग हर कार्य दिवस पर यह अदालत प्रैक्टिसिंग वकीलों से जुड़े लगभग 30 से 40 आपराधिक मामलों पर सुनवाई कर रही है। यदि कानूनी बिरादरी का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत रूप से आपराधिक मुकदमों में शामिल है, तो यह न केवल बार की छवि को प्रभावित करता है, बल्कि लंबे समय में पूरी न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता (Credibility) पर भी असर डालता है।
एनरोलमेंट से पहले और बाद का अपराध
अदालत ने वकीलों से जुड़ी आपराधिक शिकायतों के दो अलग-अलग रुझानों को रेखांकित किया।
- पहला वर्ग: वे लोग जो वकीलों के रूप में एनरोल (Enrolment) होने से पहले से ही आपराधिक मामलों में आरोपी थे।
- दूसरा वर्ग: वे वकील जो वकीलों के रूप में एनरोल होने के बाद भी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं और बाद में विभिन्न बार एसोसिएशनों के पदाधिकारी (Office-Bearers/Leaders) बन जाते हैं।
बार एसोसिएशनों के पदों पर दागी चेहरे
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी एफआईआर दर्ज होने से किसी व्यक्ति पर धब्बा नहीं लगता, लेकिन जब गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग बार एसोसिएशन के नेता बन जाते हैं, तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है। कहा, यदि गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले लोग बार एसोसिएशनों के पदाधिकारी बन जाते हैं और हर बार (Bar) में उनकी संख्या बहुगुणित होती जाती है, तो यह वैध चिंता उत्पन्न होती है कि क्या वे अपने ग्राहकों के हितों की प्रभावी रूप से रक्षा कर पाएंगे और वकालत के पेशे की मर्यादा बनाए रख पाएंगे।
बार कौंसिलों को दिए गए सर्वे के निर्देश
अदालत ने BCI और तमिलनाडु एवं पुडुचेरी बार काउंसिल से शोधकर्ताओं की नियुक्ति करने या समिति बनाकर निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तृत डेटा एकत्र करने को कहा है:
- संख्या: आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे अभ्यासकर्ता वकीलों (Practising Advocates) की कुल संख्या।
- अपराध की प्रकृति: उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक आरोपों/अपराधों की प्रकृति क्या है।
- समयकाल: क्या कथित अपराध वकील के रूप में नामांकित होने से पहले हुए या बाद में।
- पदाधिकारी: बार एसोसिएशनों के कितने पदाधिकारी वर्तमान में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।
- अपराध का प्रकार: क्या मुकदमे पेशेवर गतिविधियों (जैसे विरोध प्रदर्शन) से जुड़े हैं या फिर वे नैतिक अधमता (Moral Turpitude) या अन्य गंभीर अपराधों से संबंधित हैं।
उद्देश्य: अदालत ने कहा कि इस एम्पेरिकल डेटा (Empirical Data) के आधार पर वैधानिक प्राधिकरणों (Statutory Authorities) को उचित नियम और दिशानिर्देश बनाने में मदद मिलेगी।
याचिका की पृष्ठभूमि
- मूल याचिका: यह आदेश अधिवक्ता बी. जगदीश्वरन की उस याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने सालेम के कन्ननकुरिची पुलिस स्टेशन में अपने खिलाफ दर्ज मामले को रद्द (Quash) करने की मांग की थी।
- व्यापक मुद्दा: याचिका पर नोटिस जारी करने के बाद अदालत ने एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर इस व्यापक व्यवस्थागत मुद्दे को उठाया।
- बार बॉडीज को पक्षकार बनाया: अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां किसी विशेष वकील पर आक्षेप लगाने के लिए नहीं हैं। BCI और राज्य बार काउंसिल को मामले में पक्षकार बनाया गया है और उनकी राय मांगी गई है।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
मद्रास हाई कोर्ट का यह कदम भारतीय कानूनी पेशे में शुचिता और नैतिक मानकों को बहाल करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और कड़ा प्रयास माना जा रहा है। बार एसोसिएशनों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के बढ़ते दबदबे पर यह फैसला ऐतिहासिक साबित हो सकता है।

